जीवक कौमारभृत्य – Real Father of Medical Science

जीवक कौमारभृत्य – Real Father of Medical Science

तक्षशिला-वर्तमान
वर्तमान तक्षशिला

बहुत प्राचीन समय की बात है। मगध में उस समय सम्राट बिंबिसार राज करते थे। मगध की राजधानी राजगृह थी। उनके राज्य में सालवती नामक गणिका का निवास था।। एक दिन वह गर्भवती हो गयी। उसने अपनी इस स्थिति को यथासम्भव गोपनीय बनाये रखा। समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया और दासी के द्वारा उस नवजात शिशु को फिंकवा दिया।

संयोग से उस समय उस रास्ते से बिंबिसार के पुत्र राजकुमार अभय गुजर रहे थे। उनकी नज़र उस शिशु पर पड़ गयी। उन्हें उस पर दया आ गयी। उन्होने बच्चे का नाम ‘जीवक’ रखा गया जिसका मतलब होता है छोड़ देने के वावजूद भी जीवित रहने वाला। राजकुमार ने उसका पालन-पोषण की जिम्मेदारी का प्रबन्ध किया था इसलिए बालक का उपनाम ‘कौमारभृत्य’ पड़ा।

जब जीवक (Jeevak) कुछ बड़ा हुआ तो उसने उत्सुकतावश अपने माता-पिता के बारे में राजकुमार से जानना चाहा। पहले तो राजकुमार उसे वस्तुस्थिति के बारे में नहीं बताना चाहते थे पर जिद्द करने पर विवश हो कर उन्होंने सच बता ही दिया।

जीवक को विद्या अध्ययन के लिए तक्षशिला भेजा गया। उन्होंने आयुर्वेद का अध्ययन वहीं रह कर किया। अध्ययन की समाप्ति पर आचार्य ने उनकी परीक्षा ली कि तक्षशिला के पाँच-पाँच कोस चारों ओर घूमकर देखो और जो वनस्पति उपयोगी न हो, उसे ले कर आओ। जीवक को ऐसी कोई वनस्पति नहीं मिली जो अनुपयोगी हो। उन्होंने आचार्य के समक्ष अपनी असक्षमता व्यक्ति की। आचार्य शिक्षार्थी के ज्ञान से अति प्रसन्न हुए और कहा कि ऐसी कोई वनस्पति है ही नहीं जिसमे कि कोई न कोई औषधी गुण न हो। उन्होने कहा कि तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हो गयी है अब वे अपने क्षेत्र मगध जायें और बीमार लोगों की सेवा सुश्रुत करें।

जीवक ने आचार्य से प्रार्थना की कि वे गुरु के पास तक्षशिला में ही रहना चाहते हैं क्योंकि कुल-गोत्र न होने के कारण वे जहाँ भी जायेंगे लोग उनको हेय दृष्टि से देखेंगे। इस आत्मग्लानी के भाव के साथ वह कहीं नहीं जाना चाहते।

आचार्य ने समझाया कि वे जहाँ भी जायेंगे अपनी क्षमता, प्रतिभा और ज्ञान के बल पर सम्मान खुद अर्जित कर लेंगे। उन्होने कहा कि दुःखी, बीमार और अभावग्रस्त प्राणियों की सेवा में ही अपने आप को समर्पित कर दो, यहीं से तुम्हारी पहचान बनेगी।

मगध लौटते समय रास्ते में वे साकेत नामक स्थान पर विश्राम के लिए ठहरे। वहाँ के विख्यात एक सेठ की पत्नी वर्षों से सिर के दर्द से बीमार पड़ी थी। जीवक को जब इस बात का पता चला तो वे उपचार करने गये। उन्होंने सेठ की पत्नी को देखा और औषधी युक्त घी तैयार करवा कर सेठ की पत्नी के नाक मे वह घी डाला। महिला कुछ ही दिनों के अंतराल में ठीक हो गयी। सेठ ने प्रसन्न होकर उन्हें धन किया। जीवक की यह पहली चिकित्सा ओर आय थी।

आगे चल कर जीवक ने बहुत से असाध्य रोगों का इलाज किया। उन्होंने जिनका उपचार किया, उनमें मगध सम्राट बिंबिसार, अवन्ती के नरेश चण्ड प्रद्योत और भगवान गौतम बुद्ध का नाम उल्लेखनीय है।

सम्राट बिंबिसार को भगंदर रोग हो गया था। वे हर प्रकार से दुःखी थे तन से तथा मन से भी। राजकुमार अभय ने जीवक को पिता की चिकित्सा के लिए कहा। उनके द्वारा निर्मित औषधी से सम्राट ने रोग से मुक्ति पा ली। प्रसन्न होकर उन्होने जीवक को मगध का राजवैद्य नियुक्त कर दिया।

जीवक (Jeevak) की शल्यक्रिया का एक अभूतपूर्व उदाहरण मिलता है। वाराणसी के सेठ के पुत्र की आंतों में गांठे पड़ गयी थी।  Jeevak ने उसे देखा। पेट को चीर कर आँतें बाहर निकाली, गांठों को काट कर फैंक दिया और आंत को यथावत रखकर सी दिया। सेठ का पुत्र ठीक हो गया।

धीरे-धीरे जीवक का यश मगध से बाहर सभी जनपदों में फैल गया। बौद्धग्रन्थ-महावग्य के अनुसार अवन्ती का राजा चंड प्रद्योत बीमार हो गया। उसके निमन्त्रण पर जीवक ईलाज करने उज्जैन गये। प्रद्योत अत्यन्त क्रूर स्वभाव का था जिसके कारण नाम के साथ चंड विशेषण जुड़ गया था। यह बातउन्हें बहुत अच्छी तरह पता थी।

चंड को दी जाने वाली दवाई काफी तेज थी। दवाई का तत्काल प्रभाव को जीवक भली-भांति जानते थे। वे चंड की चिकित्सा तो करना चाहते थे पर साथ-ही-साथ उन्हें अपनी जान भी बचानी थी।

उन्होने राजा को दवा देने का समय निर्धारित किया। परिजनों को दवाई देने की मात्रा समझा कर वे जंगल से ओर औषधियाँ लाने का बहाना कर वहां से भाग निकले। इधर दवा लेते ही राजा को उल्टियाँ लग गयी। इससे उसे बहुत क्रोध आया और उसने काक नामक दास से जीवक को तुरन्त पकड़ लाने का आदेश दिया। काक ने कौशाम्बी तक दौड़-धूप कर जीवक को पकड़ ही लिया। वह जीवक को लेकर अवन्ती की तरफ चल दिया। जीवक ने रास्ते में काक को चतुरता से औषधी युक्त आंवला खिला दिया, जिससे काक की हालत खराब हो गयी। मौका पाकर वे काक की चंगुलता से छूट कर भाग निकले तथा सकुशल राजगृह पहुंच गये।

इधर औषधी से राजा प्रद्योत चंड बिल्कुल स्वस्थ हो गये। काक भी भला-चंगा होकर उज्जैन पहुंच गया। बीमारी दूर होने से प्रद्योत जीवक की काबिलियत से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने काक को बहुमूल्य उपहार के साथ राजगृह भेजा।

चिकित्सा के अपने अद्भुत गुणों के कारण सम्राट बिंबिसार के बाद उसके पुत्र अजातशत्रु पर भी जीवक का प्रभाव यथावत बना रहा।

‘बिनयपिटक’ के महावग्य में ऐसा उल्लेख आता है कि भगवान बुद्ध कुछ बीमार हो गये थे और जीवक कौमारभृत्य ने उन्हें दवाओं से स्वस्थ कर दिया।

इन महान चिकित्सक को अपने जीवनकाल में अनेक इतिहास पुरुषों का उपचार करने का अवसर मिला-यह उनके अद्वितीय गुण और अप्रतिम योग्यता के प्रणाम है। महावग्य नामक बौद्धग्रन्थ तथा जातक कथाओं में उनके चिकित्सकीय जीवन का जो विलक्षण वृतान्त मिलता है, उससे उनका अद्भुत व्यक्तित्व, औषधी ज्ञान, चिकित्सा कौशल, शल्यदक्षता, उदारता आदि विशिष्ट गुणों का विवरण प्राप्त होता है।

एक अनाथ जीवन लेकर ऐतिहासिक व्यक्तित्व बन जाने वाले जीवक का उदाहरण हमारे लिया हमेशा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

आभार-श्री मांगीलाल मिश्र, अरोग्य अंक-कल्याण और विकिपीडिया

पूरी लिस्टः Great personality of India – भारत के महान व्यक्तित्व


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