संकटमोचक मैकेनिक

संकटमोचक मैकेनिक (Unforgettable Help of Mechanic) 

mechanic bus

सन् 2000 में उत्तरकाशी से गंगोत्री वापिस आते समय, बस खराब हो गई थी। ड्राईवर (driver) ने काफी प्रयास किया परन्तु बस स्ट्रार्ट नहीं हो पाई। अंधेरा होने वाला था, आस-पास कोई बस का mechanic भी नहीं मिल पाया। जो लोग मिलें उन्होंने कहा कि रात को यहाँ रूकना खतरनाक है। यह सुनते ही बस की महिला यात्री रोने लग गई। जब कोई बात नहीं बनी तब सभी से हनुमान चालीसा का पाठ करने को कहा गया। यात्री पाठ करने लगे और हमने एक दो यात्रियों के साथ आती-जाती बसों को रोकने का प्रयास शुरू किया परन्तु बसें नहीं रूकी।

काफी देर बार एक बस को रोकने में हम कामयाब हो गए। हमने ड्राईवर को बताया कि आस-पास कोई bus mechanic मिल जाये तो हमारा काम बन जाएगा। कृपया करके एक व्यक्ति को वहाँ तक छोड़ दें।

उस बस में बैठे हुए एक व्यक्ति ने पूछा कि बस में क्या खराबी है। मैं देख लेता हूँ। और वह व्यक्ति अपना थैला लेकर उतर गया। वह बस अपने गन्तव्य को चली गई। उसने देख कर बताया कि बस (bus) का एक छोटा सा पुर्जा खराब हो गया है वह नया लगाना पड़ेगा। अब वह पुर्जा रात में पहाड़ों में कहाँ मिलेगा। इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि शायद मेरे थैले में एक पुर्जा है लगा कर देख लेते हैं और उस आदमी का प्रयास सफल हो गया। गाड़ी स्ट्रार्ट हो गई। सभी ने हनुमान जी की जय-जयकार की।

Mechanic से मेहनत एवं सामान की राशि चुकाने की बात आई तो उसने पैसे लेने से मना कर दिया। उसने कहा कि हनुमान जी भगवान की पूजा की जा रही थी इससे अधिक में क्या लूँ, मुझे रास्ते में मेरे गाँव के पास छोड़ देना। वह रास्ते में अंधेरे में उतर गए और औझल हो गए। वास्तव में संकटमोचक ही मैकेनिक के रूप में आये थे। उस संकट की विकट घड़ी में हमें जिस तरीके से बचाया है।

प्रेषक: दलीप कुमार, द्वारका, दिल्ली

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