फ्लोप लाइफ (Flop Life)

फ्लोप लाइफ (Flop Life) in Essay

आपने दूरदर्शन (Television) पर स्व. जसपाल भट्टी (Jaspal Bhatti) का फ्लोप शौ (Flop Show) देखा ही होगा, ऐसे में मेरी कल्पना में राजेश की फ्लोप लाइफ (Flop Life) है जो कहानी का नायक है। जैसा कि हमारी ज्यादातर हिन्दी फिल्मों का नायक बड़ी जटिल परिस्थितियों में बाल अवस्था बिताता है और बड़ा होकर एक होनहार देशभक्त, समाजसेवक और न जाने कितने गुण उसमें शामिल होते हैं। एक तरफ उससे अपनी माँ के आँसू नहीं देखे जाते और दूसरी तरफ उसे गुंडों से लड़ना पड़ता है। ऐसे ही अनेकानेक बाधाओं से जूझने वाला हीरो आज वो आज वो 80 वर्ष का हो चुका है, उसे लगता है जैसे पलक झपकते ही उसने जिन्दगी के 80 वर्ष बिता दिये। “मैंने क्या किया उस समाज एवं अपने राष्ट्र के लिए जो बचपन से ही स्वर्णिम बनाने की कल्पना संयोजी थी” राजेश अपनी बीती जिन्दगी की कल्पनाओं में खो जाता है।

किताब के पन्नों की तरह अपनी बीती जिन्दगी का बिताया हुआ एक-एक पल उसे याद है गनिमत ही थी कि राजेश ने परिस्थितियों से हार कर आत्महत्या नहीं की थी। वह हर सुबह नई जिन्दगी की शुरूआत लेकर जागता और रात तक हारी हुई बाजी की तरह हर दिन की जिन्दगी का अन्त कर देता।

बचपन में पैदल चलते-चलते, राजेश सपनों की दुनिया में खो जाता था। एक कहानी की शुरूआत करता और गंतव्य स्थान पर पहुँचने तक उसको अंतिम परिणाम तक पहुँचा देता था।

राजेश की आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा है। ये क्या जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसकी सारी प्लालिंग धराशाही हो गई। वक्त की मार उस पर ऐसी पड़ी की जब भी वो हालात सम्भलने की कोशिश करता वैसे ही अचानक कोई ऐसी घटना घट जाती और उसके सपनों का संसार चकनाचूर हो जाता।

बच्चों के आपस में झगड़ने की आवाज आ रही है। राजेश का ध्यान हट जाता है और अपने पोते-पोती के झगड़े की तरफ चला जाता है। अपने बचपन में वो बिल्कुल अकेला था और आज भी अकेला है। सब छोड़ गए हैं उसे, कोरी सत्यवादिता, भोलापन और सिद्धान्तवादी होने की सजा उसे मिल रही है। आज उसके पास बैठकर बात करने वाला कोई नहीं है। उसे सैर पर ले जाने वाला कोई नहीं है। परिवार के सदस्य भी राजेश को पसन्द नहीं करते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को समझने की कोशिश ही नहीं की। कोई भी आ जाता औ़र चल देते यह सोचे बिना कि अपने रोजगार का भी नुकसान हो रहा है।

आज न उनको बेटा उन्हें पूछता है, न बेटी, पत्नी भी घर का काम कर-करके थक गई, बच्चे भी ऐसे निकले की ना माँ का हाथ बंटाते थे, न बाप का। एक रात खांसते-खांसते जो सोई तो सुबह उठी ही नहीं। अब पछताने से क्या होने वाला है। कौन देखभाल करेगा, क्या ये संस्थाएं या समितियों के संचालनकर्ता कोई सहयोग दे पायेंगे। मिथ्या प्रशंसा का गर्व अब आंखों में आंसुओं के अतिरिक्त कुछ नहीं दे पाएगा। यह जानते हुए राजेश ने अपनी आँखों को गंदे रूमाल से साफ कर दिया। रूमाल को देखते ही राजेश फिर कल्पना सागर में खो गया, पत्नी आवाज लगा रही थी, रूमाल ले लिया या नहीं, पत्नी पास आ जाती रूमाल लेकर।

ऐसे कितने ही व़ाकयात जुड़े थे उनकी जिन्दगी से, पर

अब हाथ मलने से क्या होगा जब चिड़िया चुग गई खेत।

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