सबसे श्रेष्ठ मनुष्य कौन!

सबसे श्रेष्ठ मनुष्य कौन!

बौद्ध जातक में एक कथा का वर्णन है जिसमें एक बार काशी के राजमार्ग पर दो राजाओं का रथ आमने-सामने आ गये। बीच में एक पुलिया थी, जिसमें एक बार में एक ही रथ निकल सकता था। अतः दोनों रथों को रुकना पड़ा। अब समस्या यह थी कि किसका रथ पहले निकले। राज्य के क्षेत्रफल दृष्टि से, वैभव की दृष्टि से, शक्ति की दृष्टि से तथा अन्य सभी दृष्टिकोणों से विचार हुआ, किन्तु आश्चर्य, दोनो बिल्कुल समान थे।

तब विचार करने के बाद यह फैसला हुआ कि दोनों सारथी अपने-अपने राजा के आदर्श एवं गुणों का वर्णन करेंगे। समस्या की जटिलता प्रतिक्षण बढ़ती जा रही थी क्योंकि गुणों में भी दोनो एक समान थे।

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अन्त में एक सारथी ने कहा-‘हमारे राजा शास्त्र-अनुसार बुरों के साथ बुरा करो की नीति पर चलते हैं।’

इसपर दूसरे सारथी ने कहा-‘हमारे राजा इसके विपरीत ‘बुरों के साथ भी अच्छा व्यवहार करो’ की नीति पर चलते हुए प्रजा को सन्तुष्ट रखते हैं।

ऐसा सुनते ही प्रथम सारथी के रथ पर आरूढ़ राजा नीचे उतरते हुए बोले-‘सारथि अपने रथ को शीघ्र हटा लो, निर्णय हो गया है। हमारी तुलना में यह सामने वाला राजा ही श्रेष्ठ है।’

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सबसे श्रेष्ठ मनुष्य वह है,

  1. जो पराये को ही अपना स्वार्थ मानकर अपनी हानि होते देखकर भी दूसरों को लाभ पहुँचाता हैं
  2. उससे थोड़ा कम वह है, जो अपनी हानि न करके दूसरों का लाभ करता है।
  3. तीसरा वह है, जो अपना लाभ हो तो दूसरों का लाभ करता है।
  4. चौथा वह है जो केवल अपना ही लाभ देखता है, दूसरों की बाबत कुछ नहीं सोचता।
  5. पाँचवा वह है जो अपने लाभ के लिए दूसरों की हानि करने से भी नहीं हिचकता।
  6. छठा वह है जो अपना लाभ न होने पर भी दूसरों को नुकसान पहुंचाता है और
  7. सातवां वह है जो अपनी हानि करके भी दूसरों की हानि करता है। ऐसे व्यक्ति सबसे घटिया होते हैं। जब ऐसे लोगों की संख्या बढने लगती है तब सब तरफ अराजकता छा जाती है। मानव मानव का शत्रु हो जाता है तथा एक दूसरे से लड़ कर सब विनाश की तरफ जाने लगते हैं।

पाप वह है जिसके परिणाम में अपना और दूसरों का अहित हो। पुण्य वह है, जिसके परिणाम में अपना और दूसरों का हित हो। पाप और पुण्य की इस परिभाषा के अनुसार यह निश्चय करना चाहिए कि जिससे दूसरों का अहित होता होगा, उससे कभी भी अपना हित होगा ही नहीं और जिससे दूसरों का हित होता है, उससे अपना हित निश्चित रूप से होगा। अतः सदैव पर-हित में ही अपना हित समझ कर उसी में प्रवृत्त रहना चाहिए। इस प्रकार के विचारों वाले ही सबसे श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं। ऐसे लोग ही महान व्यक्ति की श्रेणी मे आते हैं।

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