शरणार्थी का हौसला – Hosle ke Kahani

शरणार्थी का हौसला – Hosle ke Kahani

सन् 1956 का वर्ष था। हंगरी (Hungary) में स्कूल-काॅलेज के विद्यार्थियों द्वारा सोवियत विरोधी आंदोलन शुरू हो गया। रूसी सैनिक चुन-चुन का विद्यार्थियों को पकड़ रही थी।

उसके बहुत से साथी पकड़े गये। घर-घर में छापेमारी होने लगी। इससे बचने के लिए उसने दूसरे देश में शरणार्थी बनने का निर्णय लिया।

वह अपने एक स्कूल मित्र के साथ घर से निकल पड़ा। उन्होंने पश्चिमी क्षेत्र की तरफ जाने वाली एक ट्रेन पकड़ी। आगे का रास्ता पैदल तय किया। एक गम्भीर समाचार था कि रूसी सैनिक गांव-कस्बों में घूम रहे हैं और जो भी संदिग्ध दिखता उसे गिरफ्तार किया जा रहा था। उन्होंने लाल सेना से बचते हुए सीमा की तरफ दौड़ लगा दी। रास्ते की कोई जानकारी नहीं थी। बचे हुए पैसे देकर बार्डर में तस्करी करने वालों से गुप्त रास्ता पता किया और आगे बढ़ गये।

इसी तरह चलते-चलते, घंटों बाद, वे अपने आपको दलदली भूमि में पाते हैं-आस्ट्रीया सीमा के नजदीक।

कुत्ते भौंक रहे थे, उन्होंने सैनिकों की कदमताल सुनी । अचानक उनपर तेज रौशनी आयी। तेज आवाज सुनायी दी-

कौन है वहाँ पर?

उन्होंने काॅलर से अपनी गरदन छुपा दी।

उस अजनबी की फिर से आवाज आयी-‘कौन है?’

अब अपने साहस को सीमाओं तक बटोर कर उन्होंने पूछा

‘हम कहाँ हैं?’

‘तुम ऑस्ट्रिया मे हो।’ वहाँ से जवाब आया।

उन्होंने राहत की सांस ली। वे उठ खड़े हुए और भविष्य की तरफ अपना रास्ता बढ़ाया।

इन दोनो शरणार्थी (रिफ्यूजी) युवकों में से एक का नाम था एन्ड्रस ग्राफ (एंड्रयू ग्रोव- Andrew Grove) जिन्होंने अपने मजबूत इरादे और बुलंद हौसले से इंटेल Intel जैसी नयी कम्पनी को दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी कम्पनी में तब्दील कर दिया।

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