संत एकनाथ की उदारता और सहृदयता – प्रेरक प्रसंग

संत एकनाथ की उदारता और सहृदयता – प्रेरक प्रसंग

संत एकनाथ 1

संत एकनाथ की साधुता, दया, परोपकारिता तथा सहनशक्ति की ख्याति सर्वत्र फैल रही थी। इस बात से कुछ स्वार्थी तथा ईष्र्यालु लोग जलने लगे। एक गरीब ब्राह्मण संत की ख्याति सुनकर उनके पास धन की याचना के लिए जाने लगा। रास्ते में उसका सम्पर्क इन्हीं विरोधी विचार के लोगों से हो गयी। उन्होंने ब्राह्मण से कहा कि वे उसे धन इनाम में देंगे, बशर्ते वह एकनाथ जी की शान्ति भंग करके उन्हें क्रोधित करने में सफल हो सके। ब्राह्मण को धन की अत्यन्त आवश्यकता थी। उसे धन कमाने का यह मार्ग अति सुगम प्रतीत हुआ। उसने चुनौती को स्वीकार किया। उसे कपटी लोगों द्वारा महात्मा एकनाथ के मकान तक पहुंचा दिया गया।

घर पहुंचकर वह कपड़े, जूते पहने अपने सामान के साथ सीधा एकनाथ के पूजामन्दिर मे चला गया। एकनाथ जी उस समय पूर्जा अर्चना में ध्यान मग्न थे। ब्राह्मण सीधे एकनाथ की जांघ में जाकर कर बैठ गया। कोई अन्य व्यक्ति होता तो अपरिचित द्वारा इस प्रकार के व्यवहार से शायद क्रोधित हो जाता। किंतु एकनाथ कोई साधारण व्यक्ति तो थे नहीं उन्होंने उस ब्राह्मण को प्रेमपूर्वक गले लगाया और कहा-‘आपका मेरे प्रति प्रेमभाव तो अति विलक्षण है। सच्चा प्रेम किसी भी मर्यादा को नहीं मानता। आपके इस निच्छल व्यवहार से मैं अभिभूत हो गया’। महात्मा एकनाथ ने उस ब्राह्मण की अपने यहां ठहरने की उचित व्यवस्था कर दी।

ब्राह्मण को इस तरह के व्यवहार की आशा न थी। वह खिन्न हुआ किंतु निराश न हुआ। वह संत एकनाथ को क्रोधित करने के लिए योग्य अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। उसने मन-ही-मन निश्चत कर लिया कि साधारण-सी हरकतों से वह संत एकनाथ की शान्ति-भंग नहीं कर सकता। इसलिए उसने एक रामबाण उपाय की योजना कर ली।

भोजन का समय हुआ। ब्राह्मण देवता और एकनाथ जी आसन पर जा विराजे। एकनाथ जी की साध्वी एवं सुयोग्य पत्नी भोजन परोसने के लिए आ गयी। जैसे ही यह ब्राह्मण देवता की थाली में चीजें परोसने के लिए झुकी वैसे ही ब्राह्मण देवता उचककर उसकी पीठ पर जा बैठे। भोजन में साथ ही बैठे संत एकनाथ ने अपनी पत्नी से कहा, ‘सावधान! कहीं ब्राह्मण देवता गिरकर चोट न खा लें।’ पत्नी बोली, ‘मुझे पुत्र को पीठ पर बैठा कर घर के सब काम करने का काफी अभ्यास है। आप निश्चिंत रहें। मैं अपने इस बालक को भी गिरने नहीं दूंगी।’

ये शब्द सुनकर ब्राह्मण लज्जित हुए तथा संत एकनाथ के पैरों पर गिरकर क्षमा-याचना करने लगे। साथ ही अपने असभ्य व्यवहार का सच्चा कारण बतलाया और इनाम खोने का दुःख भी प्रकट किया। एकनाथ ने यह सब सुनकर कहा-‘आपने मुझसे यह सब पहले क्यों नहीं कहा? मेरे क्रोध से यदि आपको लाभ होता, मैं अवश्य क्रोध प्रकट करता। उस ब्राह्मण की मजबूरी को समझकर एकनाथ जी ने उसकी पर्याप्त आर्थिक सहायता भी दी।’


अन्य विवरण है कि एक समय संत एकनाथ अपने साथियों के साथ प्रयाग के संगम से पवित्र गंगाजल लेकर रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाने जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक गधा मिला, जो प्यास के मारे तड़प रहा था। संत एकनाथ का कोमल हृदय इस दृश्य से द्रवित हो गया और निःसंकोच भाव से उन्होंने काँवर का गंगाजल गधे को पिला दिया। पेट में पानी पहुँचते ही गधे में नवजीवन का संचार हो गया। वह उठकर ढेंचू-ढेंचू करता हुआ चला गया। पीछे से आ रहे एकनाथ जी के साथियोें ने यह सब दृष्य देख लिया। समीप आकर उन्होंने एकनाथ जी से कहा, ‘हमारी यात्रा व्यर्थ चली गयी। गधे का जूठा गंगाजल रामेश्वर भगवान को चढ़ाने योग्य नहीं रहा।’

संत एकनाथ ने धीर-गम्भीर भाव से कहा-‘जिस कारण तुम लोग यात्रा को निष्फल समझ रहे हो, उसी कारण यह अधिक सफल हुई है। सब जगह व्याप्त भगवान रामेश्वरम् ने रास्ते में ही हमारी सेवा स्वीकार कर ली।’ उनके सभी साथी गूढ बात को समझकर नतमस्तक हो गये।


बात संत एकनाथ जी के गृहनगर पैठण की है। वे वहां नित्य गोदावरी नदी में स्नान करने जाया करते थे। मार्ग में एक सराय पड़ती थी। वहां एक पठान का निवास था। उसने संत को भी बहुत परेशान किया।

एकनाथ जी जब भी स्नान करके लौटते, वह पठान उनके ऊपर कुल्ला कर देता। एकनाथ जी फिर स्नान करने नदी में लौट जाते। वापिस आने पर वह पठान फिर से कुल्ला कर देता। कभी-कभी तो यह दिन में कई-कई बार होता।

‘इस काफिर को गुस्सा क्यों नहीं आता!’ पठान एक दिन जिद पर आ गया। वह बार-बार कुल्ला करता गया और एकनाथ जी बार-बार गोदावरी-स्नान करने लौटते गये। पूरे एक सौ आठ बार उसने कुल्ला किये और पूरे एक सौ आठ बार एकनाथ जी ने नदी में स्नान किया।

अंत में पठान को अपनी हरकत पर लज्जा आई-‘आप मुझे माफ कर दें। मैं तौबा करता हूं। अब किसी को तंग नहीं करूंगा। आप खुदा के सच्चे बंदे हैं।’ उसके भीतर की पशुता संत की क्षमा से पराजित हो गयी। वह एकनाथ जी के चरणों में गिर कर क्षमा मांगने लगा।

‘इसमें क्षमा करने की क्या बात है। आपके सहयोग से मुझे आज एक सौ आठ बार स्नान करने का सुअवसर मिला।’ एकनाथ जी ने बड़े ही प्रसन्न मन से उस पठान को आश्वासन दिया और गले लगा लिया।

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