ईश्वर भक्त सदन कसाई

ईश्वर भक्त सदन कसाई

सदन कसाई 1

प्राचीन काल में सदन कसाई ईश्वर के परम भक्त थे। जाति के कसाई होने के वावजूद उनके हृदय में हमेशा दया का संचार रहता था। जातिगत और पारिवारिक आजीविका का स्रोत होने के कारण वह यह काम करते थे। पशु वध उनसे होता नहीं था, इसलिए दूसरे कसाईयों के यहां से मांस लाकर बेचा करते थे।

एक दिन नदी के किनारे भ्रमण करते समय उनकी नजर एक चिकने पत्थर पर पड़ी। उन्होंने से उठाया और देखने लगे। विचार किया कि इस पत्थर का इस्तेमाल तौलने के बाट के रूप में बढिया हो सकता है। वे उस पत्थर को अपने साथ दुकान में ले गये और उससे मांस तौलने के रूप में इस्तेमाल करने लगे।

वे जिस पत्थर को साधारण समझ रहे थे, वास्तव में वह शालिग्राम था। सदन कसाई के घर में भगवान शालिग्राम विराजमान हो गये थे। सदन इस तथ्य से बिल्कुल अनजान थे। एक दिन एक साधु सदन की दुकान के पास से गुजरे। अनायास ही उनकी नजर दुकान में रखे शालिग्राम पर पड़ गयी। उन्होंने सदन को इशारे से अपने पास बुलाया और बाट देने का आग्रह किया। दूसरा पत्थर नदी से लाने का विचार करके सदन उनको देने के लिए राजी हो गये।

साधु महाराज ने शालिग्राम को गंगा जल से पवित्र किया। उनको स्थापित किया और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। उसी रात साधु महाराज को स्वप्न में भगवान के दर्शन हुए। उन्होने साधु को धिक्कारते हुए अपने को पुनः सदन कसाई की दुकान में पहुंचाने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि तुम मुझे भक्त सदन के यहां पहुंचा दो। उसके बिना यहां मुझे एक क्षण भी रास नहीं आ रहा है।

साधु महाराज ने पूरी रात करवटें बदल कर बिताई। सुबह उठते ही सीधे सदन की दुकान की तरफ भागे। उन्होंने पूरी घटना सदन को बताई और भगवान शालिग्राम को उनके हाथों में सौंप दिया।

भगवान शालिग्राम का अपने यहां इस तरह का इस्तेमाल करने के लिए सदन को आत्मग्लानि होने लगी। उन्होने मन-ही-मन भगवान से क्षमा मांगी। अब सदन का व्यवसाय में मन नहीं लग रहा था। वे तो ईश्वर भक्ति में डूबते चले गये थे। वे भगवान शालिग्राम को लेकर श्रीजगन्नाथपुरी की दर्शन के लिए चल दिए।

एक दिन वे एक गृहस्थ के यहां रात को ठहरे। उस घर में स्त्री और पुरुष दो ही व्यक्ति थे। स्त्री का चरित्र ठीक नहीं था। वह सदन पर मोहित हो गयी। रात को मौका देखकर वह उनके पास आई और प्रेम याचना करने लगी। सदन ने उसकी याचना को विनम्रपूर्वक मना कर दिया। इस पर उस स्त्री को लगा किया सदन उसके पति से डर रहे हैं कि पता लगने पर उनकी बहुत कुटाई होगी। सदन के साथ हमेशा के लिए रहने का विचार करके उस स्त्री ने घर में रखी तलवार उठाई और सोते हुए पति की गरदन धड़ से अलग कर दी। वह सदन के पास आयी और कहने लगी कि उसने रास्ते के कांटे को हमेशा के लिए हटा दिया है अब उनके बीच में कोई नहीं है। हम दोनों एकसाथ सुख पूर्वक रहेंगे।

उस स्त्री की आशा के विपरीत सदन ने प्रणय-निवेदन ठुकरा दिया। उनके द्वारा पति हत्या की शिकायत के डर से स्त्री एक विचार करके द्वार पर दहाड़े मार-मार कर रोने लगी। उसका रुदन सुनकर लोग इकट्ठा हो गये। उसने बताया कि सदन की उस पर बुरी नज़रे थी। पति के रोकने पर उसने उनकी हत्या कर दी। लोगों ने सदन को पकड़कर बहुत मारा और राजकीय सैनिकों को सौंप दिया। सदन पर मुकदमा चला और सजा के तौर पर उनके दोनों हाथों को काटने का आदेश आ गया।

सदन ने अपने साथ हुई इस त्रादसी को ईश्वर की लीला माना। वे प्रभुनाम लेते हुए आपनी यात्रा पर आगे बढ़ गये। उधर श्रीजगननथपुरी में भगवान ने पुजारी को स्वप्न में आदेश दिया कि ‘मेरा भक्त सदन आ रहा है। उसके दोनों हाथ कटे हुए हैं। तुम पालकी लेकर जाओ और सदन को उस पर बैठाकर मेरे द्वार पर ले आओ।’

सदन श्रीजगन्नाथ जी पहुंच गये। अपने भगवान के दर्शन पाकर वे बहुत उल्लासित थे। वे कीर्तन करने लगे। जैसे ही उन्होंने अपने दोनों हाथ उठाये ईश्वर के चमत्कार से उनके हाथ पूर्ववत् ठीक हो गये।

सदन के हाथ तो ठीक हो गये परन्तु मन में एक संदेह बना था। उस निपराध पति को अकाल मृत्यु क्यों प्राप्त हुई तथा उनके हाथ क्यों कटे। उसी रात भगवान ने सदन को स्वप्न में दर्शन दिये और उसकी पूर्वजन्म की घटना बताई। सदन पूर्वजन्म में एक ब्राह्मण थे। एक दिन गाय भागती हुई उनके पास से गुजरी। कसाई उसके पीछे दौड़ता हुआ आ रहा था। उसने ब्राह्मण को आवाज लगाई। ब्राह्मण ने गाय को दोनो हाथों से रोक दिया और कसाई को सौंप दी। पूर्वजन्म की गाय वहीं स्त्री थी। कसाई उसका पति था। उस जन्म का बदला लेने के लिए स्त्री ने उसका गला काटा। उस जन्म में सदन ने गाय को दोनो हाथों से पकड़कर कसाई को सौंपा था, इस पाप के कारण उसके हाथ काटे गये।’

सदन के सारे संदेह दूर हो गये। उन्होंने श्रीजगन्नाथपुरी में अपना स्थायी निवास बना दिया। मृत्यु के बाद वे परमधाम पधारे।

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