भारत में जन्मे विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हस्तियाँ

भारत में जन्मे विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हस्तियाँ
India-born Nobel Prize Winners in Science

हर वर्ष स्टॉकहोम, स्वीडन में भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और शांति के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) प्रदान किए जाते हैं। अल्फ्रेड नोबेल डायनामाइट के स्विडिश आविष्कारक थे, उनकी वसीयत के अनुसार जमा-पूंजी को एक फंड के रूप में रखा जाए जिसका ब्याज सालाना रूप से उन लोगों को पुरस्कार के रूप में वितरित किया जाए जिन्होंने पिछले वर्ष के दौरान मानवता के उत्थान पर विशेष कार्य किया हो। पहला नोबेल पुरस्कार उनकी मृत्यु के पांचवीं वर्षगांठ पर प्रदान किया गया। हालांकि नोबेल ने अपनी इस तरह की घोषणा का कोई सार्वजनिक कारण नहीं बताया था, पर यह व्यापक रूप से माना जाता है कि उन्होंने युद्ध में अपने आविष्कारों के तेजी से घातक उपयोगों पर नैतिक रूप से अफसोस जाहिर किया था।

रोनाल्ड रॉस (Ronald Ross)

रोनाल्ड रॉस (13 मई 1857 – 16 सितंबर 1932), एक ब्रिटिश चिकित्सक तथा नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) विजेता थे। उन्हें 1902 के चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया। उन्हें यह पुरस्कार मलेरिया के परजीवी प्लास्मोडियम के जीवन चक्र की खोज के लिये दिया गया।

ronald ross

बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी रोनाल्ड राॅस का जन्म वर्तमान उत्तराखण्ड के अल्मोडा में हुआ। उनके पिता जी का नाम सर सी.सी.जी. राॅस था। वे ब्रिटिश आर्मी में जनरल थे। रोनाल्ड की उच्च शिक्षा लंदन में हुई। गणित के साथ-साथ उनकी रूचि कविता और संगीत में भी थी। जब से सिर्फ 16 वर्ष थे, उन्होने ड्राइंग प्रतियोगिता में कैम्ब्रिज से प्रथम स्थान प्राप्त किया।

सन् 1881 को वे मेडिकल सर्विस में दाखिल हुए। उनकी पहली नियुक्ति मद्रास में मेडिकल आॅफिसर के पद पर हुई। उस समय भारत में मलेरिया की बीमारी के बहुत सारे मामले सामने आते थे। अतः 1892 में उन्होने अपने अनुभव के आधार पर मलेरिया पर अपना पूर्णरूपेण शोधकार्य शुरू किया। ढाई साल के कई असफल प्रयासों के बाद अंतः वह अपने प्रयासों पर सफल हुए।

सी.वी. रमण (C.V. Raman)

सी.वी. रमण (7 नवम्बर 1888 – 21 नवम्बर 1970), प्रकाश के प्रकीर्णन और उसके प्रभाव की खोज के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित पहले एशियाई भौतिक विज्ञानी थे। उन्हें 1930 में यह पुरस्कार (Nobel Prize) प्रदान किया गया।

c v raman

भारतरत्न सी.वी. रमण का जन्म त्रिचुपल्ली, वर्तमान तमिलनाडू में हुआ था। उनके पिता जी श्री चंन्द्रशेखर अय्यर और माताजी का नाम श्रीमति पावर्ती था। रमण बचपन से ही काफी मेघावी थे। सन् 1907 में उन्होने अपनी एम.एस.सी. की पढ़ाई पूरी कर ली। उनकी पहली नियुक्ति भारत सरकार के वित्त विभाग में डिप्टी एककाउन्टेंट के तौर पर हुए। विज्ञान में उनकी अतिरूचि होने के कारण वे काम के बाद फुरसत के क्षणों में इंडियन एसोसिएशन फाॅर कल्टिवेशन साइंस की प्रयोगशाला में प्रयोग करते थे। सन् 1917 में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर नियुक्त हुए। इस दौरान भी उन्होने अपना अनुसंधान जारी रखा। सन् 1924 में प्रतिष्ठित राॅयल सोसाइटी, लंदन के सदस्य बने। 28 फरवरी 1928 में उन्होने रमण अफेक्ट को दुनिया के सामने रखा।

हरगोविंद खुराना (Har Gobind Khorana)

हरगोविंद खुराना (9 जनवरी 1922 – 9 नवम्बर 2011), आरएनए के न्यूक्लियोटाइड सीक्वेंस को सुलझाने और जेनेटिक कोड को समझने के लिए दो अन्य अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ साझा रूप में 1968 में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) प्रदान किया गया था।

har gobind khorana

खुराना का जन्म एकीकृत भारत के पंजाब प्रांत के रायपुर (जिला मुल्ताल) में 1922 में हुआ था। जब वे सिर्फ 12 वर्ष के थे तब उनके पिताजी का निधन हो गया था। बचपन से ही वे पढाई में काफी होनहार थे। 1943 में उन्होने पंजाब विश्वविद्यालय से एम.एस.सी. (आर्नस) की परीक्षा पास की। भारत सरकार ने उन्हे उच्च शिक्षा के लिए छात्रवत्ति प्रदान की। आगे की पढाई के लिए वे अमेरिका चले गये। वहां लिवरपूल विश्वविद्यालय से उन्होने डाक्टरेट की उपाधी प्राप्त की। इसके बाद वे जूरिख (स्विटजरलैंड) के फेडरल इंस्ट्टियूट आॅफ टैक्नालाॅजी में अन्वेषण कार्य करने लगे।

शोध कार्य के बाद खुराना भारत वापिस आ गये। दुर्भाग्य से उन्हे अपनी रूचि के अनुकूल कार्य न मिल सका। वे ब्रिटेन वापिस चले गये। वहां उन्होने कई पदों पर कार्य किया। 1960 में वे अमेरिका चले गये। वहां वे विस्कान्सिन विश्वविद्यालय के इंस्ट्यिूट आॅफ एन्जाइम रिसर्च में प्रोफेसर पद पर कार्य करने लगे तथा यहीं स्थाई रूप से बस गये।

खुराना को एक ऐसे वैज्ञानिक के तौर पर जाना जाता है, जिसने डीएनए रसायन में अपने उम्दा काम से जीव रसायन (बायोकेमिस्ट्री) के क्षेत्र में क्रांति ला दी।

सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर (Subrahmanyan Chandrasekhar)

सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर (19 अक्टूबर, 1910 – 21 अगस्त 1995), तारों और उनकी संरचाना पर शोध के लिए 1983 में नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया था। यह पुरस्कार (Nobel Prize) उन्हें संयुक्त रूप से डाॅ. विलियम फाऊलर के साथ प्रदान किया गया।

subrahmanyan chandrasekhar

सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर का जन्म एकीकृत भारत के लाहौर (पंजाब राज्य) में हुआ था। उनकी माता जी का नाम सीतालक्ष्मी व पिताजी सुब्रह्मण्यन् ऐय्यर थे जो कि सर सी.वी. रमण के बड़े भाई भी थे। वे भारत सरकार के लेखापरीक्षक विभाग में उच्च अधिकारी पद पर कार्यरत थे। बचपन मद्रास (चैन्नई) में बीता। 1930 में मद्रास के प्रेसीडेंसी काॅलेज से उन्होने बी.एस.सी. की पढ़ाई की। उसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गये।

चंद्रशेखर ने 1930 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन के दौरान ही चंद्रशेखर लीमिट की खोज कर ली थी परन्तु 50 साल लम्बे इन्तजार के बाद उनकी खोज को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई।

सन् 1937 में शिकागो विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्य करने के लिए वे अमेरिका चले गये तथा अपने कैरियर के अंतिम समय तक ‘शिकागो विश्वविद्यालय’ के साथ जुड़े रहे और अमेरिका में ही स्थाई रूप से बस गये।

वेंकटरमन रामकृष्णन (Venkatraman Ramakrishnan)

वेंकटरमन रामकृष्णन (जन्म 1 जनवरी, 1952), माॅलिक्यूलर बाॅयोलाॅजी के क्षेत्र में जिसमें कि उनके द्वारा कोशिका के अंदर प्रोटीन का निर्माण करने वाले तत्व की कार्य प्रणाली व संरचना पर उल्लेखनीय कार्य के लिए 2009 में नोबल पुरस्कार (Nobel Prize) प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें संयुक्त रूप से इजराइली महिला वैज्ञानिक अदा योनोथ और अमरीका के थॉमस स्टीज के साथ प्रदान किया गया।

Venkatraman Ramakrishnan

वेंकटरामन रामकृष्णन तमिलनाडु के कड्डालोर जिले में स्तिथ चिदंबरम में पैदा हुए थे। उनके पिताजी का नाम सी वी रामकृष्णन और माता राजलक्ष्मी थी। पिता जी बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में जैव रसायन विभाग के प्रमुख पद पर कार्यरत थे। वेंकटरामन की प्रारंभिक शिक्षा अन्नामलाई विश्वविद्यालय में हुई एवं उसके बाद इन्होंने 1971 में बड़ौदा से भौतिकी में बी.एस.सी. की पढ़ाई की। आगे की रिसर्च के लिए वे ओहियो विश्वविद्यालय चले गये जहाँ से उन्हें 1976 में पीएचडी की डिग्री प्राप्त हुई। फिलहाल वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, (इंग्लैण्ड) के मेडिकल रिसर्च काउंसिल के मोलीक्यूलर बायोलॉजी लैबोरेट्री में जीव वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं।

Also Read : सड़कछाप से सफलता का सफर | Frank O’Dea


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