बालक का संकल्प – Prerak Bal Kahani

बालक का संकल्प – Prerak Bal Kahani

Prerak Bal Kahani 1

वह अत्यन्त वैभवशाली घर, कहिए कि पूरा राजमहल ही था। सुख-सुविधाओं के जितने साधन हो सकते हैं, सब थे। उस भवन का स्वामी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था, देश के बड़े-बड़े लोगों में उनकी गणना होती थी।

परिवार बड़ा था। घर में कई बच्चे थे, जिनका पालन-पोषण घर के वैभव और प्रतिष्ठा के अनुरूप ही होता था। उनके रहन-सहन, शिक्षा-दीक्षा, बोल-चाल, सब में घर का बड़प्पन झलकता था।

उनमें से एक बच्चा बाकियों से कुछ अलग था। वह बहुत ही सीधा-साधा था। वैभवशाली परिवेश उसे कुछ रास नहीं आता था। वह बिना भेद-भाव के सबसे बड़े प्रेमपूर्वक मिलता-जुलता था। घर और पड़ोस सबका उसके प्रति असीम प्रेम था।

एक दिन अनायस घर में हंगामा मच गया। बात कुछ बड़ी नहीं थी। नौकर से कुछ मूल्यवान काँच के बर्तन टूट गये। अपराध नौकर का नहीं था। बर्तन लाते समय उसका पैर फिसल गया और सारा मूल्यवान सामान धरती पर गिरकर चूर-चूर हो गया। गृह-स्वामी और गृहणि दोनों ने देखा तो आग-बबूला हो गये। उन्होंने नौकर को बहुत खरी-खोटी सुनायी। जब नौकर ने धीमी आवाज़ में इतना भर कहा कि उसने जान-बूझ कर नहीं तोड़ी है तो मालिक-मालकिन का पारा अत्यधिक गरम हो गया। उन्होंने पुलिस बुलाकर उसे थाने भिजवा दिया।

थाने में उसे इतना पीटा गया कि देह नीली पड़ गयी। पिट-पिटाकर शाम को जब वह घर लौटा, तब ऐसा लगता था मानो महीनों का बीमार हो। उसका चेहरा पीला पड़ गया था। पिटाई और अपमान के कारण उसके पैर ठीक से नहीं उठते थे।

घर के प्रवेश द्वार पर वही बालक सामने दिखा। नौकर के मुरझाये चेहरे को देखकर बालक ठिठककर खड़ा हो गया और क्षणभर उसकी ओर देखता ही रह गया। बैचारे नौकर की आँखे सूजी हुई थी और वह इतना विवश दिख पड़ता था मानो अभी रो पड़ेगा।

नौकर ने निगाह भरकर बालक को देखा। वह कुछ कहना चाहता था, पर होंठ नहीं खुले। देखते-देखते उसकी आँखों की बेबसी क्रोध में बदल गयी और उसने मुँह जरा टेढ़ा करके धीमे पर आवेश भरे स्वर में कहा-‘देखते क्या हो पीटर! एक दिन तुम भी ऐसे ही बनोगे।’

बालक के सारे शरीर पर तरंगे सी दोड़ पड़ी जैसे उसने नंगी बिजली की तार को छू दिया हो। उसका हृदय रो पड़ा।

नौकर के साथ जो हुआ, उससे बालक पहले ही से बहुत दुःखी था। वह तो उसकी प्रतीक्षा कर रहा कि कब वह लौटे और उसे ढ़ाढ़सा बँधाये। लेकिन नौकर के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर उसका बाल हृदय रो पड़ा।

नौकर फिर बोला, ‘क्या मैं झूठ कह रहा हूँ!’

बालक रूंआसा होकर बोला-‘नहीं, नहीं, मैं कभी भी ऐसा नहीं करूँगा।’

इतना कहकर वह तेजी से आगे बढ़ा और नौकर से चिपट गया।

बालक के इस अनअपेक्षित व्यवहार से नौकर का हृदय दृविड़ हो गया। वह अपना सारा दुःख-दर्द भूल गया।

करुणा का बीज उस बालक में पहले से ही मौजूद था। उक्त घटना से उसे अंकुरित कर दिया और वह आगे जाकर लहलहा उठा। नौकर से किया गया वह वायदा रूस के महान विचारक पीटर क्रोपोस्टिन ने जीवन-भर निभाया।

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