पौराणिक अनमोल उद्धरण – Success quotes Hindi from Hindu Mythology

पौराणिक अनमोल उद्धरण
Success Quotes Hindi from Hindu Mythology 

success quotes hindi

Quote 1 : दरिद्र वह है जिसकी तृष्णा बढ़ी हुई है। धनी वह है जो पूर्ण संतोषी है। उद्यमहीन व्यक्ति जीवित होते हुए भी मरे समान है। जो अपने कृतव्य का पालन नहीं करता, अंधा है। वह बहरा है जो अपने हित की बात नहीं सुनता। जो प्रिय वचन बोलना नहीं जानता वह गूंगा है।


Quote 2: मोक्ष के द्वार पर चार द्वारपाल कहे गये हैं-शमा, विचार, संतोष और चौथा सत्संग। पहले तो इन चारों का ही प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए। यदि चारों के सेवन की शक्ति न हो तो तीन का सेवन करना चाहिए। तीन का सेवन न हो सकने पर दो का सेवन करना चाहिए। यदि दो के सेवन की भी शक्ति न हो तो सम्पूर्ण प्रयत्न से प्राणों की बाजी लगाकर भी एक पर काबू कर लेना चाहिए।। यदि एक वश में हो जाता है तो शेष तीन भी वश में हो जाते हैं।


Quote 3 : जीव प्रतिदिन यहाँ से यमराज के घर जा रहे हैं; फिर भी जो लोग अभी शेष हैं, वे यहीं स्थिर रहना चाहते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या हो सकता है।


Quote 4 : जब जमीन पर सोने से काम चल सकता है, तब पलंग के लिए प्रयत्नशील होने से क्या प्रयोजन। जब भुजाएँ भगवान की कृपा से स्वयं ही मिली हुई हैं, तब तकिये की क्या आवश्यकता। जब अंजली से काम चल सकता है, तब बहुत से बर्तन क्यों बटोरें। भूख लगने पर दूसरों के लिए शरीर धारण करने वाले वृक्ष क्या फल-फूल की भिक्षा नहीं देते? जल चाहने वालों के लिए क्या नदियाँ एकदम सूख गयी हैं? अरे भई! सब न सही, क्या भगवान भी अपने शरणागतों की रक्षा नहीं करते? समझ नहीं आता कि ऐसी स्थिति में बुद्धिमान लोग भी धन के नशे में चूर घमंडी धन्नासेठों की चापलूसी क्यों करते हैं?


Quote 5 : जो लोग समाजसेवा, परोपकार आदि लिए धन पाना चाहते हैं, उन लोगों को धन की ओर से निरीह हो जाना ही उत्तम है। क्योंकि कीचड़ को लगाकर धोने की अपेक्षा उसका स्पर्श ही न करना मनुष्यों के लिए श्रेयस्कर है।


Quote 6 : वृद्ध माता-पिता को स्नान कराते समय जब उनके शरीर से जल के छींटे उछलकर संतान के सम्पूर्ण अंगों पर पड़ते हैं, उस समय उसके सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त होता है।


Quote 7 : छेड़ा हुआ सिंह, अत्यन्त रोष से भरा हुआ सर्प तथा सदा गुस्से में रहने वाला शत्रु भी वैसा अनिष्ट नहीं कर सकता, जैसे संयमरहित चित्त कर डालता है।


Quote 8 : जो अपना हित चाहता है, उसे किसी से द्रोह नहीं करना चाहिए क्योंकि जीव कर्म के अधीन हो गया है और जो किसी से भी द्रोह करेगा, उसको इस जीवन में शत्रु से और जीवन के बाद परलोक से भयभीत होना ही पड़ेगा।


Quote 9 : जो जन्म ले चुका है, उसी मृत्यु निश्चित है। जो ऊँचे चढ़ चुके हैं, उनका नीचे गिरना अवश्यम्भावी है। संयोग का अवसान वियोग में ही होता है और संग्रह हो जाने के बाद उसका क्षय होना भी निश्चित बात है। यह समझ कर विद्वान लोग हर्ष और शोक के वशीभूत नहीं होते और दूसरे मनुष्य भी उन्हीं के आचरण से शिक्षा लेकर वैसे ही बनते हैं।


Quote 10 : जो धनी हो कर भी दान न दे और दरिद्र होने पर भी कष्ट सहन न कर सके इन दो प्रकार के मनुष्यों का सुखी-संतोषी रहना ही असम्भव है।


Quote 11 : पहले तो धन को पैदा करने में कष्ट होता है, फिर पैदा किये गये धन की रखवाली में झंझट उठाना पड़ता है। इसके बाद यदि कहीं वह नष्ट हो जाए तो भी दुःख उठाना पड़ता है। तो भला, धन में सुख है ही कहाँ।


Quote 12 : पाप एक वृक्ष के समान है, उसका बीज है लोभ। मोह उसकी जड़ है। असत्य उसका तना और माया उसकी शाखाओं का विस्तार है। दम्भ और कुटिलता पत्ते हैं। कुबुद्धि फूल है और नृशंसता उसकी गन्ध तथा अज्ञान फल है। छल, पाखण्ड, चोरी, ईष्र्या, क्रूरता, कूटनीति और पापाचार से युक्त प्राणी उस मोहमूलक वृक्ष के पक्षी हैं, जो मायारूपी शाखाओं पर बसेरा लेते हैं। जो मनुष्य उस वृक्ष की छाया पर आश्रय लेकर संतुष्ट रहता है, उसके पके हुए फलों को प्रतिदिन खाता है और उन फलों के रस से पुष्ट होता है, वह ऊपर से कितना ही प्रसन्न क्यों न हो, वास्तव में पतन की ओर ही जाता है।


Quote 13 : जैसे सूखी लकड़ियों के साथ मिली होने से गीली लकड़ी भी जल जाती है, उसी तरह पापियों के सम्पर्क में रहने से धर्मात्माओं को भी उनके समान दण्ड भोगना पड़ता है। इसलिए पापियों का संग कभी नहीं करना चाहिए।


Quote 14 : अल्पज्ञानी होते हुए भी अपने आप ही बुद्धिमान बने हुए और अपने को विद्वान मानने वाले मूर्ख लोग बार-बार कष्ट सहते हुए वैसे ही भटकते रहते हैं, जैसे अंधे के द्वारा चलाये जाने वाले अंधे भटकते हैं।


Quote 15 : दूसरोें के दोषों को यदि कोई कान से सुने वाणी से कहे, नेत्रों से देखे और मन से मनन करे तो उस पापरूपी मल से ये कान, वाणी, नेत्र और मन-सभी दूषित हो जाते हैं और उन दोषों के संस्कार, चित्त पर अंकित हो जाते हैं, जो भविष्य में उससे भी वैसे ही पाप कराने में सहायक हो जाते हैं।


Quote 16 : पापी के पाप की चर्चा करने से उस पापी के पाप का अंश उस चर्चा करने वाले व्यकित को भोगना पड़ता है। अतः आत्मा का उद्वार चाहने वाले मनुष्य को इस सबसे भी बहुत दूर रहना चाहिए।


Quote 17 : यदि हम अपना पतन नहीं होने देना चाहते तो हमें अपना उद्धार आप करना चाहिए। वस्तुतः हम अपने-आपके मित्र और शत्रु भी हैं।


Quote 18 : मनुष्य की प्रकृति में जिस दोष की प्रधानता हो उसे दूर करने के लिए अपने में उक्त दोष के विपरीत प्रकृति के गुण को बढ़ाने का अभ्यास करना चाहिए।


Quote 19 : कोई कितना भी धनी हो जाए, परंतु तृप्ति तो संतोष से ही मिलेगी।


Quote 20 : मनुष्य अन्य बातों में प्रायः पशु-तुल्य ही है। उसको बस पशु से अलग करने का एक प्रबल माध्यम है-‘सोच-विचार’


Quote 21 : जो अपने सुख से प्रसन्न नहीं होता, दूसरों के दुःख में हर्ष नहीं मानता और दान देकर पश्चाताप नहीं करता वह सज्जनों में सदाचारी कहलाता है।


Quote 22 : भूमि में बीज बोने पर वह जैसे उसी समय फल नहीं देता, वैसे ही इस संसार में बुरे कर्म का फल भी तत्काल नहीं मिलता, समय आने पर अधर्म करने वाला जड़-मूल से नष्ट हो जाता है।


Quote 24 : संसार में नीति-निपुण पुरुष चाहे निन्दा करें या सम्मान, धन प्राप्त हो या नष्ट हो जाए, आज ही मृत्यु क्यों न हो जाए, विवेकी पुरुष न्यायपथ से, सत्यपथ से तनिक भी विचालित नहीं होते।

Also Read : 1. आखिर हम बार-बार हारते क्यों है? Why we defeat?
2. उम्मीद न छोड़ें! सफलता अवश्य मिलेगी।


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