रेलवे सिपाही की ईमानदारी (Railway cop honesty)

रेलवे सिपाही की ईमानदारी (Railway cop honesty)

railway cop

घटना 6 अप्रेल 1997 की है, जब मैं अपनी भतीजी के विवाह में पटना जाने के लिए जमुई रेलवे स्टेशन पर तूफान-एक्सप्रेस में बेटे के साथ सवार हुआ। बेटा सामान के साथ अन्दर था और मैं भीड़ के कारण पावदान पर ही खड़ा रह गया।

रेल खुल जाने के कारण जमुई पर उतरने वाले कुछ यात्री अपना सामान लिए-दिए घबराहट में नीचे कूद पड़े, उनके साथ ही मेरा वह वेडिंग भी नीचे गिर गया जिसे मैं नहीं देख सका। घंटो बाद अपने वेडिंग को पूरे डिब्बे में खोजा गया, परन्तु नहीं मिला। बड़ा दुःख हुआ।

आठ दिनों को वापिस आने पर मैंने जमुई रेलवे स्टेशन मास्टर से सम्पर्क किया। सामान का कोई पता न लगने की बात जानकर मैं उदास और निराश हो गया।

दूसरे दिन किसी कार्य से मुंगेर जाने के लिए जब मैं पुनः जमुई रेलवे-स्टेशन पर पहुंचा और एक रेलवे-सिपाही से अपने सामान के बारे में पूछ-ताछ की, तब उसने बताया कि ‘हाँ, एक विस्तरबंद तो कल ही मैंने जमा किया है। देख लें, कहीं आपका ही तो नहीं है।’ जा कर देखा तो वह मेरा ही था। अपने खोए हुए सामान को पाकर मेरा खुशी का ठिकाना न रहा। सभी सामान बिल्कुल ज्यो-का-त्यों था।

सिपाही की कर्तव्यपरायणता से मैं बहुत प्रभावित हुआ। मैंने उसे कुछ पैसे देने चाहे, पर उसे स्वीकार नहीं किया। अपने घर वापिस आने पर जब परिचितों और पड़ोसियों ने यह घटना सुनी तो सभी ने एक स्वर में रेलवे सिपाही की सराहना की।

प्रस्तुतिः देवेन्द्र तिवारी
Email id: devendratiwari1955@rediffmail.com

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4 thoughts on “रेलवे सिपाही की ईमानदारी (Railway cop honesty)

  1. वाकई में रेलवे कर्मचारी ने ईमानदारी की एक मिसाल पेश की है| आशा है लेखक भी ज़िन्दगी में इस कर्ज को कहीं न कहीं अवश्य उतारेंगे|
    धन्यवाद

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