सुकरात के सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी होने की देववाणी – Socrates story hindi

सुकरात की कहानी – उनके जीवन की कुछ अविस्मरणीय घटनाओं का संकलन

सुकरात

सुकरात का जीवन भी सत्य की खोज और प्रचार, सत्य के लिये सर्वस्थ-त्याग और सत्य के लिए हर प्रकार के कष्ट सहन का मूर्तरूप था। पृथ्वी की कोई भी शक्ति प्रलोभन या भय देकर, जिसे वे सत्य या न्याय समझते थे, उससे उन्हें लेशमात्र भी विचलित करने में समर्थ न हो सकी।

सुकरात ने नीति, राजनीति, दर्शन, तर्क, अध्यात्म जैसे किसी विषय के व्यवस्थित शास्त्र की रचना भी नहीं की किन्तु इनका सम्पूर्ण जीवन इन विषयों के गहरे सत्य की खोज में बीता और इन्होंने अपने तर्क के द्वारा अपने समय के विद्वानों के ज्ञान-गौरव के तिलस्म का आवरण हटा कर उन्हें गहरे सत्य की खोज में मुखातिर किया। सुकरात के तुरंत पीछे जो व्यवस्थित शास्त्रों के निर्माता प्लोटो और अरस्तु जैसे विद्वान हुए हैं, उनके प्रेरणास्त्रोत और गुरु सुकरात ही थे।

सुकरात का जन्म ईसा पूर्व 469 में यूनान के एथेन्स नामक नगर में हुआ था। इनके पिता मूर्तिकार थे और माता नर्स काम करती थी। सुकरात बचपन से ही सत्यप्रेमी और सत्यनिष्ठ थे। जिस बात को ये सत्य और न्याय समझते थे, उसके कहने और करने में वे बिलकुल भी संकोच या भय नहीं करते थे।

सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी होने की देववाणी और उसकी परीक्षा

सुकरात को बचपन में ही चेरीफोन नामक एक व्यक्ति के द्वारा यह पता चला था कि देवता ने उसे कहा है कि सुकरात विश्व का सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी है। उस दिव्य वाणी के विषय में पता चलने पर उन्होंने इस वाणी के सत्य की परीक्षा लेने की सोची। वे अपने समय के प्रसिद्ध ज्ञानी व्यक्तियों से मिले और उनसे बातचीत करके यह अनुभव किया कि इनका ज्ञान थोथा है।

उन्होंने स्वंय के लिए भी अनुभव किया कि ‘मैं भी अज्ञानी हूँ किंतु मुझमें और इनमें इतना अन्तर है कि ये अज्ञानी होते हुए अपने आपको ज्ञानी मानने का मिथ्या अभिमान रखते हैं और मैं अपने आपको अज्ञानी मानता हूँ और सदा सच्चे ज्ञान की खोज में लगा रहता हूँ। केवल इतना ही मुझमें और इनमें अन्तर है। देववाणी द्वारा मुझे सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी कहने का यही अभिप्राय हो सकता है।’

पत्नी का क्रोधी स्वभाव

सुकरात अत्यन्त शान्त स्वभाव के थे परन्तु उनकी पत्नी अत्यन्त क्रोधी स्वभाव की थी। एक दिन उनकी पत्नी ने क्रोध मे गंदे पानी से भरा एक बर्तन उनके सिर पर उड़ेल दिया। सुकरात हंस पड़े और बोले-आजतक तो मैने सुन रखा था कि जो गरजता है वह बरसता नहीं, परन्तु आज विपरीत बात हो गयी-जो गरजा, वह बरसा भी। पत्नी क्या कहती-बेचारी चुप हो गयी।

न्याय प्रदान करने के लिए जनमत के विपक्ष में कदम

ईसा पूर्व 406 में दस सेनापति एक अपराध में विचारार्थ संसद में उपस्थित किये गये और यह निर्णय हुआ कि व्यवस्थापिका सभा (सीनेट) यह निश्चय करे कि उन पर किस प्रकार का मुकदमा चलाया जाए। सीनेट सभा ने यह प्रस्ताव पारित किया कि एथेन्स निवासी अभियोग को और बचाप पक्ष को सुनकर मत देकर निर्णय करें कि उन्हें दण्ड दिया जाए या छोड़ा जाय।

यह प्रस्ताव बहुत ही अन्यायपूर्ण था। उसका निर्णय सामान्य जनमत से कराना अन्याय था। सामान्यरूप में अभियोग चलाकर न्यायाधीश के द्वारा निर्णय होना चाहिए था। दूसरे एथेन्स के कानून के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपराध के अनुसार पृथक-पृथक निर्णय होना चाहिए था न कि सामूहिक निर्णय। जिस दिन इस अभियोग पर मत लिया जाने वाला था, उस दिन सुकरात सीनेट के प्रमुख थे। जनसाधारण का अभियुक्तों के प्रति बहुत रोष था। वे मृत्युदण्ड से कम पर तैयार ही नहीं थे। अनेक सदस्यों ने इस प्रस्ताव को विधिविरुद्ध जानकर मतदान का विरोध करना चाहा, किंतु उन्हें धमकी देकर चुप कर दिया गया।

सुकरात को भी दण्ड देने की धमकी दी गयी। किंतु उन्होंने इस सबकी लेशमात्र भी परवाह न करते हुए उस प्रस्ताव को मत के लिए नहीं रखा। दूसरे दिन कोई अन्य व्यक्ति प्रधान बना। उसने जनसाधारण के आक्रोश को देखते हुए उस प्रस्ताव पर मत लिये। मृत्यु दण्ड के पक्ष में मतदान होने से सभी सेनापतियों को मृत्यु दण्ड दे दिया गया।

इस घटना का उल्लेख करते हुए अपने ऊपर अभियोग के समय सुकरात ने कहा-‘न्याय की रक्षा के लिए मैंने हर प्रकार के संकट का सामना करना और जेल अथवा मृत्यु के भय से आपके अन्यायपूर्ण प्रस्ताव में भागीदार न होना अपना कर्तव्य समझा।’

इस घटना के दो वर्ष बाद ईसापूर्व 404 में गणतन्त्र का अन्त हो गया और तीस व्यक्तियों की अल्पजनतन्त्र का शासन हुआ।

अन्यायपूर्ण शासन आदेश का उल्लंघन

इस शासन का प्रधान था क्रिटियस नामक एक व्यक्ति। क्रिटियस और उसके मित्रों का वह शासन भय और आतंकपूर्ण था। राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों और व्यक्तिगत शत्रुओं की हत्या की जाती थी। अनेक निर्दोष व्यक्तियों को झूठे अपराधों में फंसा कर मृत्युदण्ड दे दिया जाता था।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक बार सुकरात और चार अन्य व्यक्तियों को परिषद् भवन में बुलवाया गया और कुछ व्यक्तियों पकड़ कर बंदी बनाने का आदेश दिया गया। इस आज्ञा के उल्लंघन करने का अर्थ था मृत्यु दण्ड। दूसरे चार व्यक्ति मृत्यु के डर से आदेश का पालन करने में विवश हो गये। परंतु सुकरात आज्ञा का उल्लंघन करके अपने घर चले गये। इन्होंने क्रिटियस और उसके साथियों के शासन की और राजनीतिक हत्याओं की सिंह के समान गर्जना करते हुए अत्यन्त कठोर शब्दों में निन्दा की। यदि उस शासन का शीघ्र ही अन्त न हो गया होता तो तभी सुकरात की हत्या कर दी गयी होती।

सुकरात के विरूद्ध षड्यंत्र और उन पर अभियोग

सुकरात ने बहुत से लोगों के अज्ञान का भंडाफोड़ किया था। इनमें से कुछ लोगों ने सुकरात से बहुत कुछ सीखा लेकिन अनेक व्यक्ति ऐसे भी थे जिन्हें अपनी लोकप्रतिष्ठा का अभिमान था। उन्हें अपनी अज्ञानता के प्रकट होने पर अपमानित-सा महसूस किया। इस कारण वे सुकरात के विरोधी बन गये।

सुकरात के विरूद्ध बहुत षड्यंत्र होने लगे। उन्हें फंसा कर दो अभियोग लगाये गये। प्रथम यह कि इन्होंने एथेन्स के देवताओं पर अविश्वास किया है और दूसरा ये युवकों को पथभ्रष्ट कर रहे हैं।

सुकरात देवताओं के अस्तित्व पर तो विश्वास करते थे पर देवताओं का जो अनीतिकतापूर्ण रूप ग्रीक पुराणों में भरा पड़ा था उसे ये नहीं मानते थे। वे इसमें सुधार चाहते थे।

नवयुवकों को पथभ्रष्ट करने के अभियोग का उत्तर देते हुए सुकरात ने कह किया ‘जब मैंने सुना कि देवता ने मेरे विषय में यह कहा है कि मैं विश्व का सबसे बड़ा ज्ञानी हूँ, तब ईश्वर के आदेश से मैंने इस कथन की परीक्षा करना अपना कर्तव्य समझा। मैंने अनेक विद्वानों से बातचीत की, जिनके सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध था कि वे ज्ञानी है। मेरी बातचीत से उनका अज्ञान प्रकट हुआ। नवयुवकों को मेरी बातें अच्छा लगी और उन्होंने भी परस्पर और दूसरे उन व्यक्तियों से वे ही प्रश्न करने आरम्भ किये, जो मैं किया करता था।’

उन्होंने आगे कहा-‘मेरे और नवयुवकों के इस आचरण से वे लोग, जो अज्ञानी होते हुए भी अपने आपको ज्ञानी मानने का अभिमान रखते थे, मेरे शत्रु बन गये और कहने लगे कि मैंने नवयुवकों को पथ-भ्रष्ट किया है। किंतु मैं तो ज्ञान का प्रेमी और सत्य की खोज करने वाला हूँ। अतः मैं सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने के लिए जिस किसी को भी ज्ञानी सुनता हूँ, उससे कुछ सीखने के लिए बातचीत करता हूँ। यदि सत्य को खोजना और ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी ज्ञानी माने जाने वाले व्यक्ति से बातचीत करना अपराध है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ।’

वे कहते हैं-‘यदि कोई यह कहता है कि मैं इससे भिन्न कहता हूँ तो वह झूठ बोलता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि चाहे आप मुझे दण्ड दीजिए या छोड़िये, यह निश्चय रखिए कि मैं अपने विचारों पर परिवर्तन नहीं कर सकता चाहे मुझे इसके लिए अनेक बार क्यों न मरना पड़े।’

इन शब्दों के साथ उन्होंने ईश्वर और न्यायाधीशों के ऊपर निर्णय छोड़ दिया।

सुकरात को मृत्युदण्ड

सुकरात को 220 के विरुद्ध 281 मतों से मृत्यु दण्ड की सजा दे दी गयी। मृत्युदण्ड निर्धारित हो जाने पर इन्हें जेल में भेज दिया गया और इनके पैरों में बेड़ियां डाल दी गयी। विधि के विधान से उस समय धार्मिक उत्सव पड़ जाने के कारण इन्हें 21 दिनों तक फांसी न दी जा सकी।

जेल में शिष्य क्रीटो से संवाद- मृत्युदण्ड के दिन प्रातःकाल इनका शिष्य क्रीटो इनके पास पहुंचा। सुकरात उस समय सो रहे थे। क्रीटो उनके उठने की प्रतीक्षा करता रहा। उठने पर क्रीटो ने कहा कि ‘बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि इतने भीषण संकट पर भी आप इतने सुखपूर्वक सोये हुए थे। सुकरात ने उत्तर दिया कि ‘इस 71 वर्ष की पकी हुई आयु में भी यदि मैं मरने से घबराता हूँ तो यह मेरे लिए बहुत मूर्खतापूर्ण होगा।’

क्रीटो ने उनसे प्रार्थना की कि ‘मैंने जेलर से सांठ-गांठ करके आपके लिए जेल से बाहर थिसिली में पहुंचने का प्रबन्ध कर दिया है। आप वहां चलें। आपको कोई कष्ट न होगा और आपका बहुत स्वागत-सम्मान होगा।’ सुकरात ने कहा-‘मैं अपने पहले के विचारों को नहीं बदल सकता। मेरा छिपकर यहां से भागना किसी प्रकार भी उचित नहीं है, यह अनुचित कार्य है। अतः मैं इसे अस्वीकार करता हूँ।’

बातचीत होते-होते सूर्यास्त का समय आ पहुँचा। सुकरात ने स्नान किया। उनके सामने विष का प्याला आ पहुँचा। सुकरात ने कहा, हे देवताओं! मेरी प्रार्थना है कि यहाँ से आगे की मेरी यात्रा कल्याणकारी हो।’ यह कहकर उन्होंने प्याले को मुँह से लगाया। उनके पास बैठे व्यक्ति रो पड़े। सुकरात स्वयं शान्त और प्रसन्न रहे और उन्होंने सबको शान्त रहने का आदेश दिया। उन्होंने पूर्ण शान्ति एवं प्रसन्नता के साथ विष-पान कर लिया। वे थोड़ा-बहुत टहले और लेट गये। उनका मुँह वस्त्र से ढक दिया गया और कुछ समय में उनका निधन हो गया।

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