सुधा चन्द्रन – यह मेरे सपने हैं

सुधा चन्द्रन – यह मेरे सपने हैं

sudha chandran

Inspirational Story of Sudha Chandran (Classical Dancer and Actor) who win the race of success without a leg in Hindi

बहुत कम ऐसे लोग देखने में मिलते हैं जिनके जीवन में त्रासदी होने पर भी वे आगे बढ़ने का हौसला नहीं खोते हैं तथा सफलता (success) का उच्च मुकाम हासिल करके सबको अचंभित करते हैं।

2 मई 1981 उस अभागे दिन को सुधा (sudha chandran) कभी नहीं भूल सकती। तमिलनाडू में चेन्नई से अपने घर वापिस जाते समय त्रिचुरपल्ली में उनकी बस एक ट्रक के साथ दुर्घटनाग्रस्त (accident) हो गयी। इस दुर्घटना (accident) में बहुत से लोग बुरी तरह घायल हो गये। हालांकि सुधा को सबसे कम चोट आयी थी, परन्तु घाव में गेंगरीन हो जाने के कारण डाक्टरों को उनका दायां पावं घुटनों के नीचे से काटना पड़ा।

सुधा चन्द्रन (Sudha Chandran) का जन्म 27 सितम्बर 1965 को मुम्बई में रहने वाले एक तमिल परिवार में हुआ था। जब ने सिर्फ तीन साल की थी तब से ही उनकी रूचि नृत्य में हो गयी थी। सुधा ने अपना पहला पब्लिक डांस प्रस्तुति स्कूल में आठ साल की उम्र में दिया। 17 वर्ष की उम्र होते-होते वे 75 स्टेज शोज कर चुकी थी।

पाँव की थिरकन ही तो सुधा की जिन्दगी थी, उनका शोक था, सपना (dream) था। उस वक्त लगा कि उनके लिए तो जैसे सब कुछ समाप्त हो गया हो। सुधा कई सालों तक सदमें में रहीं। एक दिन उनके पिताजी ने डा. सेठी और उनके जयपुर फुट के बारे में कहीं पढ़ा। वे बेटी को लेकर डा. सेठी से मिलने जयपुर गये। वहां सुधा के लिए नकली टांग बनाई गई तथा कई दिनों तक उसके साथ चलने का अभ्यास कराया गया।

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अब सुधा को हौसला और साहस आया। उन्होने दर्दनाक दुर्घटना को भूलकर फिर से अपनी रूचि की तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया। उन्होंने रात-दिन एक करके नृत्य का अभ्यास करना शुरू कर दिया। यह सब कुछ काफी पीड़ादायक था क्योंकि ज्यादा वजन और नृत्य की मुद्राओं के कारण पांव पर जोर पड़ने से दर्द और खून आना शुरू हो जाता था। परन्तु उनमें दृढशंकल्प (will power) इतना ज्यादा था कि उन्होंने इस विकट स्थिति (diverse conditions) से पार पा लिया और अपनी नृत्य कला में पारंगत होती चली गयी। उनको बस अब इंतजार था, एक अवसर का।

आखिर वह दिन आ ही गया। वे अपने पिता जी के पास गयीं और उन्हें बताया कि वे रविवार को सेंट जेवियर्स काॅलेज में अपनी कला की प्रस्तुति देंगी। पिता जी यह सुन कर दंग रह गये। उस दिन अखबारों की हेडलाइन थीLooses a Foot, Walks a Mile उनका पूरा शो खचाखच भरा हुआ था। वह घबराने लगी तो उनकी दादी ने कहा कि ‘चिन्ता मत करो, भगवान तुम्हारे साथ हैं….. चमत्कार को होने तो दो’।

उनका शो बहुत पसंद किया गया और सब लोगों ने खड़े होकर बहुत देर तक तालियों से उनको सम्मानित किया। पूरे देश में उनके बारे में चर्चा होने लगी। वे बताती हैं कि जब वे घर आयी तो पिता जी ने उनका पांव छुआ और कहा कि वे माँ सरस्वती के चरण स्पर्श कर रहे हैं और कहा कि उनकी बेटी ने असम्भव को संभव कर दिखाया है। सुधा बताती हैं कि यह उनके जीवन का सबसे भावनात्मक क्षण था जिसे कि कभी नहीं भूल सकती हैं।

महशूर फिल्म तेलुगी फिल्म प्रोड्यूसर रामोजी राव उनके प्रदर्शन से बहुत प्रभावित हुए। उन्होने सुधा की जिन्दगी पर फिल्म बनाई जिसमें मुख्य पात्र की भूमिका भी सुधा ने ही निभाई। यह फिल्म काफी सफल रही। वे रातों-रात स्टार बन गयी। उनको भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के द्वारा 33 वें राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में विशेष अवार्ड सिल्वर लोटस द्वारा सम्मानित किया गया। उनकी यह फिल्म ‘नाचे मयूरी’ की नाम से हिन्दी में भी बनाई गयी जिसमें कि सुधा ही मुख्य भूमिका में थी। इस फिल्म को पूरी दुनिया में सराहा गया।

उनकी हैरान कर देने वाली जीवन कथा 8-11 उम्र के बच्चों के स्कूल स्लेबस में है। आज भी सुधा विभिन्न टीवी सीरियलों और फिल्मों में पूरी तरह सक्रिय है तथा अपने प्रदर्शन से जनमानस को रोमांचित कर रही हैं। अब तक उनको बहुत सारे पुरस्कार और सम्मान ने नवाजा जा चुका है।

सुधा चन्द्रन (Sudha Chandran) की कहानी (story) हम सब के लिए प्रोत्साहित (inspiration) करने वाला उदाहरण है कि कैसे भयानक दुर्घटना को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया और विकलांगता के बावजूद दृढ इच्छाशक्ति (strong will power) के बल पर सफलता (success) का मुकाम छुआ। उन्होने दर्दनाक घटना को भूल कर आगे बढने का निर्णय लिया जबकि हम में से बहुत से लोगों के लिए जैसे सब कुछ रूक सा जाता है तथा नियती को भाग्य मान कर सपने देखना छोड़ देते हैं।

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7 thoughts on “सुधा चन्द्रन – यह मेरे सपने हैं

  1. हौसला बुलंद हो तो मनिल मिल ही जाती है….जरुरत है तो बस एक कदम बढाने की…बहुत बढ़िया और प्रेरणादायक कहानी है सुधा चंद्रन की…. शेयर करने के लिए धन्यवाद…

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