ईमानदारी का फल

ईमानदारी का फल

लालच imandar balak

किसी अमीर के घर में एक दिन सोफासेट ठीक करने के लिए एक कारपेन्टर को बुलाया गया। उसकी उम्र 16 साल के करीब रही होगी। वह कार्य करने लगा। उस समय वह अकेला ही था। उसने सोफा के किनारे पर एक सोने की चेन फंसी हुई देखी। वह चेन को हाथ में उठाकर देखने लगा। चेन को देखकर उसके मन में लालच आ गया। उसने कहा-‘काश! ऐसी चेन मेरे पास होती तो माँ को देता, उनके गले में यह कितनी अच्छी लगती।’

उसके मन में पाप आ गया था। परन्तु दूसरे ही क्षण वह घबराकर बड़बड़ा उठा-‘अरे रे! मेरे मन में यह कितना बड़ा पाप आ गया। यदि मैं चोरी करके पकड़ा जाऊँगा तो मेरी कितनी दर्दशा होगी। माँ के लिए लोग कितना ताना कसेंगे कि देखो चोर की मम्मी है। कौन कभी चलते-फिरते कारीगर को अपने घर काम पर बुलायेगा। हम जैसे लोगों पर कौन विश्वास करेगा। कौन हमें अपने घर में घुसने देगा?

यदि मैं इनके हाथ से न भी पकड़ा गया तो भी क्या हुआ। ईश्वर के हाथ से तो कभी छूट नहीं सकता। माँ बार-बार कहा करती है कि हम ईश्वर को नहीं देखते, पर ईश्वर हमको सदा देखता रहता है। उससे छिपाकर हम कोई काम कर ही नहीं सकते। वह तो हमारे मन के भीतर की बात को भी देखता रहता है।’ यों कहते-कहते कारीगर लड़के का चेहरा एकदम उतर गया, उसका शरीर पसीने-पसीने हो गया और वह काँपने लगा।

वह बड़बड़ाने लगा-‘लालच बहुत ही बुरी चीज है। मनुष्य इस लालच में फँसकर ही चोरी करता है। भला, मुझे धनियों की अमानत से क्या मतलब था? लालच ने ही मेरे मन को बिगाड़ा, पर भगवान ने मुझको बचा लिया, जो माँ की बात मुझे वक्त पर याद आ गयी। अब मैं कभी लालच में नहीं पडूँगा। सचमुच चोरी करके अमीर बनने की अपेक्षा ईमानदारी की राह पर चलकर गरीब रहना बहुत अच्छा है। चोरी करने वाला कभी भी सुख की नींद नहीं सो सकता, चाहे वह कितना ही अमीर क्यों न बन जाए। अरे! चोरी का मन होने का यह फल है कि मुझे इतना दुख हो रहा है। कहीं मैं चोरी कर लेता तब तो पता नहीं मुझे कितना कष्ट झेलना पड़ता।’

इतना कहकर लड़के ने मालकिन को आवाज़ लगा कर बुलाया और उन्हें वह सोने की सौंप सौंप दी।
ऐसा नहीं कि मालकिन को अभी पता चला था। वह कुछ देर से उस लड़के की हरकत को चुपचाप दूसरे कमरे से देख रही थी।

उसने बड़े मीठे स्वरों में कहा-‘बेटा! मैंने तेरी सभी बातें सुनी हैं। तू गरीब होकर भी इतना भला, ईमानदार और ईश्वर से डरने वाला है-यह देखकर मुझे बड़ी खुशी हुई है। तेरी माँ को धन्य है जो उसने तुझे ऐसी अच्छी सीख दी। तुम पर ईश्वर की बड़ी कृपा है, जो उसने तुमको लालच में न फँसने की ताकत दी।

बेटा! सावधान रहना। कभी जी को लालच में न फँसने देना। तू यह काम छोड़ कर कल से अपनी पढ़ाई जारी रख। तुम्हारे खाने-पीने, किताबों और फीस का प्रबन्ध मैं करूंगी। भगवान तेरा भला करेंगे।’ इतना कहकर मालकिन ने उसे अपने हाथों से उठाकर हृदय से लगा लिया।

मालकिन के स्नेह भरे शब्दों से लड़के का हृदय खुशी के मारे उछल उठा। उसके मुख पर प्रसन्नता छा गयी वह दूसरे ही दिन से स्कूल जाने लगा और अपने परिश्रम तथा सत्य के फलस्वरूप आगे चलकर वह बालक बहुत बड़ा आदमी बना तथा उसने समाज में बहुत प्रतिष्ठा पायी।

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