महर्षि दधीचि का त्याग

महर्षि दधीचि का त्याग Story of Maharishi Dadhichi in Hindi

आजकल आये दिन हमारे कोई-न-कोई सैनिक सीमा पर दुश्मन की गोली से शहीद हो रहे हैं। वे राष्ट्र की रक्षा के लिए बिना कोई खौफ खाये अपना शरीर तक देश के लिए न्योछावर कर रहे हैं। ये सभी सैनिक महर्षि दधीचि के त्याग और समर्पण की परंपरा के वर्तमान रूप हैं।

महर्षि दधीचि के विषय में कथा है कि ये अथर्वा ऋषि के पुत्र एवं ब्रह्मा जी के पौत्र थे। उनके आश्रम में बहुत से ऋषि-मुनि निवास करते थे। महिर्षि दधीचि बालब्रह्मचारी तथा जितेन्द्रिय थे। लोभ, भय उन्हें छू तक नहीं गया था। वे त्याग के साथ-साथ अन्याय का प्रतिकार करना भी जानते थे।

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देव-वैद्य अश्विनीकुमार ब्रह्मविद्या का उपदेश ग्रहण करना चाहते थे। वैद्य होने के कारण देवराज इन्द्र उन्हें हीन तथा ब्रह्मविद्या के लिए उपयुक्त नहीं समझते थे। अतः उन्होंने घोषणा कर रखी थी कि कोई भी अश्विनीकुमार को ब्रह्मविद्या का ज्ञान देगा, उसका सिर मैं ब्रज से छिन्न-भिन्न कर दूंगा। इन्द्र के भय से कोई भी ऋषि उपदेश देने को तैयार नहीं हुए। तब अश्विनीकुमार ने महर्षि दधीचि की शरण ली। दधीचि को यह अनुचित प्रतीत हुआ कि जज्ञासु विद्या के लिए याचना करता फिरे और उसे इन्द्र के भय से कोई ज्ञान प्रदान न करे। वे सहर्ष ब्रह्मविद्या का ज्ञान देने को तैयार हो गये। इन्द्र का प्रयत्न दधीचि के तेज के समझ निष्फल रहा।

महाबली वृत्रासुर के पराक्रम से त्रिलोक भयभीत हो रहा था। देवराज इन्द्र भी उसको पराजित करने में असमर्थ महसुस कर रहे थे। भयभीत देवता इन्द्र के साथ भगवान विष्णु की शरण में गये। उनकी प्रार्थना पर भगवान ने युक्ति बताई। ऋषि दधीचि से उनका शरीर जो विद्या, व्रत तथा तप के कारण अत्यन्त सुदृढ हो गया है, मांग लो। उनकी हड्डी वज्र निर्माण कर उससे युद्ध करो। उस वज्र से वृत्रासुर मारा जायेगा और तुम्हे विजय प्राप्त होगी।

इन्द्र वेष बदलकर दधीचि के पास डरते-डरते पहुंचे। दधीचि की तेजस्वी आंखें उन्हें पहचान गई। इन्द्र सहम गये। वे अपने रूप में आ गये। महर्षि ने उनके छल पर उन्हें फटकारा। इन्द्र अपनी गलती होने के कारण चुप रहे। ऋषि को उन पर दया आ गई। उन्होंने पूछा-अच्छा बताओ, कैसे आये?’ इन्द्र ने अपनी विपत्ति कह सुनाई और देवकार्य के लिये उनसे उनकी हड्डियाँ मांगी। दयालु ऋषि ने कहा यदि इस नश्वर शरीर से परोपकार हो जाता है तो अतिउत्तम है। मैं सहर्ष शरीर दान करता हूँ।

इसके बाद स्नान कर महर्षि दधीचि समाधि में चले गये। उनके ब्रह्मलीन हो जाने पर जंगल गौओ ने खुरदरी जीभ से उन्हें चाटना शुरू कर दिया। चमड़ी उधड़ जाने पर इन्द्र ने उनकी अस्थि से विश्वकर्मा द्वारा वज्र का निर्माण कराया तथा उसके द्वारा वृत्रासुर का वध किया। इनके शेष अस्थियों द्वारा अन्य महत्वपूर्ण अस्त्र-शस्त्र बने, जिन्हें देवों ने ग्रहण कर लिया।

महर्षि का यह अपूर्व त्याग धन्य है जो उन्होंने लोक उपकार के लिए अपना शरीर दान कर दिया।

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4 thoughts on “महर्षि दधीचि का त्याग

  1. आपका धन्यवाद और आभार।
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  2. बहुत अच्छी राजा शिवि और dadichi ऋषियो की त्याग मानव समाज के लिये प्रेणादायक। वे ऐसा त्याग इसलिए कर सके क्योंकि वे आध्यत्मिक शक्ति से ही सब कुछ करते थे ।ऐसा केवल भारत वर्ष में ही सम्भव है और कहीं नहीं।

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