प्रेरणात्मक किस्सा: स्कूल में मैले कपड़े पहनने पर सजा

प्रेरणात्मक किस्सा: स्कूल में मैले कपड़े पहनने पर सजा

विश्वविद्यालय में शिक्षक उपकुलपति के एक रवैये से बहुत हैरान और परेशान थे। शिक्षक अनुशासनहीनता पर किसी विद्यार्थी को दण्ड देते तो वह विद्यार्थी सीधे उपकुलपति के पास पहुंच जाता तथा कुछ-न-कुछ बहानेबाजी बनाकर माफी करवा लेता।

इस तरह तो अनुशासनहीनता फैल जायेगी-शिक्षकों ने आपस में विचार-विमर्श किया। उन्होने साथ चलकर महोदय के पास अपनी बात रखने का फैसला किया।

महोदय! आप बच्चों को माफ कर देते हैं। गलती पर दण्ड न मिलने के कारण अनुशासनहीनता फैलने का भय है। कोई भी विद्यार्थी शिक्षक की बात नहीं मानेगा क्योंकि उन्हें लगेगा कि हम दण्ड देने में सक्षम नहीं हैं। इस तरह तो हमारे लिए विद्यालय मे काम करना ही मुश्किल हो जायेगा।

उपकुलपति शिक्षकों की बात को बड़ी गम्भीरता से सुन रहे थे। उन्होंने कहा आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। मैं मानता हूँ कि मेरी गलती है पर क्या आप मेंरी विवशता के लिए मुझे माफ नहीं करेंगे।

शिक्षक बहुत हैरान हो गये। आपके लिए भला कैसी विवशता हो सकती है!!

उपकुलपति ने उदासी भरे लहजे में कहा-‘मैं आपको अपनी बचपन की एक बात बताता हूँ। मैं बहुत गरीब परिवार से था। जब बहुत छोटा था तो पिताजी की असमय मृत्यु हो गयी। हालात और भी गम्भीर हो गये। माता जी के सर पर सारा बोझ आ गया। उन दिनों फीस तो नाममात्र की ही लगती थी लेकिन वह भी समय पर नहीं निकल पाती थी। मैं फटे-पुराने कपड़े पहन कर स्कूल जाता था लेकिन कपड़ों को माँ हमेशा साफ-सुथरा रखती थी।

एक दिन घर में साबुन तक के लिए पैसे नहीं थे। मैं मैले कपड़े पहन कर ही स्कूल चला गया। शिक्षक की डर और शर्म के मारे एक कौन में सिकुड़ कर बैठ गया।

कक्षा अध्यापक आ गये। उन्होंने सरसरी निगाह दौड़ाई। उनकी निगाह मुझ पर अटक गयी।

इतने गंदे कपड़े। तुम्हें शर्म नहीं आती इन कपड़ों में स्कूल आते हुए। कल तुम आठ आना जुर्माना लेकर स्कूल आना।’

मुझे मैले कपड़ों की सजा के रूप में मार पड़ती तो कोई दुःख नहीं होता पर जुर्माने की सजा से मैं चिन्तित हो गया कि जब घर में साबुन तक के लिए पैसे नहीं हैं तो माँ आठ आने कहाँ से लायेंगी! इस विचार से ही मुझे बहुत पीड़ा हुई।

कुछ देर शांत रहने के बाद बोले-‘मैं अपनी उस समय की परिस्थिति को अभी तक भूल नहीं पाया हूँ। हर दण्ड मिले विद्यार्थी में अपने आपको देखता हूँ। मैं बराबर ख्याल रखता हूँ कि विद्यार्थी की पूरी बात को सुने बिना उसे दण्ड न दूं। यदि पूरी परिस्थिति जाने बिना उसे दण्ड देते हैं तो हम उस बच्चे के साथ अन्याय ही करते हैं।’

अध्यापक निरुत्तर हो गये। वे समझ गये कि जब तक स्वयं पर कष्ट नहीं आता तब तक दूसरों के दर्द को नहीं समझा जा सकता।

अपने बचपन घटना सुनाने वाले इन उपकुलपति का नाम पण्डित वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री (Pt. V.S. Srinivasa Sastri था। उनका जन्म 22 सितम्बर 1869 में वालिगमन, मद्रास स्टेट में हुआ था। वे शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ और स्वतंत्रता सेनानी थे। अंग्रेजी भाषा में उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी जिसके लिए उन्होंने दुनिया भर में ख्याति अर्जित की। 1908-22 तक वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य रहे। उसके बाद आजीवन भारतीय लिबरल पार्टी के साथ जुड़ गये। गोलमेज सम्मेलन में उन्होंने अंग्रेजो की कुछ शर्तों पर हामी भरी थी जिसके लिए उनकी आलोचना भी हुई थी। नेहरू जी ने उनको अंग्रेजों का एजेंट तक कह दिया था। वे भारत विभाजन के दृढ विरोधी थे। 76 वर्ष की आयु में 17 अप्रेल 1946 को इन महान स्वतन्त्रता सेनानी का निधन हो गया। उनकी मृत्यु पर हरिजन पत्र में दिये गये संदेश में गांधी जी ने लिखा कि मृत्यु ने उन्हें सिर्फ हमसे ही नहीं विलख किया है बल्कि दुनिया से भारत का सबसे अच्छे पुत्र चला गया है।

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