हिम्मत न हार यही है जीवन का सार – मिगुएल डे सर्वेंटेस

हिम्मत न हार यही है जीवन का सार – Motivational failure story 

हिम्मत न हार

यह कहानी है एक ऐसे महान हस्ती की जिन्होने जीवन का अधिकतर समय रोजगार की तलाश और आर्थिक तंगी में बिताया। इन सब कष्टों के बावजूद उनके लेखन के प्रति जुनून कम नहीं हो पाया और वे लगातार लिखते रहे।

मिगुएल डे सर्वेंटेस (Miguel de Cervantes) का जन्म 29 सितम्बर 1547 में स्पेन, यूरोप में हुआ था। वे स्पेनिश उपन्यासकार, नाटककार और कवि थे। वे विश्व साहित्य के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वे आधुनिक नोबल लेखन के पितामह माने जाते हैं। उनकी कृति डॉन क्विजोट (Don Quixote) का अनुवाद 60 से अधिक भाषाओं में पूर्ण या आंशिक रूप से किया गया है जो कि बाईबल के बाद दूसरे स्थान पर आता है।

उनके पिता नाई का काम करते थे। वे उस समय की आवश्यकतानुसार छोटी-मोटी सर्जरी जैसे कि दांत निकालना, टूटी हुई हड्डियों को सेट करना, शरीर में फंसी बंदूक की गोली को निकालना, मालिश करना आदि कार्य भी करते थे।

मिगुएल डे सर्वेंटेस

पिता जी परिवार सहित अपने काम के सिलसिले में एक शहर से दूसरे शहर जाया करते थे। इससे मिगुएल की पढ़ाई में व्यवधान पड़ता रहा। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त नहीं है। उनके समय के अधिकांश लेखकों के विपरीत, वह जाहिर तौर पर विश्वविद्यालय नहीं गए।

1569 में वे बेहतर भविष्य की तलाश में इटली चले गये। वहाँ उन्होंने किसी सामाजिक प्रतिष्ठत व्यक्ति के यहां चेम्बर असिस्टेंट के पद पर कार्य किया। बाद में वे स्पेनिश इंफेन्ट्री आर्मी में शामिल हो गये।

1571 में वे लेपेंटों की लड़ाई में शामिल हुए। इसमें वे बुरी तरह घायल हो गये। उनकी छाती में दो गोलियां तथा बांए हाथ में एक गोली लगी। उनके घाव ठीक होने में लगभग छह माह का समय लगा। उनका बांया हाथ कभी भी पूरी तरह से सामान्य नहीं हो पाया। ठीक होने के बाद वे अपनी ड्यूटी में पुनः शामिल हो गये।

1575 में नेपलिस से बार्सिलोना जाते समय उन पर समुद्री लूटेरों में हमला कर दिया। उन्हें बन्धक बनाकर अल्जीयर्स ले जाया गया। परिवार से फिरौती की रकम मांगी गयी जो वे जुटा पाने में असमर्थ थे। इस रकम को जुटाने में परिवार को 5 साल लग गये तब जाकर उनकी रिहाई सम्भव हो सकी। इन पांच सालों में उनसे गुलामों की तरह काम कराया गया।

सर्वेंटेस की अनुपस्थिति के दौरान स्पेन में काफी बदलाव आया था। कीमतों में नाटकीय रूप से वृद्धि हो गयी थी। उनके जैसे मध्यवर्गीय परिवार के लोगों के लिए जीवनयापन करना काफी मुश्किल हो गया था।

स्पेन लौटने के बाद सर्वेंटेस का लेखन के प्रति झुकाव हो गया। आश्चर्य की बात नहीं, सर्वेंटेस के जीवन की इस दर्दनाक अवधि ने उनके कई साहित्यिक कार्यों के लिए विषयवस्तु प्रदान की। हालांकि उन्होंने अपने साथ हुई घटनाओं को सीधे तौर पर आत्मकथा के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। अपने समय के अधिकतर लेखकों की भांति सिर्फ इस कार्य से वे अपना जीवन व्यतीत करने में असमर्थ थे।

अगले 20 वर्षों के दौरान उन्होंने कई रोजगार बदले लेकिन अपने लेखन के शोक का कम नहीं होने दिया। उन्होंने स्पेनिश नेवी के लिए पर्सेजिंग एजेंट तथा टैक्स कलेक्टर का कार्य भी किया जिसमें उनका काम शहर-शहर घूम कर शासक का बकाया टैक्स वसूल करना था। हालांकि वे हिसाब-किताब में कमजोर थे इसलिए अपने सहयोगियों से धोखा खा लेते थे। इसी तरह खातों में अनियमिता के कारण 1597 से 1602 के बीच कम से कम दोबार उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी।

1605 में प्रकाशित उनकी कृति Don Quixote का पहला भाग प्रकाशित हुआ। इसने उनको काफी महसूर कर दिया। हालांकि उनको कोई विशेष आर्थिक लाभ नहीं हो पाया क्योंकि उन्होंने इसके अधिकार अपनी आर्थिक मजबूरी के कारण पहले ही बेच दिए थे।

1607 को वे मेर्डिड में स्थाई रूप से बस गये। शासन द्वारा उनके लिए कुछ पैंशन निर्धारित की गयी जिसके सहारे आगे का जीवन उन्होंने पूर्णकालीन लेखक के रूप में बिताया। सन् 1615 में उनके नोबल का दूसरा भाग प्रकाशित हुआ। इस भाग को पहले से भी बेहतरीन माना गया। उनकी आर्थिक स्थिति में आशाजनक काफी हद तर सुधार हुआ लेकिन एक साल बाद ही सन् 22 अप्रैल 1616 मे उनका निधन मैड्रिड, स्पेन में मधुमेय (Diabetes) के कारण हो गयी। उनको 23 अप्रैल को दफनाया गया। इसी दिन को यूएनएसको द्वारा उनके सम्मान में विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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