3 शिक्षाप्रद बाल कहानियाँ – करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

3 शिक्षाप्रद बाल कहानियाँ 

संसार में कोई महापुरुष आकाश से उतरकर नहीं आता और छोटा मानव पाताल फाड़ कर नहीं निकलता। अपितु अपनी मेहनत और आचरण के कारण ही छोटे और बड़े बन जाते हैं – महात्मा बु़द्ध

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

एक बालक था बिल्कुल मूर्ख। उसकी स्मरणशक्ति अत्यंत दुर्बल थी। अपने सहपाठियों में उसकी गिनती पीछे से शुरू होती थी यानि कक्षा में सबसे मंदबुद्धि। जब वे पांच वर्ष के थे तभी वे गुरुकुल शिक्षा के लिए आ गये। दस वर्ष बीत जाने के बाद भी वह मूर्ख ही बने रहे। सभी साथी उसका मजाक उड़ाते हुए उसे वरधराज (बैलों का राजा) कहा करते थे।

एक दिन गुरु जी ने निराश होकर उसे अपने पास बुलाया और कहा-‘बेटा वरदराज! तुम किसी और काम में ज्यादा सक्षम हो सकते हो। अपना समय नष्ट न करो और घर जाओ। कुछ और काम करो।’

गुरुदेव की इशारों वाली बातों से बालक को बहुत दुःख हुआ। उसे अपने आप पर ग्लानी होने लगी। उसने विद्या विहीन होने से अच्छा तो जीवन को ही नष्ट करना श्रेष्ठ समझा। वह गुरुकुल से चला गया और आत्महत्या करने का उपाय सोचने लगा। रास्ते में उसे एक कुंआ दिखाई दिया। वहां महिलायें रस्सी से पानी निकाल रही थी। उसने देखा कि रस्सी की रगड़ से पत्थर पर निशान बन गये हैं।

वरदराज ने सोचा कि जब इतना कठोर पत्थर कोमल रस्सी के बार-बार रगड़ने से घिस सकता है तब परिश्रम करने से मुझे विद्या क्यों नहीं प्राप्त हो सकती? उसने तत्काल आत्महत्या का विचार त्याग दिया और गुरुदेव के पास लौट आये। उसने गुरुदेव को कुछ दिन और रखकर शिक्षा देने की प्रार्थना की। सरल हृदय गुरूदेव राजी हो गये।

वरदराज ने मन लगाकर पढ़ना आरम्भ कर दिया। उसकी ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा इतनी तीव्र थी कि समय और भोजन का भान भी नहीं रहता था।

यही वरदराज आगे चलकर संस्कृत के महान विद्वान बने। संस्कृत व्याकरण समझने में बहुत कठिन होती है इसका वरदराज को बाखूबी अनुभव था। उसको सरल बनाने में उन्होंने ‘लघुसिद्धान्तकौमुदी’ की रचना की। पारिणनीय व्याकरण का संक्षिप्त सारांश इस ग्रन्थ में है।

वरदराज की कहानी से एक लोकक्ति प्रचलित हो गयी, जो कि हर बच्चे के लिए स्मरण रखने योग्य है-
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान।।

झूठ नहीं बोलना और अनावश्यक क्रोध नहीं करना

भीष्म पितामह के प्रयास से महर्षि द्रोणाचार्य कौरवों-पांडवों को शिक्षा देने हस्तिनापुर आने को तैयार हो गये। वे सभी राजकुमारों को शस्त्र-ज्ञान के साथ-ही-साथ व्यवहारिक चरित्र की भी शिक्षा देते थे। वे काफी कठोर शिक्षक थे। वह यदा-कदा अपने शिक्षों की परीक्षा लेते रहते थे। एक दिन उन्होंने सभी कुमारों को कुछ पाठ याद करने को यह कह कर दिया कि वे अगले दिन उनसे सब कुछ सुनेंगे।

अगले दिन बारी-बारी से राजकुमारों ने गुरुदेव को पिछला याद किया हुआ पाठ सुनाया। युधिष्ठर की बारी आयी तो उन्होंने बताया कि वे केवल दो ही वाक्य याद कर पाये वह भी अभी अधूरे हैं।

गुरु द्रोण को क्रोध आ गया। उन्होंने आव देखा ना ताव और युधिष्ठर पर दो-चार चांटे लगा दिये। युधिष्ठिर चुपाचाप भावरहित सिर झुकाये खड़े रहे। यह देखकर द्रोण का क्रोध और बढ गया। उन्होंने चिल्लाकर पूछा- ‘वह कौन से पाठ हैं जो तुम्हें थोड़ा बहुत याद हैं।’

युधिष्ठिर ने शांतभाव से कहा-‘एक झूठ नहीं बोलना और दूसरा अनावश्यक क्रोध नही करना।’

यह सुनना था कि गुरूदेव का पूरा क्रोध छूमन्तर हो गया। उन्होंने युधिष्ठिर को गले लगाते हुए कहा कि ‘वास्तव में पाठ तो तुम्हीं से याद किया है। बाकी कुमारों ने तो सिर्फ उसे रटा है।’

जैसा अन्न वैसा मन

प्राचीन काल की बात है। एक सुसंस्कृत, दयालु प्रजापालक राजा था। उन्हीं के स्वभाव के अनुरूप उनके सेवक भी दयालु और विश्वासपात्र थे। उनमें से एक सेवक राजा को अत्यन्त प्रिय था। शयन कक्ष के बाहर वही तलवार लेकर पहरा देता था।

एक दिन सेवक की नीयत डोल गयी। उसके मन में एकदम से अमीर बनने का विचार आया। वह राजा के सोने का इन्तजार करने लगा। राजा के सोते ही उसने गले से सवर्णआभूषणों निकालने का निश्चय किया। उसने नंगी तलवार उठाई और राजा पर वार कर दिया। लेकिन ईश्वर की इच्छा से उसी वक्त राजा ने करवट बदल दी। तलवार बिस्तरे में फंसी और जोर से आवाज हो गयी। उसी वक्त अन्य सैनिक चैकन्ने हो गये। उन्होंने उस सेवक को पकड़ लिया। राजा भी शोरशराबे में जाग गये।

सभी सैनिकों ने राजा से एक स्वर में उस दुष्ट को प्राणदण्ड देने की प्रार्थना की। परन्तु राजा को सैनिक पर थोड़ा सा भी क्रोध नहीं आया। वे मनन करने लगे कि इस सैनिक ने आज तक तन-मन से उसकी सेवा की है। आज अचानक ऐसा क्या परिवर्तन आ गया कि वह उसकी हत्या करने को अमादा हो गया।

राजा ने सैनिक को प्यार से अपने पास बुलाया और पूरे दिन की गतिविधि के बारे में पूछा। सैनिक ने बताया कि वह घर से आ रहा था तो उसे रास्ते में कुछ लोग मिले जो कि एक पेड़ के नीचे भोजन कर रहे थे। उसे उनकी गतिविधि पर सन्देह हुआ तो उनके पास गया। उन्होंने उसे अपनी बातों के जाल में फंसा कर साथ में भोजन कराया और कुछ धन देकर विदा किया।

राजा ने तुरन्त सैनिकों से उन राहगीरों को पकड़ने का आदेश दिया। कुछ ही समय में सैनिक उनको पकड़ने में कामयाब हो गये। उनके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त की गयी। वे राहगीर वास्तव में निर्दयी लुटेरे और हत्यारे थे।

राजा तुरन्त ही समझ गये कि उनके विश्वासपात्री सैनिक के मन मे पाप क्यों आया। यह दोष उस भोजन का ही है जो उसने उन लुटेरों के साथ गृहण किया था। राजा ने सैनिक को तीन दिन का उपवास रखने का दण्ड दिया। बुरे भोजन का प्रभाव मिटने के बाद वह सैनिक फिर से उत्तम विचारों का हो गया। वह फिर से राजा की सेवा में रख लिया गया।

इस शिक्षाप्रद बाल कहानी से स्पष्ट होता है कि भोजन का चरित्र पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जैसा हम भोजन करते हैं वैसी ही हमारी मनोस्थति होती है तथा चरित्र निर्माण में भोजन का विशेष महत्व है। इसीलिए बच्चों हमेशा कोशिश करों घर का खाना ही खायें। बाजार का चिप्स, कुरकुरे, बर्गर, पेटीज या पीज्जा आदि को जितना कम खायें उतना ही अच्छा है। इस तरह की बाहर की चाजें खाने से आपकी पढाई में न सिर्फ रूचि कम होगी बल्कि मम्मी-पापा को भी यह पसंद नहीं आता होगा।

Also Read : बालक का गुस्सा


आपको 3 शिक्षाप्रद बाल कहानियाँ Shikshaprad bal kahaniyan  करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान – झूठ नहीं बोलना और अनावश्यक क्रोध नहीं करना – जैसा अन्न वैसा मन  कैसी लगी, कृप्या कमेंट बाक्स पर साझा करें।

Random Posts

  • letters great personalities महापुरुषों के पत्रों का महत्व

    महापुरुषों के पत्रों का महत्व Importance of the Letters of Great Personalities in Hindi महापुरुषों के पत्र (letters of great personalities) बड़े ही मनोरंजक एवं प्रेरणा (inspirational) देने वाले होते […]

  • क्रोध क्रोध पर विजय। Motivational Story

    क्रोध पर विजय । Motivational Story बहुत प्राचीन बात है। किसी गाँव में एक बुर्जुग महात्मा रहते थे। दूर-दूर से लोग शिक्षा गृहण करने के उद्देश्य से अपने बच्चों को उनके […]

  • चाय चाय और हमारा स्वास्थ्य

    चाय और हमारा स्वास्थ्य Impact of Tea in our Health क्या आप जानते हैं कि 200 वर्ष पहले भारतीय घरों में चाय नहीं होती थी। परन्तु आज यह हमारे देश […]

  • effort मेहनत का फल | Effort Motivational Story

    मेहनत का फल | Effort Motivational Story एक दिन विंध्याचल प्रदेश के राजा के दरबार में तीन व्यापारी आए और राजा से बाले, महाराज! हम रत्नों के व्यापारी हैं, व्यापार […]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*