मानवता के गिरते स्तर में पुराने किस्सों का मोल

मानवता के गिरते स्तर में पुराने किस्सों का मोल

आज अच्छे साहित्य को पढ़ने का समय ही कहाँ रह गया है। फिल्मों एवं दूरदर्शन के सीरियलों में जो कुछ भी दिखाया जा रहा है, उसके अक्रोश, घृणा एवं स्वार्थ को समाज में बढ़ावा ही मिल रहा है। ऐसा नहीं कि सब कुछ गलत ही दिखाया जाता है अपितु ऐसा कह सकते हैं कि लोगों की मनोवृत्ति पर हावी होने वाले संदर्भ दिखा कर,अपने सीरियलों की लम्बाई बढ़ाते जाते हैं।

आज समाज (society) में बढ़ती हुई अराजकता को रोकने के लिए जरूरी है कि अच्छे साहित्य को बढ़ावा दिया जाए जो लोगों की भावनाओं को मानवता के प्रति समर्पित करें और ऐसे ही साहित्य पर फिल्मों एवं सीरियल बनाए जायें जो आम लोगों के दिलों को छू सकें।

आज मानवता (humanity) का स्तर जरूरत से ज्यादा नीचे गिर चुका है। भीड़ बढ़ती जा रही है। जरूरतें बढ़ती जा रही हैं। नई-नई टेकनोलाजी आ जाने से सुविधा के सामान की भरमार हो गई है। बस अब पैसा फैंकने की देर है सारी सुविधायें आपकी झोली में आ जायेंगी।

सुविधायें जुटाने के चक्कर में आज धन जुटाने की होड़ लग गई है। आम आदमी भी सम्बन्धों के घेरे से दूर होता चला जा रहा है। कोई अनुशासन, कोई कानून मानने को तैयार नहीं है और तो और कानून के रक्षक ही भक्षक हो गये हैं।

ऐसे में आतंकवाद (terrorism) की बढ़ती हुई जड़ें आग में घी का काम कर रही है। कहाँ से लाआगे, दूसरे महात्मा गाँधी, सरदार पटेल, लाल बहादुर शास्त्री। आज इस देश को जरूरत है एक ऐसे ईमानदार नेता की जो इस कदर मजबूत हो कि उसके साथी नेता एवं अधीनिष्ट अधिकारी भी उसके फैसलों का समर्थन करें। जनसंख्या पर लगाम कसी जाये। गांवों में इतनी अधिक सुविधायें हों कि शहरों की तरफ पलायन को रोका जा सके।

इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, देश में शिक्षा की क्रांति लानी होगीं अभी तक जब भी सरकारें बनी हैं शिक्षा मंत्री कामचलाऊ ही बनाये गए। शिक्षा मंत्रालय एवं शिक्षा विभागों को उच्च स्तर का दर्जा दिया जाए। अच्छे साहित्य के पाठ्यक्रम बनाये जायें। शिक्षा राजनीति से ऊपर हो। सम्पूर्ण राष्ट्र का एक सा पाठ्यक्रम हो। शिक्षा में जातिवाद और पैसे की जड़ों को काट फैंकना होगा। फिल्मों एवं दूरदर्शन पर सेंसर की कैंची और तेज किया जाए। समाज को स्वर्ग बनाना है न कि नरक।

“मानवता के गिरते स्तर से जीवन की शान्ति भंग हो रही है। जीवन नीरस हो रहा है। आओ आज मिलकर यह प्रण करें कि हम जीवन में रस भर देंगे। आधुनिकीकरण की होड़ मे मानवता को जीवित रखना है। ऐसा न हो हमारी पवित्र धरती पर अराजकता फैल जाए और ईश्वर द्वारा दिए गए जीवन के अमूल्य क्षणो का हम रसपान भी न कर पायें”।

छोटी-छोटी बातें हमारे जीवन में बहुत बदलाव ला सकती है। मनुष्य स्वभाव आत्मकेन्द्रित है। मन की चंचलता के वशीभूत होकर, मनुष्य बहुत सी बातें हमारे जीवन में बहुत बड़े परिवर्तन कर देती है और हमारे जीवन का अन्दाज ही बदल देती है।

भुने हुए चने Roasted Grams

एक बार दक्षिण कर्नाटक के बेलगाँव जिल की महिला सन्तान न होने के कारण बहुत दुःखी रहा करती थी। जिसने जो बताया, उसने बड़ी श्रद्धा के साथ अपनाया, लेकिन फिर भी उसकी गोद सूनी की सूनी रही। अन्त में उदास मन लेकर वह सन्तान पाने की लालसा में चिदम्बर दीक्षित के पास पहुँची। दीक्षित जी सिद्ध पुरुष, समाजसेवी और लोकोपकारी व्यक्ति थे। वह दूसरे के दुःख और दर्द को अपना दुःख समझ कर दूर करने का भरसक प्रयत्न करते थे।

जब महिला वहाँ पहुँची, उस समय दीक्षित जी के पास बर्तन में कुछ भुनू हुए चने रखे थे। उन्होंने उस महिला को अपने पास बुलाकर दो मुट्ठी चने दे लिए और कहा, “उस आसन पर बैठ कर चना लो।” उस ओर कई बच्चे भी खेल रहे थे। छोटे-छोटे बच्चों को अपने पराये का ज्ञान कहाँ होता है, वे खेल बन्द करके महिला के पास इस आशा में खड़े हो गए कि महिला उन्हें चने खाने को देगी। पर महिला तो मुँह फेर कर अकेली ही चने खाती जा रही थी। बच्चे लालच भरी दृष्टि से उसे ताकते रहे।

चने खत्म होने पर महिला ने दीक्षित जी के पास पहुँची और अपना दुखड़ा रोया और दीक्षित से उपास बताने का आग्रह किया। दीक्षित जी महिला पर क्रोधित होते हुए कहा तुमने मुफ्त में मिले चनों में से भी बच्चों को चार दाने भी नहीं दिए फिर भगवान तुम्हें हाड़मांस का बच्चा भला क्यों देने लगा? उदार भगवान से और भी अधिक, उदारता पाने वालों को अपना स्वभाव और चरित्रा में भी लानी चाहिए। उन्हें अधिक से अधिक उदार बनाने का प्रयत्न करना चाहिए तभी ईश्वर भी उनकी सुनते हैं।

दीक्षित जी के प्रवचनों ने महिला की जिन्दगी ही बदल दी और उसने अपने को समाज को समर्पित करने का फैसला ले लिया। अब उसे बच्चों से इतना स्नेह हो गया कि उसे सभी बच्चे अपने लगने लगे।

सर्वश्रेष्ठ उपहार Best Gift

हमारे जीवन मे कई बार ऐसे वाकया हो जाते हैं जो हमें जिन्न्दगी की बारीकियों की समझ देते हैं। आइनन हावर जब अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए तो उन्हें अनगिनत उपहार मिले। उन उपहारों में एक से बढ़कर एक ओर बहुमूल्य चीजें थी, लेकिन उनमें एक मामूली सी झाड़ू भी शामिल थी। राज्य की व्यवस्था में फैली गन्दगी को साफ करने की सलाह दी गई थी। राष्ट्रपति ने उसे सर्वश्रेष्ठ उपहार माना जिसके जरिए वे देश की आत्मा से सीधे बातचीत कर सके। काश हमारे देश में भी ऐसे नेता या पदाधिकारी हो जाते जो जनता की भावनाओं को समझ पाते।

हमारे नेताओं की बात ही क्या कहें वे तो ऐसे ज्ञानी बन गए हैं कि उनके ऊपर चढ़ा अज्ञान का पर्दा उन्हें दिखाई ही नहीं देता। ऐसे ज्ञानी-अज्ञानियों से भी खतरनाक होते हैं। खलील जिब्राह के शिष्य ने एक बार पूछा क्या कभी-कभी ज्ञान अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। खलील जिब्राह ने समझाया कि जब ज्ञान इतना घमंडी हो जाए कि न वो रो सके, और इतना गम्भीर बन जाए कि वो हंस भी न सके तथा इतना आत्मकेन्द्रित बन जाए कि वह अपने सिवाय और किसी कि फिक्र न करे तो ज्ञान-अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक होता है।

ईश्वर की इस धरातल पर तरह-2 के चेहरे और विभिन्न विभूतियों को देखने समझने का मौका मिलता है। यह जरूरी नहीं है कई बुद्धिमान एवं समझदार लोग जोकि समाज में कोई विशेष प्रकार से प्रशंसा के पात्र नहीं बन पाते हैं। ऐसे असंख्य लोग होंगे जो केवल अपने दायरे में सिमटे हुए भी समाज का किसी न किसी तरीके से भला करते रहते हैं।

विद्यालय में दाखिला

ऐसे ही एक विद्यालय की शिक्षिका थी अनामिका, विद्यालय में दाखिले में अन्तिम दो-तीन दिन रह गये थे। अनामिका मैडम को दाखिले सम्बन्धी कार्य देखने थे। उनके पास एक बच्चा, अपने पिता के साथ आया। मैडम ने बच्चे से पूछा, ‘बेटा अपना पुराना स्कूल क्यों छोड़ना चाहते हो?’ बच्चे ने मुँह बनाकर कहा, ‘वहाँ के बच्चे बहुत गन्दे हैं, वे हमेशा शैतानी करते हैं। न खुद पढ़ते हैं, न दूसरों को पढ़ने देते हैं।’ मैडम ने बड़े प्यार से बताया, ‘बेटा! इस स्कूल के बच्चे भी कुछ ऐसे ही हैं।’ उस बच्चे के पिता से कहा इस बच्चे को किसी अन्य विद्यालय में दाखिला दिलवाइए।

इसके बाद दूसरा बच्चा दाखिले के लिए आया। मैडम ने वही प्रश्न दोहराया। बच्चा उदास हो गया, उसने बताया कि मैडम सभी मेरे दोस्त थे और मेरी हर परेशानी में मेरी सहायता करते थे परन्तु विद्यालय घर से काफी दूर है और अपने-जाने में बहुत परेशानी होती है, इसलिए स्कूल बदलना पड़ रहा है।

मैडम ने कहा, “यहाँ के बच्चे भी खूब मेहनती है, तुम्हें वैसा ही प्यार वह सहयोग देंगे।”

मैडम ने उस बच्चे को दाखिला दे दिया। बच्चे ने मैडम के पाँव छूकर मैडम का धन्यवाद किया एवं पिता जी ने भी हाथ जोड़कर धन्यवाद दिया।

पढ़ने में कितनी साधारण सी बात लगती है। लेखक ने मैडम के द्वारा पहले बच्चे को दाखिला न देकर स्कूल एवं बच्चे ने दोनों का फायदा किया। बच्चा अपने ही साथियों एवं स्कूल की बुराई कर रहा है। इस स्कूल में दाखिला मिलने पर भी उस बच्चे की एवं उसके अभिभावकों की संतुष्टि नहीं होती। हो सकता हे वो इस स्कूल को भी छोड़ जाता और इस स्कूल की एवं यहाँ के बच्चों की बुराई दूसरे स्कूल में करता। उस बच्चे की तुलना में दूसरा बच्चा अपने साथियों एवं स्कूल से प्रसन्न था और दूरी की वजह से स्कूल छोड़ने के कारण, उदास हो गया था।

अच्छे बच्चों के आगमन से स्कूल और अच्छा हो जाएगा और उस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी एक अच्छे वातावरण को जन्म देंगे। इसमें शिक्षिका की भूमिका कितनी प्रशंसनिय है। ऐसे ही संसर में कितने किरदार हैं जिनकी पहचान ही नहीं बन पाती है।

आज भी परिश्रमी लोगों के लिए कुछ भी कर पाना मुश्किल नहीं है। पुरातन काल से ही परिश्रमी व्यक्तियों को सम्मानित किया जाता रहा है।

कौआ और गोरैया Crow and Goraya

मनुष्य हो या जीव जन्तु भावना है और मन में विश्वास है तो कोई छोटे से छोटा प्राणी भी एक बहुत बड़ा उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है। ऐसा उस नन्हीं गोरैया ने किया:-

एक बार एक जंगल में भयानक आग लग गई। सभी आग बुझाने में जुट गए। जिसके हाथ में जो पात्र आया, उसमें पानी भर-भर कर आग पर उड़ेलने लगा। सभी को आग बुझाने में जुटे देख एक नन्हीं गोरैया भी अपनी चोंच में पानी भर-भर कर आग में डालने लगी।

एक कौआ दूर एक सुरक्षित डाल पर बैठा यह तमाशा देख रहा था। वह गोरैया के पास आकर बोला, “नन्हीं गोरैया क्या तुम समझती हो कि तुम्हारी नन्हीं चोंच से बूंद भर पानी इस भयंकर आग को बुझाने मेें कोई सहायता कर सकेगा?”

गोरैया ने जवाब दिया, ‘यह तो मैं नहीं जानती पर एक बात जरूर जानती हूँ कि यदि कभी इस आग के बारे में बातें होंगी, तो मेरा नाम आग लगाने वालों अथवा तमाशा देखने वालों में नहीं बल्कि आग बुझाने वालों में लिया जाएगा।’

क्या आपको लगता है आज के समाज में आग बुझाना तो दूर, उसका प्रयास ही कितने लोग कर पाते हैं। नन्हीं गोरैया के छोटे होने से क्या होता है, कार्य बड़ा होना चाहिए।

नन्हीं गोरैया का कार्य किसी संत के द्वारा किए गये कार्य से कम नहीं है।

संत रविदास और खोटे सिक्के

संत रविदास जूते सील कर अपने रोज़ी-रोटी चलाते थे। इस बार वे संतो के किसी समागम से अपनी दुकान पर लौटे, तो उनके एक शिष्य ने शिकायत की, “गऊ घाट वाला रामजतन मुझसे जूते सिलाने आया था। सिलाई के बदले खोटे सिक्के दे रहा था, ठगना चाहता था। मैंने जूते सिलने से मना कर दिया।”

संत रविदास ने मुस्कराकर अत्यन्त सहज भाव से कहा, “क्यों नहीं सिल दिए? मुझे तो हमेशा ही खोटे सिक्के देता है।”

शिष्य ने सोचा था कि रविदास कहेंगे कि ठीक किया लौटा दिया। लेकिन यह तो उलटी ही बात सुनने को मिली। उसने पूछा, ‘गुरुजी, ऐसा क्यों?’

रविदास ने समझाया, “यह सोचकर सिल देता हूँ कि उसे कोई परेशानी न हो।”

“और खोटे सिक्कों का क्या करते हैं?” शिष्य ने पूछा।

“उन्हें जमीन में गाड़ देता हूँ, ताकि कोई और दूसरा उसकी वजह से ठगा न जाए।” रविदास ने बताया।

ऐसे संतों का जमाना अब कहाँ लौट पाएगा जिन्हें अपने नुकसान से ज्यादा, दूसरे के कष्ट का ज्यादा ख्याल है और उसकी ठगी से भी दूसरों को बचाना है और फिर आर्थिक नुकसान भी सहना है ताकि कोई और न ठगा जाए। आज की भाषा में कहें तो आज के प्रेक्टीकल युग में ऐसा कर पाना असम्भव सा दिखता है। परन्तु उस भाव में छिपे मूल मंत्र को समझने की कोशिश करें तो कितनी गहरी है। मानवता जिसका आज अर्थ ही लुप्त हो रहा है। पुरातन काल में आम आदमी भी दूसरे के कष्ट को समझ कर, उसकी सहायता कर देता था और बुरे व्यक्ति की दृष्टता को क्षमा कर देता था।

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