रानी पद्मिनी (पद्मावती) – राजपूताना का गौरव

रानी पद्मिनी (पद्मावती) – राजपूताना का गौरव

पद्मावती

सन् 1275 ई. में चित्तौड़ के राजसिंहासन पर राणा लक्ष्मणसिंह आसीन था, उसकी अवस्था उस समय केवल बारह साल की थी। राज्य की देख-रेख चाचा भीमसिंह या रत्नसिंह (रतनसिंह) करता था। रत्नसिंह एक योग्य शासक था। उनकी पहली पत्नी का नाम रानी नागमति था। उस समय राजपरिवारों मे एक से अधिक विवाह का प्रचलन था। रतन सिंह की दूसरी रानी का नाम पद्मिनी उर्फ पद्मावती था। वह अत्यन्त सुंदरी थी।

इतिहास में वर्णन

मलिम मुहम्मद जायसी ने रानी पद्मिनी  (Padmini) उर्फ पद्मावती (Padmawati) को सिंहलद्वीप के राजा गंधर्वसेन की पुत्री बताया है। राजबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचंद ओझा जिन्होने कि राजस्थान तथा भारत के इतिहास सम्बन्धी अनेक पुस्तकें लिखी थी, का मत है कि ‘रतनसिंह के राज्य करने का जो बहुत थोड़ा सा समय है, उससे यही माना जा सकता है कि उनका विवाह सिंहलद्वीप अथवा लंका के राजा की कन्या से नहीं, सिंगोली के (चित्तौड़ से 40 मील पूर्व) सरदार की कन्या से हुआ हो। अतः यह सम्भव है कि पद्मावती उर्फ पद्मिनी सिंगोली के सरदार की कन्या रही हो और जायसी ने उसे सिंहलद्वीप समझ लिया हो।

अलाउद्दीन का चितौड़ पर आक्रमण

रानी पद्मिनी की अपूर्व सुन्दरता की चर्चा सुनकर अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर सन् 1303 ई. में हमला कर दिया। अलाउद्दीन के आक्रमण का समाचार सुनकर राजपूतों ने नंगी तलवार की शपथ लेकर कहा कि ‘जीते जी इस भूमि की पावनता नहीं नष्ट नहीं होने देंगे’।

अलाउद्दीन बहुत दिनों तक घेरा डाले पड़ा रहा। दोनों सेनाओं की शक्ति समाप्त हो चुकी थी। अलाउद्दीन की पद्मिनी को देखने की तीर्व इच्छा थी। उसे राजदरवार में अपना दूत भेजकर यह कहलवा भेजा कि ‘मैं पद्मिनी को नहीं चाहता, आप उसे केवल एक बार मुझे दिखा दें। मैं दिल्ली लौट जाऊँगा।’

राणा रतन सिंह को यह बात बहुत बुरी लगी, उन्होंने दूत को मना कर दिया। पद्मिनी ने बड़ी दूरदर्शिता से काम लिया। उसने पति से कहा कि ‘मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण चित्तौड़ बेवजह तबाह हो जाए। राजपूत-नारी जानती है कि मुसीबत के वक्त क्या करना है। रतनसिंह ने उसकी बुद्धिमत्ता की बड़ी सराहना की। अलाउद्दीन के पास समाचार भेज दिया गया कि ‘रानी को प्रत्यक्ष मुख दिखलाने में आपत्ति है, यदि वे चाहें तो दर्पण में देख सकते हैं।’ अलाउद्दीन को दिल्ली लौटने का बहाना चाहिए था, उसमें इतनी शक्ति नहीं रह गयी थी कि वह चित्तौड़ पर घेरा डाले पड़ा रहे।

राजा रतनसिंह से संधि और रानी पद्मावती पर कुदृष्टी

अलाउद्दीन चित्तौड़ महल में आया। उसका काफी स्वागत-सत्कार हुआ। पद्मिनी एक जगह खड़ी हो गयी। सामने दर्पण था। अलाउद्दीन ने रानी की ओर पीठ करके दर्पण में पद्मिनी के मुखपद्म के दर्शन किये। वह रानी का मुख देखकर आश्चर्यचकित हो उठा। दर्पण पर ही उसकी दृष्टि गढ़ी रही। उस दुष्ट की पद्मिनी को पाने की इच्छा और तीर्व हो गयी ; उसने मन-ही-मन निश्चित कर डाला कि चित्तौड़ पर कब्जा करके ही रहेगा।

जायसी कथानक के अनुसार अलाउद्दीन ने राजा से मैत्री कर ली थी। वह चित्तौड में दावत पर निमंत्रित था। राजा के शतरंज खेलते समय संयोग से उसने पद्मिनी का मुख दीवार पर लगे दर्पण में देख लिया। पद्मावती झरोखे पर बैठ कर खेल देख रही थी। सुल्तान उसको देखते ही रह गया। उसके दूत से बताया कि वह पद्मावती थी। जिस समय राजा उसे किले से बाहर पहुंचाने जा रहा था, अलाउद्दीन के सैनिकों ने राजा रतनसिंह को कैद कर लिया। चित्तौड़ में हाहाकार मच गया।

इतिहासकार फरिश्ता लिखता है कि अलाउद्दीन ने राजा के सामने यह प्रस्ताव रखा कि वह छोड़ दिया जाएगा यदि पद्मिनी उसकी सेवा में भेज दी जाए। जब राजपूतों को यह बात ज्ञात हुई, उन्होंने रत्नसिंह के पास विष भेजने का निश्चित कर लिया, जिसको खाकर राजा आत्मबलिदान दे सकें।

रानी पद्मावती की सूझबूझ

पद्मिनी बहुत समझदार थी। उसने कूटनीति से काम लिया। उसने वीरवर गोरा और उसके बाहर वर्ष के शूरवीर भतीजे बादल की सहायता और सम्मति से अलाउद्दीन को पत्र लिखा, ‘जब आप मुझे न पाने से ही मेरे स्वामी के प्राण लेना चाहते हैं, तब मैं यह नहीं चाहती कि मेरे कारण मेवाड़ के सूर्य का अस्त हो। मैं आपके निकट आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार हूँ; परन्तु आप जानते हैं कि मैं राजरानी हूँ। मैं अकेले आपके यहां न आऊँगी। मेरे साथ मेरी सात सौ सहेलियाँ और दासियां हैं, साथ रहेंगी। उनमें से कुछ चित्तौड़ वापिस आ जायेंगी और बाकी मेरे साथ दिल्ली को प्रस्थान करेंगी। आपको आत्मसमर्पण करने से पहले मैं एक बार अपने पति के देखना चाहती हूँ। कारागार के सामने किसी भी सैनिक का पहरा नहीं होना चाहिए। यदि आपको यह शर्त स्वीकार हो, तो मैं आने का प्रबन्ध करूंगी।’

उस दुष्ट की आँखें तो पहले ही बंद हो चुकी थी। उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। राजपूत सैनिक शास्त्रों को कपड़ों के अंदर छिपाये कहारों के भेष में डोलियाँ उठाकर ले चले। प्रत्येक डोली के अन्दर दो और बाहर चार-छः राजपूत थे। सात सौ डोलियों में बयालीस सौ राजपूत वीर चले। सबसे आगे की सुन्दर पालकी में स्वयं महारानी पद्मिनी थीं। उस पालकी के दोनो ओर गोरा और बादल-चाचा-भतीजा-घोड़ों पर सवार होकर चल रहे थे।

यह भी कहा जाता है कि स्वयं रानी पद्मिनी नहीं गयी थीं। पद्मिनी की पालकी में तमाम औजारों को लेकर एक लोहार बैठ गया था, जो रतनसिंह को कैद से मुक्त करने के लिए था। रानी राजमहल के झरोखे पर बैठी भगवान से अपने पति के प्राणों के लिए प्रार्थना कर रही थी। गोरा और बादल की कूटनीति से किसी को पता तक न लग पाया कि पद्मिनी की पालकी में वह नही, एक लोहार है। जायसी से इस दृश्य का बहुत सजीव वर्णन किया है।

सोरह सै चंडोल सँवारे । कुँवर सजोइल कै बैठारे ॥
पदमावति कर सजा बिवानू । बैठ लोहार न जानै भानू ॥
रचि बिवान सो साजि सँवारा । चहुँ दिसि चँवर करहिं सब ढारा ॥
साजि सबै चंडोल चलाए । सुरँग ओहार, मोति बहु लाए ॥
भए सँग गोरा बादल बली । कहत चले पदमावति चली ॥
हीरा रतन पदारथ झूलहिं । देखि बिवान देवता भूलहिं ॥
सोरह सै संग चलीं सहेली । कँवल न रहा, और को बेली॥

दोनों ओर भयंकर युद्ध छिड़ गया। अचानक हुए हमले से मुसलमान सैनिकों में भगदड़ मच गई। राजपूतों ने अपने राजा को कैद से छुड़ा लिया। वीरवर गोरा इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। रतनसिंह सकुशल किले में पहुँच गये। अलाउद्दीन के पैर उखड़ गये। अलाउद्दीन को अपनी इस पराजय का बड़ा अफसोस था।

अलाउद्दीन का पुनः चित्तौड़ पर आक्रमण

कुछ वर्षों बाद अलाउद्दीन ने और बड़ी सेना लेकर पुनः चित्तौड़ पर चढाई की। दोनो सेनाओं में भयंकर मारकाट मच गयी। राजपूत सेना की अपेक्षा बादशाह की सेना बहुत बड़ी थी। इसलिए भीषण युद्घ के पश्चात चित्तौड़ की सेना की पराजय हुई। अगणित संख्या में उसके सैनिक और सरदार मारे गये और चित्तौड़ की शक्ति का पूर्ण रूप से क्षय हुआ। अबहुलफजल ने आइने-अकबरी में लिखा है कि रतनसिंह की मृत्यु अलाउद्दीन के साथ युद्ध में हुई।

रानी पद्मावती का आत्मबलिदान

राजपूतनियों ने भी साहस के साथ पद्मिनी के मार्गदशन में अपने कर्तव्य का पालन किया। पद्मिनी की अनुमति से चित्तौड़ की राजपूत-वीरागंनाओं ने मिलकर एक सूखे विशाल कुण्ड में चिता जला दी। पद्मिनी ने कहा ‘बहिनो! आज हम सब नारियों की मर्यादा-रक्षा के लिए और देश का मुख-उज्ज्वल रखने के लिए अग्निदेवता को अपने शरीर समर्पण कर रही हैं। आक्रमणकर्ता भी आँख खोल कर देख लेंगे कि हमारे हृदय में कितना आत्मबल और धर्मबल है।’ सैकड़ों स्त्रियाँ अग्निकुण्ड में कूद पड़ीं, देखते-ही-देखते सब कुछ स्वाहा हो गया!

जिस सौन्दर्य को देखकर अलाउद्दीन के हृदय में पाप-वासना जाग उठी थी, जिसके चरणों पर हिंदुस्तान का बादशाह लोटने को तैयार था, वही अपने कुल गौरव की रक्षा के लिए अग्नि में समा गयी। बादशाह को उस विशाल किले में सिर्फ शवों और राख के सिवास कुछ भी हाथ न लगा।

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6 thoughts on “रानी पद्मिनी (पद्मावती) – राजपूताना का गौरव

    1. चौहान जी आप सच कह रहे हैं। हम तो कहते हैं कि वह मेवाड़ की नहीं बल्कि पूरे देश का सम्मान हैं। इन महान एतिहासिक व्यक्तित्व पर हम सबको नाज है।
      आप इसी प्रकार हमसे जुड़े रहिए। आपके विचारों का हमेशा स्वागत रहेगा।

  1. Film walo ne majak bana rakha hai. Paisa kamane ke liye kuch bhi dikhane ke tayar ho jaate hain. History ka majak banana to koi unse seekhe.

  2. पद्मावती जैसे ऐतिहासिक चरित्रों पर फिल्म बनाने समय इतिहासकारों से चर्चा अवश्य होनी चाहिए साथ ही साथ लोगों की भावनाओं का भी अवश्य ख्याल रखा जाना चाहिए। फिल्म का विरोध करने वालों तथा समर्थकों को भी संयमित और मर्यादित रहने की आवश्यकता है।

    1. आपके भावनाओं और विचारों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ।

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