साधु और वेश्या। दूसरों का दोष मत देखो

साधु और वेश्या। दूसरों का दोष मत देखो

एक बहुत ही पहुँचे हुए अतिवृद्ध साधु थे। वे एक जगह नहीं रुकते थे, जहाँ मन लगा वही धूनी भी लगा ली। वे घूमते-घूमते एक नगर में पहुँचे। एक छायादार पेड़ के नीचे उन्होने अपनी धूनी जमा ली।

साधु की धूनी के सामने ही एक वैश्या का निवास था। उसके घर में लोगों का आना-जाना लगा रहता था। साधु को पता नहीं क्या सूझी, जब वैश्या के घर कोई पुरुष जाता, तब वे एक छोटा पत्थऱ अपनी धूनी के बगल में रख देते। इस तरह कुछ ही समय में पत्थरों का ढेर लग गया।

एक दिन घर से बाहर निकलती हुई वेश्या को साधु ने टोका और अपने पास बुला कर कहा-‘पापिन! देख अपने बुरे कामों का यह पहाड़। अरी दुष्ट तूने इतने पुरुषों को भ्रष्ट किया है जितने इस ढेर में पत्थर हैं। तु तो नरक की भोगी होगी।’

वेश्या भय से काँपने हुए रोने लगी। साधु के सामने पृथ्वी पर सिर रखकर गिड़गिड़ाते हुए बोली-‘महाराज मेरे पापों से उद्धार का मार्ग बतायें। मैं अक्षरतः उसका पालन करूंगी।’

साधु अत्यन्त क्रोधित स्वर में बोले-‘तेरा उद्धार तो हो ही नहीं सकता। यहाँ से अभी चली जा। तेरा मुख देखने के कारण मुझे आज उपवास करके प्रायश्चित करना पड़ेगा।’

वेश्य दुःखित हृदय के साथ वहां से चली गयी। अब दिन-प्रति-दिन उसे अपने बुरे कर्माें का पश्चाताप हो रहा था। वह निरन्तर प्रार्थना करती थी कि उसके पापों के लिए ईश्वर उसे क्षमा करें। इसी पश्चाताप में एक दिन उसके प्राण निकल गये।

उसी समय साधु की आयु भी पूरी हो रही थी। उन्होंने देखा कि हाथ में पाश लिये यमदूत उसके पास आ खड़े हुए। साधु ने डांटकर पूछा-‘ कौन हो तुम? तुम सब यहाँ क्यों आये हो? ’

यमदूतों ने कहा-‘हम तो धर्मराज के दूत हैं। आपको लेने आये हैं। आपका प्रस्थान का समय हो गया है।’
साधु ने पूछा-‘तुम मुझे कहाँ लेकर जा रहे हो?’

यमदूतों ने कहा कि वे साधु को नरक ले जाने के लिए आये हैं। वहाँ उनके कर्मो का हिसाब-किताब होगा।

साधु ने दूतों से कहा-‘तुमसे शायद बड़ी भूल हुई है। मैं तो बचपन से ही ईश्वर भक्ति में लीन हूँ तथा मुझ द्वारा गलती से भी कोई बुरा कर्म नहीं हुआ है। विचार करो, हो सकता है पड़ोस में रहने वाली वेश्या को लेने तुम भेजे गये हो।’

दूत बोले-‘हमसे कोई भूल नहीं हुई है। वह वेश्या तो पहले ही वैकुण्ठ पहुंच चुकी है। आपने बहुत तपस्सा की है, परन्तु वेश्या के पापों की गिनती करते हुए आप निरन्तर पाप-चिन्तन ही तो किया करते थे और इस मृत्यु काल में भी आप पाप चिन्तन ही तो कर रहे थे। अतः आपको अब नरक की तरफ ही प्रस्थान करना है। आपके पाप-पुण्यों का निर्धारण यमराज करेंगे।’

साधु के वश की अब बात नहीं थी। उन्हें यमदूत अपने पाश में बांध कर ले गये।

अतः मित्रों हमें इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि दूसरों की हमेशा बुराई नहीं तलाशनी चाहिए अतएव अपने-आप पर ध्यान देना चाहिए। यदि कुछ बुराई दिखती भी है तो सामने वाले को सुमार्ग में लाने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।

Also Read : कलह से हानि होती है Hindi Moral Story of Two Birds


आपको यह कहानी साधु और वेश्या। दूसरों का दोष मत देखो Moral story in Hindi   कैसी लगी, कृप्या कमेंट बाक्स पर साझा करें।

आपके पास यदि Hindi में कोई article, story, essay है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ kadamtaal@gmail.com पर E-mail करें. हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित करेंगे|

Random Posts

  • muslim youth save cow मुस्लिम युवक की युक्ति से गाय की प्राण-रक्षा

    मुस्लिम युवक की युक्ति से गाय की प्राण-रक्षा Muslim youth save cow in Hindi मुसलमान युवक (muslim youth) और गाय (cow) के प्रति उसकी दया की यह सच्ची घटना जुलाई सन् […]

  • maharshi dadhichi महर्षि दधीचि का त्याग

    महर्षि दधीचि का त्याग Story of Maharishi Dadhichi in Hindi आजकल आये दिन हमारे कोई-न-कोई सैनिक सीमा पर दुश्मन की गोली से शहीद हो रहे हैं। वे राष्ट्र की रक्षा […]

  • kachua aur bandar कछुआ और बंदर

    कछुआ और बंदर – Moral Story in Hindi Tortoise and Monkey  बंदर (Monkey) और कछुए (Tortoise) की यह मोरल स्टोरी (moral story) अफ्रीका के जनमानस के बीच में बहुत प्रचलित […]

  • dr pitambar dutt barthwal डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल | हिन्दी के प्रथम डी.लिट्.

    डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल | हिन्दी के प्रथम डी.लिट्. 13 दिसम्बर 1901 को लैंसडौन (गढ़वाल) के निकट कौड़िया पट्टी के पाली गांव में पंडित गौरी दत्त बड़थ्वाल के घर पीताम्बर […]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*