प्राचीन चिकित्सा पद्धति हिलियोथेरपी

प्राचीन चिकित्सा पद्धति हिलियोथेरपी Ancient Heliotherapy  treatment in Hindi

कई प्राचीन संस्कृतियों में हिलियोथेरेपी (Heliotherapy) से ईलाज किया जाता था, जिसमें प्राचीन ग्रीस, मिस्त्र और प्राचीन रोम के लोग शामिल है। इंका, असीरियन और शुरूआती जर्मन लोग भी सूर्य की स्वास्थ्य के देवता के रूप में पूजा करते थे। प्राचीन भारतीय साहित्य में भी 1500 ईसा पूर्व जड़ी बूटियां और सूर्य की रोशनी से चर्म रोगों के ईलाज का वर्णन है। 200 ईसा काल के बौद्ध साहित्य और 10वीं शताब्दी के चीनी दस्तावेजों मे भी इसी प्रकार का उल्लेख है।

वैदिक काल में भारतीय भगवान सूर्य से अच्छे स्वास्थ की कामना करते थे। धार्मिक क्रिया-कलापों और आम जीवन में सूर्य का अति महत्वपूर्ण भूमिका थी। प्राचीन ऋषि मुनियों को मालूम था कि सूर्य से स्वस्थ्य लाभ मिलता है। सूर्य नमस्कार की पद्धति जिसमें कि उगते हुए सूर्य को प्रणाम किया जाता है आज भी पूरी दूनिया में योग का एक महत्वपूर्ण अंग है। सूर्य नमस्कार से शारीरिक और मानसिम व्यायाम के द्वारा अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है। यह अकेला अभ्यास ही सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचाने में समर्थ है। इसके अभ्यास से शरीर निरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है।

heliotharapy

प्राचीन यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स (Hippocrates), जिनको आधुनिक चिकित्सा का जनक भी कहा जाता है, ने सूर्य की रोशनी से कई प्रकार के रोगों के निदान के तरीकों का इजाद की।

यूनानी भाषा में ‘हिलियो’ का अर्थ है ‘सूर्य’’ और ‘थेरेपी’ का अर्थ है ‘चिकित्सा पद्धति’। प्राचीन काल में यह चिकित्सा पद्धति अत्यंत लोकप्रिय थी। प्राचीन यूनान में कई स्थानों पर सोलोरियम (सूर्य उपचार गृह) (Solarium) थे, जहाँ जाकर रोगी रोग चिकित्सा करवाते थे।

कहा जाता है कि प्राचीन रोम और यूनान में प्रायः 600 वर्षों तक कोई वैद्य ही नहीं थे, वैद्य की आवश्यकता ही नहीं पड़ी; क्योंकि ये लोग सूर्यकिरणों, विविध रंगों तथा जल, वायु और मिट्टी एवं व्यायाम इत्यादि के सही उपयोग द्वारा अपना उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखते थे।

इसी प्रकार सूर्य किरणों और रंगो द्वारा विविध प्रकार के रोग निवारण करने की एक अनोखी पद्धति भी थी, जिसे क्रोमोपैथी (Chromopathy) कहा गया है, जिसमें ‘क्रोमो’ का तात्पर्य रंग से है और ‘पैथी’ का तात्पर्य चिकित्सा से है।

यूनानी और रोमन शहरों में क्रोमोपैथी चिकित्सालय भी थे, जहाँ पर रंगचिकित्सा द्वारा रोगों को दूर किया जाता था। इस चिकित्सा में रंग-बिरंगी बोतलों में पानी भरकर बाहर से मिट्टी को लेप लगा कर धूप में तीन-चार दिन तक रख दिया जाता था जिससे उसमें चिकित्सा गुण आ जाते। अलग-अलग रंग की बोतलों को अलग-अलग रोग निवारण प्रभाव होते हैं। रोग के अनुसार इस जल को रोगी को पिलाने पर वह रोगमुक्त हो जाता है। जैसे संतरी रंग की बोतल का जल भूख बढ़ाता है। पीला रंग बदहजमी में, नीला रंग स्किन रोगों के उपचार में काम आता है। पैरालिसिस के मरीज को लाल रंग का जल पिलाकर लाल रंग के कमरे में रोक कर रोगमुक्त किया जाता था। इसी प्रकार विभिन्न रंगों के अनेका-नेक उपचार किये जाते थे।

प्राचीन मिस्र के लोग सूर्य रोशनी से संक्रमण का ईलाज करने में माहिर थे। प्राचीन मिस्र के डाक्टर सूर्य की रोशनी से जड़ीबूटियों को सुखकर रोगरहित बनाकर, उनसे विभिन्न दवाइयां बनाते थे। उन दवाइयों का शरीर पर लेप लगाकर सूर्य की रोशनी में मरीज को रखते थे।

आधुनिक चिकित्सा ने भी बड़ी हद तक इस पद्धति का अनुमोदन किया है इस चिकित्सा पद्धति के सिद्धांतों का आज भी विभिन्न रूपों उपयोग किया जाता है। डाॅ. नील फिनसिन (Dr. Niels Finsen) को टी.बी. का यू.वी. लाइट द्वारा इलाज का ईजाद करने के लिए 1903 में नोबल पुरस्कार दिया गया था। 2002 में जब बौस्टन में वैज्ञानिकों ने साबित किया कि कुछ देर धूप सेवन से बहुत प्रकार के कैंसर जैसे स्तन कैंसर, कोलन कैंसर आदि का खतरा काफी कम हो जाता है, तब कि यह बहुत बड़ी खबर थी। पहले माना जाने लगा था कि सूर्य की रोशनी से स्किन कैंसर का खतरा बढ़ता है, वास्तव में कुछ देर धूप सेवन से यह खतरा कम होता है।

Also Read : होमियोपैथी चिकित्सा-प्रणाली के तथ्य


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