प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य | महान गणितज्ञ, गांधीवादी व शिक्षाविद्

Prahalad Chunnilal Vaidya | महान गणितज्ञ, गांधीवादी व शिक्षाविद्

आइंस्टाइन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त पेचीदा गणितीय समीकरणों के रूप में व्यक्त होता है। इन समीकरणों को हल करना काफी कठिन था। गणित में विलक्षण प्रतिभा के धनी प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य (Prahalad Chunnilal Vaidya) ने इस क्षेत्र में कुछ कर-गुजरने की ठान रखी थी। आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धान्त को सरलीकरण करने का उनका योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वैद्य ने एक विधि विकसित की जो ‘वैद्य मेट्रिक’ (Vaidya metric) के नाम से मशहूर है। इसकी मदद से उन्होंने विकिरण उत्सर्जित करने वाले किसी तारे के गुरुत्वाकर्षण के सन्दर्भ में आइंस्टाइन के समीकरणों का हल प्रतिपादित किया। उनके इस कार्य ने आइंस्टाइन के सिद्धान्त को समझने में मदद दी।

Prahalad Chunnilal Vaidya

इस सिद्धान्त की प्रासंगिकता को मान्यता साठ के दशक में मिली, जब खगोलविद्वों ने ऊर्जा के घने मगर शक्तिशाली उत्सर्जकों की खोज की। जैसे ही सापेक्षतावादी खगोल भौतिकी को मान्यता मिली, वैसे ही ‘वैद्य साॅल्यूशन’ को सहज ही अपना स्थान हासिल हो गया और श्री वैद्य की प्रसिद्धी विज्ञान के क्षेत्र में दूर-दूर तक फैल गयी।

महान गणितज्ञ, गांधीवादी विचार और शिक्षाविद प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य (Prahalad Chunnilal Vaidya) का जन्म 23 मार्च 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के शाहपुर में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा भावनगर में प्राप्त की। तत्पश्चात उच्च शिक्षा के लिए बम्बई चले गये। वहाँ उन्होंने एम.एस.सी. बम्बई विश्वविद्यालय से एप्लाइड मेथमेटिक्स में विशेषज्ञता के साथ एम.एस.सी. की पढ़ाई पूरी की।

श्री वैद्य (P C Vaidya) जानेमान शिक्षाविद और मार्गदर्शी श्री वी.वी. नार्लीकर से बहुत प्रभावित थे। उस समय नार्लीकर के साथ कार्य करने वाले शोधार्थियों का समूह की पहचान सापेक्षता केन्द्र के रूप में विख्यात हो चुकी थी। वैद्य़ भी उनके दिशानिर्देश में इस क्षेत्र में शोधकार्य करना चाहते थे। वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय गये। वहां उन्होंने श्री वी.वी. नार्लीकर के दिशानिर्देश में सापेक्षता सिद्धांत पर शोधकार्य शुरू कर दिया तथा ‘वैद्य साॅल्यूशन’ प्रस्तुत किया।

यह 1942 का समय था। महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया भारत छोड़ो आंदोलन पूरे देश में आग की तरह फैल चुका था। उस समय द्धितीय विश्वयुद्ध के कारण देश की आर्थिक स्थिति विकट थी। बनारस में वैद्य के साथ पत्नी और 6 माह की पुत्री थी। वे परिवार के अकेले कमाने वाले थे। दिन-प्रति दिन आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही थी। अतः उन्हे भरे मन से दस माह पश्चात बनारस छोड़कर जाना पड़ा। श्री नार्लीकर जैसे महान शिक्षाविद् के साथ बिताया हुआ अल्प काल ही उनके आगे के जीवन को रोशनी देने के लिए पर्याप्त था। 

1947 तक उन्होने सूरत, राजकोट, मुम्बई आदि जगहों पर गणित के शिक्षक के पद पर कार्य किया। साथ ही साथ वे अपनी शिक्षा भी जारी रखी। 1948 में उन्होने बम्बई विश्वविद्यालय से अपनी पी.एच.डी. पूरी कर ली। अपना रिसर्च कार्य उन्होंने नव स्थापित टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च से किया जहां जानेमाने वैज्ञानिक डा. होमी जहांगीर भाभा से भी मुलाकाल करने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

फिर वे (P.C. Vaidya) मुम्बई छोड़ कर अपने गृहराज्य गुजरात लौट गये। 1948 में उन्होने बल्लभनगर के विट्ठल काॅलेज में कुछ समय तक शिक्षण कार्य किया। फिर वह गुजरात विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर नियुक्त हो गये। यहीं से उनकी शानदार शिक्षण कैरियर का दौर चला।

1971 में वह गुजरात लोकसेवा आयोग के सभापति नियुक्त हुए। फिर 1977-78 के बीच वह केन्द्रीय लोकसेवा आयोग के सदस्य रहे। 1978-80 के दौरान वे गुजरात विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। गुजरात मेथेमेटिकल सोसायटी के गठन में वैद्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और विक्रम साराभाई कम्यूनिटी साइंस सेंटर के विकास में भी उनका अहम था।

Shri P.C. Vaidya ने अपना पूरा जीवन एक समर्पित शिक्षक के रूप में बिताया। वह हमेशा खुद को एक गणित शिक्षक कहे जाने पर गर्व महसूस करते थे। प्रशाासनिक प्रतिबद्धताओं के बावजूद वे एम.एस.सी. के विद्य़ार्थियों को पढ़ाने के लिए समय निकाल ही लेते थे। उन्होने जीवनभव गाँधीवादी विचारों को अपनाते हुए खादी का कुर्ता और टोपी धारण की। उपकुलपति के पद पर रहते हुए भी सरकारी कार का उपयोग करने से मना कर दिया और विश्वविद्यालय आने-जाने के लिए साईकिल का ही उपयोग करते रहे।

जनवरी 2010 को किडनी में दिक्कत के कारण अस्पताल में भर्ती करा गया। उनकी स्थति बिगड़ती चली गई। 12 मार्च, 2010 को 91 वर्ष की आयु में महान गणितज्ञ, गांधीवादी विचार और शिक्षाविद् श्री प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य (P.C. Vaidya) का निधन हो गया।

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