अपना कैरियर आगे बढ़ाने के लिए आप किसी पर निर्भर नहीं रह सकते

इमोशन

अपना career आगे बढ़ाने के लिए आपको अन्य लोगों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। आपमें इतनी शक्ति और क्षमता है कि आप इसको स्वयं ही आकार दे सकते हैं। व्यापार और नौकरी में आपकी सफलता निम्न कारकों पर निर्भर करती हैं:-

अपने मिशन के प्रति आपका जुनून

आपमें सच का सामना करने का साहस और क्षमता होनी चाहिए। आपके साथ जो भी कुछ घटित होता है उसकी जिम्मेदारी स्वयं लें – उससे सीखें और आगे बढ़ें

इस सच को स्वीकार करें कि हर व्यक्ति अपना भविष्य बनाना चाहता है आपका नहीं। यदि आपका कोई सबसे बड़ा शुभचिन्तक है तो वह आप स्वयं हैं।

जबकि दूसरी तरफ होता यह है कि आप लक्ष्य बनाते हैं … लेकिन उसे टालते जाते हैं। आप टू-डू लिस्ट तो बनाते हैं, लेकिन आप अनुसरण नहीं करते। और यह बार-बार होता है।

आखिर समस्या क्या है?

ऐसा क्यों होता है कि आपको क्या करना चाहिए यह सोचते तो बहुत अच्छा है लेकिन जब धरातल में करना होता है तो गच्चा खा जाते हैं।

समस्या यह है कि आप एक आवश्यक कदम को छोड़ रहे हैं। यह है…..

हम भावना (emotion) में बहकर फैसला करते हैं और तर्कों से उसे सही साबित करने का प्रयास करते हैं।

क्या आप सही में मानते हैं कि कड़ी मेहनत ही सफलता का कूंजी है? यदि आपको कोई कहता है कि फलां-फलां काम में कड़ी मेहनत करो सफल हो जाओगे अथवा कहता है कि फलां काम को इस तरह करो तो बात बन सकती है – इसका सीधा मतलब है आपने अपने लिए कोई मिशन और प्रतिबद्धता बनाई ही नहीं है। आप उस गाड़ी की तरह व्यवहार कर रहे हैं जो खराब है और उसे गन्तव्य तक पहुंचाने के लिए क्रेन खींच रही है।

हम टारगेट बनाते हैं पर उसे पूर्ण करने के लिए भावनाओं का सहारा लेते हैं। कई अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकला है कि हम जो निर्णय लेते हैं उनमें से 90 प्रतिशत भावनाओं पर आधारित होते हैं। फिर अपने कार्यों का औचित्य सिद्ध करने के लिए तर्क ढूंढते फिरते हैं।

ध्यान दें कि भावना हमेशा तर्क पर भारी पड़ती है और कल्पना हमेशा वास्तविकता पर हावी हो जाती है। चलें हम उस बच्चे के बारे में विचार करें जिसको अंधेरे से डर लगता है। यदि आप बच्चे को समझायेंगे कि डरने की कोई बात नहीं है तो वह नहीं मानेगा। वह स्वयं ही काल्पनिक तर्क देने लगेगा कि कोई न कोई समस्या तो अवश्य है।

ज्यादातर परिस्थितियों में, लोग भावनाओं में बहकर प्रतिक्रिया करते हैं, फिर तर्क और तथ्य के साथ अपने कार्यों को सही ठहराते हैं।

विचार और भावनाओं के बीच के संघर्ष में अधिकतर भावना (emotion) की विजय होती है।

हम अपने emotions को अनदेखा नहीं कर सकते। क्योंकि जिस तरह से प्रकृति ने हमारा दिमाग बनाया है उसमें जब भी हमारे विचार और भावनाओं में संघर्ष होता है अधिकतर मामलों में जीत इमोशन की ही होती है और कल्पना सच्चाई पर हावी हो जाती है। फलतः हम अपनी भावनाओं से लड़ नहीं सकते। हम जितना उसे दबाने का प्रयास करते हैं उतना ही हम उसे और अधिक मजबूत बनाते हैं।

फिर यदि भावनायें इतनी मजबूत होती हैं तो इस तरह की प्रेरणा से भला क्या हो सकता है?

देखो दोस्तों, हमें योजना बनानी है पर उसे कैसे क्रियान्वित करना है यह भी तो सोचना है।

मैंने खुद भावनाओं में बहकर कुछ बहुत ही बेवकूफी भरे फैसले किए हैं जिनका मुझे आज भी अफसोस है। मैं ज्यादा गहराई में तो नहीं जाऊँगा, लेकिन यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ यदि तर्कशक्ति का इस्तेमाल किया होता तो बहुत सी चीजें बिल्कुल अलग और बेहतर होती।

अधिकतर मामलों में आप वास्तव में वह निर्णय लेते हैं जो मन को भाता है पर जब उसे चिंतन-मनन करके विभिन्न कसौटी में परखते हैं वह तार्किक रूप से सही नहीं होता है।

यही कारण है कि बेघर आदमी भोजन के बजाय शराब की दुकान पर अपना पैसा खर्च करता है। इसी तरह कई इम्प्लायर सच्चा और मेहनती कर्मचारी को छोड़ कर चापलूस को ज्यादा पसंद करता है। अतः यदि आप निर्णय लेने के लिए तर्क का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो आप बस बेवकूफ कहे जा सकते हैं।

फिर आपको क्या करना चाहिए!!

केवल भावनाओं में बह कर निणर्य लेने वाला व्यक्ति कभी सफल नही हो पायेगा, उसके पास सही विकल्प तलाशने का ज्ञान ही नहीं होता। हर चीज तर्क से परखने वाला व्यक्ति कठोर दिखाई पड़ सकता है पर उसके सफल होने की सम्भावना अत्यधिक होती है क्योंकि उसमे अच्छे निर्णय लेने की क्षमता होती है। इस आधार पर यदि आपको तर्कशक्ति अथवा भावना में से एक को चुनाना हो तो तर्क ही आपका साथी होना चाहिए।

मेरी राय में, निर्णय में तर्क का भावनाओं से अधिक वजन होना चाहिए। यद्यपि हमें पूरी तरह से भावनाओं को नकारना नहीं चाहिए, फिर भी उन तथ्यों को दरकिनार नहीं करना चाहिए, जो पहले से मौजूद है।

Also Read : आखिर हम बार-बार हारते क्यों है? Why we defeat? 


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