हमेशा समय के साथ चलें – एंड्रयू ग्रोव

हमेशा समय के साथ चलें – एंड्रयू ग्रोव 

एंड्रयू ग्रोव 1

एंड्रयू ग्रोव (Andrew Grove) ने कम्पनी के कर्मचारियों को सम्बोधिक करते हुए कहा था: क्या आप बहुत भूखे हैं? क्या आप अभी भी काम के जुनूनी हैं? यदि आप इंटेल के लिए काम करते हैं, तो आपको सफल माना जाता है। आप दुनिया के सबसे बड़ी शक्तिशाली फॉर्च्यून 100 कम्पनियों में से एक में काम करते हैं। आपका ब्रांड दुनिया का 7वां सबसे बड़ा ब्रांड है। जहां एक इंटेल कर्मचारी होने का बैज ही आपके लिए सम्मान और सफलता की गारंटी देता है।

यह सब बात 100 प्रतिशत बकवास है। आपको भूख लगती रहनी चाहिए। आपको भूखे रहना पड़ेगा। आपको बहुत-बहुत मेहनत करनी होगी। कभी भी आत्मसन्तुष्ट नहीं होना है।  सफलता आत्मसंतुष्टि प्रदान करती है। आत्मसंतुष्टि विफलता का कारण है। केवल जुनून/पागलपन से ही नयी ऊँचाईयों को छुआ जाता है।

एंड्रयू ग्रोव का बचपन

इंटेल के कठोर प्रबंधक/सी.ई.ओ. और महशूर व्यापारिक रणनीतिकार Andrew Grove का जन्म 2 सितम्बर 1936 मे बुद्धापेस्ट, हंगरी में हुआ था। पिता जी दूध की डेरी चलाते थे और माँ बुककीपिंग कर्लक थी।

जब वे सिर्फ 4 साल के थे तो मरते-मरते बचे। बुद्धापेस्ट में एक महामारी फैल गयी। जिसकी वे चपेट में आ गये। बुखार से तो वे ठीक हो गये पर उनके कान में दिक्कत हो गयी। वे लगभग बेहरे ही हो गये।

वे मध्मवर्गीय यहूदी परिवार से नाता रखते थे। यहूदियों पर नाजियों द्वारा किये जा रहे अत्याचार के समय वे इसाई परिवारों के पास नकली पहचान के साथ छुपे रहे। उस समय हजारों यहूदियों को अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा था।

लड़ाई के बाद रूसियों ने हंगरी पर कब्जा कर लिया और दमनकारी साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई। एक नाजी शिविर में उत्पीड़न से ग्रस्त होने के बावजूद ग्रोव के पिता को जबरदस्ती खदान में मजदूरी करने के लिए मजबूर किया गया।

1956 में सोवियत विरोधी आंदोलन शुरू हो गया था। सेना के अत्याचारों से बचने के लिए वे देश छोड़कर ऑस्ट्रिया चले गये।

नये भविष्य की तलाश में अमेरिका जाना

कुछ हफ्तों बाद, वह न्यूयॉर्क जाने वाले एक शरणार्थी जहाज पर चढ़ गए। वहाँ से उनको न्यूजर्सी ले जाया गया जहाँ उनका इमीग्रेसन पेपर तैयार किया गया। फिर वे न्यूयार्क में रहने वाले अपने अंकल-आंटी के पास चले गये।

सिटी काॅलेज में उन्होंने केमिकल इंजीनियर विद्यार्थी के रूप में अपना नाम दाखिल करा लिया। वे दिये गये व्याख्यान को शिक्षक की होठों की हरकतों से समझते थे और घर आकर नोट बनाते थे। वे अपनी बगल में हमेशा शब्दकोश रखते थे। सुनने की समस्या और अंग्रेजी में तंगी के बावजूद वे अपनी कक्षा में प्रथम आये।

अपना खर्चा निकालने के लिए वे एक रेस्ट्रो में काम करने लगे। वहां उनकी मुलाकाल वेटर के रूप में काम करने वाली इवा से हुई जो ही हंगरी से आयी थी। 1958 में वे दोनो विवाह बंधन में बंध गये तथा अजीवन एक दूसरे का साथ निभाया।

आगे की पढ़ाई के लिए एंड्रयू ग्रोव केलिफोर्निया चले गये। उन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग में डाक्टरेट किया।

शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात वे विलियम शाॅकले की कम्पनी फेयरचाईल्ड सेमीकन्डक्टर में रिर्सचर के पद पर कार्य करने लगे।

शाॅकले को ट्रांजिस्टर के विकास के लिए नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया था। उनकी अकादमिक प्रतिष्ठा ने कंपनी में इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र के कुछ बेहतरीन दिमागों को आकर्षित किया था। हालांकि, शॉकले की खराब प्रबंधन शैली के कारण उनकी शोध टीम में काफी असंतोष था।

इंटेल से जुड़ाव

1968 में कई लोगों ने कम्पनी छोड़ दी जिसमें कम्पनी के दो मैनेजर गार्डन मूर और रार्बट नाइच थे। उन्होने मिलकर एक नई स्टार्टअप ‘इंटेट’ शुरू किया। एंड्रयू ग्रोव को भी अपने साथ काम करने का न्योता दिया गया। ग्रोव ने जमीजमाई नौकरी छोड़कर कम्पनी के तीसरे कर्मचारी के रूप में इंटेल ज्वाइन कर लिया।

शुरूआती कम्पनी प्लान में मेमोरी चिप को बनाना था। ग्रोव को कारखाने में उत्पादन का प्रभारी बनाया गया और जल्द ही उनकी प्रतिष्ठा कठोर और मेहनती प्रबन्ध के रूप में स्थापित हो गयी। 1970 में वाणिज्कि उपयोग के लिए कम्पनी द्वारा पहला मेमोरी चिप बाजार में लाया गया।

एंड्रयू ग्रोव (Andrew Grove) की सलाह पर कम्पनी ने बढ़ते प्रतिस्पर्धा तथा उत्पादन समस्याओं के कारण 1970 के दशक के उत्तरार्ध में अपना फोकस मेमोरी चिप से हटा कर माईक्रो प्रोसेसर की तरफ कर दिया। उन्होंने आईबीएम के साथ बातचीत करके यह सुनिश्चित किया कि वे अपने कंप्यूटरों में केवल इंटेल चिप्स को ही लगायेंगे।

सन् 1987 में वे कम्पनी के सी.ई.ओ. बनाये गये। 1994 में उनकी कम्पनी के नये माईक्रो चिप गूढ़ मेथमेटिकल केलकुलेशन का गलत हल दे रही थी। यह वह समस्या थी जिससे आम उपभोक्ता के कम्प्यूटर के कार्य में कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। लेकिन ग्रोव ने कम्पनी की शाख बचाने के लिए एक कठोर निर्णय लेते हुए बाजार से सारे प्रोसेसरों को वापिस मंगा लिया जिसके कारण कम्पनी को 475 मिलीयन डालर का नुकसान हुआ। उनके इस निर्णय से आगे चलकर कम्पनी के सम्मान मे बढोत्तरी ही हुई और इंटेल दुनिया की सबसे बड़ी माइक्रो प्रोसेसर बनाने वाली कम्पनी बन गयी। यहां तक कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में कम्पनी का एकतरह से एकाधिकार ही हो गया।

सन् 1998 में Andy Grove को प्रोस्टेट कैंसर होने का पता चला तो वे बिल्कुल नहीं घबराये। उन्होंने अपने स्तर पर इस बीमारी को लेकर अध्ययन किया और वर्तमान इलाज की धारणाओं को चुनौती दी और नये इलाज विधि तहरीज दी जिसे कि अभी तक अच्छी तरह नहीं अजमाया तक नहीं गया था जिससे फलस्वरूप वे लम्बे समय तक जी सके।

ईलाज में व्यस्तता के कारण उन्होने इंटेल के सी.ई.ओ. के पद को छोड़ दिया।  सन् 2000 में उनको परकिन्सन् बीमारी हो गयी। इस बीमारी के कारण शरीर में धीरे-धीर शिथिलता आने लगती है।

वह 2005 तक इंटेल के अध्यक्ष बने रहे।

उनकी मृत्यु 21 मार्च 2016 को 79 वर्ष की आयु में हो गयी। वे अपने पीछे पत्नी, दो बच्चे और आठ पोते-पोतियाँ छोड़ गये।

एंड्रयू ग्रोव अपनी कठोर प्रबंधन शैली और व्यापारिक रणनीति के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे। सन् 2001 को दिए गये एक साक्षात्कार में अपनी प्रबंधन शैली को लेकर हो रही आलोचनाओं को लेकर उन्होने कहा था कि-‘मुझे परवाह नहीं कि लोग मेरे बारे में क्या लिखते हैं। मैने एक शानदार जीवन जीया है। मेरे मरने के 10 साल बाद मेरे बारे में क्या लिखा जाता है-कौन परवाह करता है!’

Also Read : कोई भी शिखर हिम्मत से ऊँचा नहीं होता – Sean Swarner


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