क्रोधस्वरूप ऋषि दुर्वासा

क्रोधस्वरूप ऋषि दुर्वासा –

rishi durvasha

ऋषि दुर्वासा के जन्म से जुड़ी एक कहानी इस प्रकार है। ब्रह्मज्ञानी अत्रि ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। इनकी पत्नी का नाम अनसूया था। इनका कोई संतान नहीं थी। संतान की आकांक्षा से महर्षि अत्रि तथा अनसूया ने कई वर्षो तक कठोर तप किया। उनके तप के तेज से एक उज्जवल अग्नि ज्वाला प्रकट हुई, जिसने तीनों लोकों को अपने आगोश में ले लिया। देव, दानव, ऋषि-मुनि सभी चिन्तित हो गये। तब ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जी महर्षि के तप स्थान पर गये। प्रसन्न होकर तीनों देवों ने उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वर प्रदान किया।

वरदान के प्रभाव से ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा, विष्णु के अंश से दत्तात्रेय तथा भगवान शंकर के अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ। भगवान शंकर के रुद्ररूप से महर्षि दुर्वासा प्रकट हुए थे, इसीलिए उनका रूप अति रौद्र था, इसी कारण वे अति क्रोधी भी थे,। जहां भोलेनाथ को प्रसन्न करना बेहद आसान माना जाता है वहीं ऋषि दुर्वासा को प्रसन्न करना शायद सबसे मुश्किल काम था। महर्षि दुर्वासा दयालुता की भी मूर्ति हैं तथा अत्यन्य करुणामय हैं। भक्तों का दुख दूर करना तथा रौद्ररूप धारण कर दुष्टों का दमन करना ही उनका स्वभाव रहा है।

दुर्वासा के रूप में अवतार लेकर भगवान शंकर ने अनेक लीलाएँ की हैं, जो अति प्रसिद्ध हैं।

दुर्वासा ऋषि के आश्रम के निकट ही यमुना के दूसरे किनारे पर महाराज अम्बरीष का राजभवन था। राजा अंबरीश विष्णु के परम भक्त होने के साथ-साथ बेहद न्यायप्रिय शासक थे। एक बार राजा अंबरीश ने एकादशी का व्रत रखा। वत्र खोलते समय दुर्वासा ऋषि अंबरीश के महल पहुंच गए। अंबरीश ने उन्हें भोजन के लिए प्रार्थना की। ऋषि ने अंबरीश से कहा कि वे स्नान के पश्चात ही भोजन ग्रहण करेंगे। जल्दी लौटने की बात कह कर वे स्नान करने के लिए नदी चले गये।

ऋषि दुर्वासा के इंतजार में काफी समय बीत गया तब राजा अंबरीश ने देवताओं का आवाह्न कर आहुति दी और कुछ भाग ऋषि के लिए अलग कर दिया। कुछ समय बाद दुर्वासा ऋषि वापस आए। उन्हें राजा द्वारा उनका इंतजार न करने पर बहुत क्रोध आया। क्रोध के आवेश में उन्होंने अपनी जटा निचोड़ कृत्या राक्षसी उत्पन्न की और उसे अंबरीश पर आक्रमण करने का आदेश दिया।

भगवान विष्णु ने भक्त रक्षार्थ सुदर्शन चक्र प्रकट किया और राक्षसी का नाश हुआ। कृत्या का वध करने के बाद सुदर्शन चक्र ऋषि दुर्वासा का पीछा करने लगा। दुर्वासा जी लोकों-लोक में रक्षार्थ दौड़ते फिरे। शिवजी की शरण में पहुंचे। शिवजी ने विष्णु के पास भेजा। विष्णु जी ने कहा आपने भक्त का अपराध किया है। अतः यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, तो भक्त अम्बरीश से ही क्षमा प्रार्थना करें।

थक-हार कर दुर्वासा जी अंबरीश के पास पहुंचे और सुदर्शन चक्र को रोकने की प्रार्थना करने लगे। दयालु राजा ने ऋषि की प्रार्थना मान ली और सुदर्शन चक्र को वापिस अपने स्थान मे जाने को कहा। इस प्रकार दुर्वासा ऋषि की जान सांसत से बाहर निकली।

महाभारत में ऋषि दुर्वासा से सम्बन्धित कई घटनाओं का उल्लेख है।

एक बार महर्षि दुर्वासा द्वारका गये। वहाँ जाकर उन्होंने घोषणा करी कि वही मुझे अपने यहां ठहराये जो मुझे सह सके। श्रीकृष्ण ने उनको अपने यहां ठहराया।

दुर्वासा श्रीकृष्ण के यहां कभी हंसने लगते, कभी रोने लगते, कभी महल के सामान को उठाकर इधर-उधर फैंक देते। कभी भी कुछ भी मांग लेते।

एक दिन उनकी इच्छा खीर खाने की हुई। बोले खीर लाओ। श्रीकृष्ण ने तुरंत खीर उनके सम्मुख प्रस्तत कर दी। महर्षि ने थोड़ी सी खीर खायी और बोले-‘कृष्ण तुम इस खीर को अपने शरीर पर लगा लो। श्रीकृष्ण ने ऐसा ही किया। ऋषि ने पास खड़ी रुक्मिणीदेवी से कहा-तुम भी ऐसा ही करो।’

फिर बोले-‘रथ मँगाओ।’ तुरंत रथ हाजिर हो गया।

महर्षि ने कहा-‘रुक्मिणी तुम रथ में घोड़े के स्थान पर जुत जाओ।’ खीर लिपटी रुक्मिणी रथ में जुत गयी। महर्षि रथ में चाबुक लेकर बैठ गये। राजमार्ग पर रथ मुनि के इच्छानुसार चला। वे रास्ते में रुक्मिणी पर चाबुक से वार करते रहे।

वापिस आने पर खीर से लिपटे श्रीकृष्ण ने बिना क्रोध के नम्रता से कहा-‘महर्षि! प्रसन्न होइये।’

दुर्वासा लज्जा से पानी-पानी हो गये। बोले-‘कृष्ण! तुम धन्य हो। तुम्हारे बिना मेरा ऐसा आतिथ्य कौन कर सकेगा भला।

ऋषि दुर्वासा को क्रोधित करना जितना आसान है उन्हें प्रसन्न करना उतना ही कठिन था। लेकिन पांडवों की माता कुंती ने अपने सेवा भाव से ऋषि दुर्वासा को प्रसन्न करने में सफलता हासिल की थी।

एक बार कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें ऐसा मंत्र बताया था जिसकी सहायता से वह देवताओं का ध्यान कर उनकी शक्तियों से परिपूर्ण पुत्र रत्न की प्राप्ति कर सकती थी। पांडवों का जन्म इसी मंत्र की सहायता से हुआ था।

दूसरी घटना में स्नान करते समय महर्षि दुर्वासा का वस्त्र नदी के प्रवाह में प्रवाहित हो गया। कुछ दूरी पर द्रौपदी भी स्नान कर रहीं थीं। उनकी यह स्थिति देखकर द्रौपदी ने तत्काल अपने अंचल का एक टुकड़ा फाड़ कर ऋषि को प्रदान किया। इससे प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा ने उन्हें वर दिया कि यह वस्त्रखण्ड वृद्धि को प्राप्त कर तुम्हारी लज्जा का निवारण करेगा। इसी वर का प्रभाव था कि जब कौरवसभा में दुःशासन के द्वारा द्रौपदी की साड़ी चीरहरण की घटना हुई तो साड़ी बढ़ती ही गयी। वर के प्रभाव से द्रौपदी की लाज बच गयी।

महाभारत की एक अन्य घटना में दुर्वासा मुनि अपने दस हजार शिष्यों के साथ दुर्योधन के यहाँ पहुंचे। कूटनीतिक चाल के तहत कपटी दुर्योधन ने उन्हें प्रसन्न कर प्रार्थना की कि ऋषि युधिष्ठिर का भी आतिथ्य ग्रहण कर उन्हें भी कृतार्थ करें।

पांडव उस समय अपना वनवास काट रहे थे। विपन्नअवस्था से जूझते पांडव इतने सारे ऋषि-मुनियों का आतिथ्य सत्कार कर पाने में असमर्थ थे। जब मुनि अपने भक्तों को लेकर आश्रम पहुंचे उस समय द्रोपदी भोजन कर चुकी थी और पांडवों के पास ऋषि के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए अब कुछ भी बाकी नहीं था। पांडव घबरा जाते हैं कि ऋषि दुर्वासा को क्या खिलायेंगे। उन्हें उनके क्रोध की भी चिंता हो गयी कि कहीं वे श्राप ही न दे दें।

ऋषि दुर्वासा पांडवों से कहते हैं कि वे शिष्यों के साथ स्नान के लिए नदी जा रहे हैं तब तक भोजन का प्रबन्ध करके रखें। इस विकट स्थिति में द्रोपदी कृष्ण जी को मदद के लिए पुकारती हैं। कृष्ण जी तुरंत द्रौपदी की मदद के लिए आ जाते है। वे भी भूख लगने की बात कहते हैं और जो भी भोजन बच गया है उसकी मांग करते हैं। भोजन पात्र में सिर्फ कुछ चावल के कण ही चिपके होते हैं। कृष्ण जी बड़े प्रेम से भोजन के अंश को ग्रहण करते हैं। उनके इस अंश को ग्रहण करते ही ऋषि दुर्वासा तथा उनके हजारों शिष्यों को पेट भरे होने का आभास हो जाता है। कुछ भी ग्रहण करने की उनके पेट में स्थान नहीं था। अब उन्हे पांडवों द्वारा बनाये गये भोजन के अपमान का अंदेशा होने लगा। अतः वे उनके पास वापिस जाने के बजाए यात्रा पर आगे बढ़ जाते हैं।

पूरी लिस्ट: पौराणिक कहानियाँ – Mythological stories in Hindi


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4 thoughts on “क्रोधस्वरूप ऋषि दुर्वासा

    1. आप बिल्कुल सही कह रहे हैं संजय जी। इसी प्रकार हमसे जुड़े रहिए।

  1. अनावश्य और जल्दीबाजी मे की गयी प्रतिक्रिया से भी कभी-कभी लेने के देने पड़ जाते हैं। अमरीष के साथ दुर्वासा ऋषि द्वारा व्यवाहार से हमें यह सीख मिलती है। आपकी प्रस्तुति बेहतरीन है।

    1. आप सही कह रहे हैं सतीश जी, कभी-कभी उग्र और अनावश्यक प्रतिक्रिया से लेने-के-देन पड़ जाते हैं।

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