खलीफा के बाज़ – Motivational story

खलीफा के बाज़ – निरंतर गतिशील रहें – Motivational story

khalifa ke baaj

काफी पुराने समय की बात है। साऊदी अरब के उत्तर-पूर्व दिशा मे जुबैल नाम का एक छोटा सा शहर था। चारों ओर से रेत के पहाड़ों से घिरा होने के कारण वहाँ पेड़-पौधे बहुत कम पाये जाते थे।

शहर में एक खलीफा रहता था। उसका महल बहुत ही सुंदर और आलीशान था। महल में कई नौकर-चाकर उसकी तीमारदारी में लगे रहते थे। खलीफा ने अपने महल के बाग में हरियाली बनाये रखने के लिए कुछ पेड़-पौधे लगवाये थे जिन पर सुबह-सुबह कुछ पक्षियों के आने-जाने और उनकी चहचहाट से खलीफा का मन प्रसन्न रहता था।

एक बार खलीफा अपने व्यापार के सिलसिले से शहर से दूर गया। वापिसी के समय रास्ते में उसे एक शिकारी मिला जिसके हाथ में एक बाज़ पक्षी का जोड़ा था। वह उन्हें बेचने के लिए जोर-जोर से आवाज़ लगा रहा था। खलीफा रुक कर उसे देखने लगा। वह शिकारी तुरन्त खलीफा के पास आ गया और कहने लगा-

‘जनाब! ले लो यह जोड़ा। बहुत बेहतरीन जोड़ा है। यह आसमान में बहुत ऊँची और लम्बी उड़ान भरता है।’

खलीफा ने सोचा कि उसके शहर अथवा राजमहल में मनोरंजन का कोई साधन तो नहीं है क्यों न इस जोड़े को ले लूं और इनकी उड़ान देख-देख कर मनोरंजन कर लिया करूंगा। ऐसा विचार कर उसने बाज़ का जोड़ा खरीद लिया। वह अपने शहर जुबैल लौट आया।

कुछ दिन पक्षियों को नये परिवेश में ढ़ालने के बाद शिकारी के कहे अनुसार उसने दोनों पक्षियों को एक साथ उड़ाया और दोनो ही सरपट आसमान की तरफ उड़ चले। एक बाज तो लम्बी उड़ान भरता रहा लेकिन दूसरा बाज एक उड़ान भरकर तुरन्त उस पेड़ की डाल पर वापिस आकर बैठ गया। दूसरा बाज़ भी काफी देर तक उड़ने के बाद वापिस उसी डाल पर आ गया जिस डाल पर से वह उड़ा था।

खलीफा को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि एक बाज़ तो खूब देर तक उड़ता रहा और दूसरा बाज़ जल्द ही वापिस भला क्यों आ गया। उसने सोचा कि शायद वह थका हुआ होगा। लेकिन अगले दिन फिर वैसा ही हुआ। खलीफा परेशान हो गया। उसने शिकारी को बुलवाया और यह बात बताई। शिकारी भी दूसरे बाज़ को देर तक नहीं उड़ा पाया।

खलीफा ने शहर में ढ़िंढोरा पिटवा दिया कि जो कोई भी उसके दोनों बाज़ों को देर तक आसमान में उड़ान भरवायेंगे वह उसे बड़ा ईनाम देगा। अगले ही दिन शिकारी खलीफा के महल में आने लगे और विभिन्न युक्ति लगाकर उन्हें देर तक उड़ाने का प्रयत्न करने लगे। लेकिन कोई भी दोनों बाज़ों को देर तक उड़ान नहीं भरवा पाया। उनमें से एक बाज़ थोड़ी सी उड़ान भर-कर वापिस उसी डाल पर आकर बैठ जाता था।

कुछ दिनों बाद दूसरे शहर से एक शिकारी आया और उसने यह सारी स्थिति देखकर खलीफा को कहा कि वह उन दोनों बाज़ों को देर तक उड़ान भरवा देगा। खलीफा ने उसे अगले दिन महल में आने को कहा। तयशुदा समय पर शिकारी आया और उसने उन दोनों बाज़ों को आसमान में उड़ान भरने के लिए भेजा।

खलीफा उस समय हक्का-बक्का रह गया जब उसने पाया कि वह बाज़ जो थोड़ी सी देर उड़ान भरकर वापिस लौट आता था, इस समय ऊँची उड़ाने भर रहा है। खलीफा ने खुश होकर शिकारी को एक-हज़ार सोने की अशर्फियाँ दी और पूछा कि तुमने ये करिश्मा कैसे किया। उस शिकारी ने बताया कि जनाब़ मैने आपके पेड़ की वह डाल ही काट दी जिस पर बाज़ उड़ान भरने के बाद आ बैठता था।

खलीफा ने पूछा कि यह तुम्हें कैसे सूझा कि अगर डाल काट देंगे तो बाज़ जल्दी वापिस नीचे नहीं आयेंगे। इस पर शिकारी बोला-जनाब जब इस बाज़ को समझ आ गया कि मैं जिस डाल पर बैठता हूँ वह डाल ही नहीं रही तो वह देर तक आसमान में उड़ता रहा।

मित्रों इस लघु कहानी से हमें महत्वपूर्ण सीख मिलती है कि जब हम एक छोटी सी कामयाबी से संतुष्ट होकर उस मुकाम को अपनी मंजिल मान लेते हैं तब हम उससे परे कुछ नहीं सोचते लेकिन जैसे कि हमारा मुकाम खत्म हो जाता है हम एक बार फिर गतिशील हो जाते हैं। अतः भलाई इसी में है कि हमें निरंतर गतिशील रहना चाहिए।

प्रेषक: हरीश शर्मा, दिल्ली
Email : hs1964india@gmail.com

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