पी.आर. पिशोरती | Father of remote sensing in India

पी.आर. पिशोरती | Father of remote sensing in India

पी.आर. पिशोरती (Pisharoth Rama Pisharoty)  का जन्म 10 फरवरी 1909 को कोलेंगोड (केरल) में हुआ था। उनके पिताजी का नाम श्री वी गोपाल वडयार (Gopala Vadhyar)   एवं माता जी का नाम श्रीमती के.पी. पिशारायार (Lakshmi Pisharassiar) था। वे तीन भाई थे।

पूरा परिवार बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति का था। माता-पिता मंदिर की साफ-सफाई, देखरेख तथा पूजा के लिए फूलों की व्यवस्था करते थे। परिवार का भरण-पोषण मंदिर समिति द्वारा प्रतिमाह दिये जाने वाला राशन औेर कुछ धन द्वारा होता था। कमजोर पारिवारिक आर्थिक स्थिति को माता-पिता ने बच्चों की शिक्षा के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने उनको शिक्षा और व्यवसाय चुनने की पूरी छूट दे रखी थी।

श्री पिशोरती (P R Pisharoty) काफी हौनहार बालक थे। बी.ए. (आनर्स) करने के बाद उन्होने थोड़े समय तक महिला काॅलेज में अध्यापन कार्य किया। उसके उपरांत वे अध्यापन के लिए लयोला काॅलेज, मद्रास चले गये। उन्होने साथ-ही-साथ अपनी शिक्षा जारी रखी। 1936 में उन्होंने एम.ए. की परिक्षा पास की।

पिशोरती (PR Pisharoty) पर सी.वी.रमण के व्यक्तित्व का खासा असर था। काॅलेज की छुट्यिों के दौरान वे टाटा इंस्ट्यिूट बैंगलोर गये। पिशोरती सी.वी. रमण से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पी.एच.डी. की तैयारी के लिए सी.वी. रमण के मार्गदर्शन में फिजिक्स में रिसर्च कार्य करने लगे। उन्होंने एक्स-रे तथा प्रकाश तरंगो के विभिन्न गुणों पर शोध कार्य किया।

सितम्बर 1939 में विश्व युद्ध शुरू हो चुका था।  भारत में मौसम विज्ञान विभाग (Meteorological Department) के विस्तार की बड़ी आवश्यकता पड़ गयी थी जिससे की युद्ध के दौरान युद्धक विमानो के आवागम को सुचारू रखने के लिए मौसम की सटीक जानकारी प्रदान की जा सके।

सन् 1941 में मौसम विभाग के डायरेक्टर जनरल सर चाल्र्स डब्लू नोरमंड (Sir Charles W. Normand)  ने रमण से उनके अंतर्गत कार्य करने वाले कुछ युवा शोधकर्ताओं को मौसम विभाग (Meteorological Department) में आवेदन करने की प्रार्थना की। सर सी.वी. रमण ने अपने कुछ शोधार्थियों जिसमें पिशोरती भी थे, मौसम विभाग में आवेदन करने के लिए राजी किया। पिशोरती के सिफारशी पत्र में सर रमण ने लिखा था कि ‘… वे बहुत ही काबिल व्यक्ति हैं …..। उनके व्यक्तिगत और बौद्धिक गुण ऐसे हैं कि वे उच्चतम स्तर के वैज्ञानिक और प्रशासनिक कार्य में अवश्य सफल होंगे’।

मौसम विज्ञान (Meteorological Science) क्षेत्र में बिल्कुल अनजान होने के बावजूद, पिशोरती ने अपनी दिन-रात की कड़ी मेहनत से इस विषय को समझा और सटीक मौसम पूर्वानुमान (Weather forecasting) की कार्यविधि का अभ्यास किया। गंभीर अध्ययन और कड़ी मेहनत से उन्होंने विभाग में अपनी क्षमताओं की उत्कृष्ट छाप छोड़ी।

पिशोरती की रुचि और क्षमताओं से प्रभावित होकर विभाग ने उन्हें नई पद्धतियों और तकनीकी जानकारी प्राप्त करने के लिए 15 माह के डेपूटेशन पर अमेरिका भेज दिया।1953 के इस छोटे से कालखण्ड में उन्होंने अपनी मास्टर डिग्री केलिफोर्निया विश्वविद्यालय से प्राप्त की। भारत सरकार ने उनकी डेपूटेशन को कुछ समय के लिए और बढ़ा दिया। इसी छोटे से रिकार्ड समय में उन्होंने अपनी पी.एच.डी. की थिसिस जमा की और केलिफोर्निया विश्वविद्यालय से 1954 में पी.ए.डी. की डिग्री प्राप्त की।

प्रोफेसर पिशोरती ने भारत आ कर विभाग के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे भारतीय मौसम विभाग के सीनियर अफसर रहे। कोलाबा वेधशाला के निदेशक रहे और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Tropical Meteorology) के पहले निदेशक बने।1967 में उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान से निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए। उसके बाद उन्होंने विक्रम साराभाई के निमंत्रण पर वरिष्ठ प्रोफेसर के पद पर भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद में कार्यभार संभाल लिया।1972-75 के बीच उन्होंने ISRO स्पेस एप्लिकेशन सेंटर में रिमोट सेंसिंग और सेटेलाइट मेटरोलोजी, अहमदाबाद में डायरेक्टर पद पर कार्य किया साथ-ही-साथ वे भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के एमेरिटस प्रोफेसर भी रहे।

उनको विज्ञान के क्षेत्र में बहुत से पुरस्कारों से नवाजा गया। उनके योगदान को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने उनको सन् 1970 में पद्मश्री से सम्मानित किया। सन् 1989 में WMO द्वारा प्रतिष्ठित इंटरनेशनल मेटरोलाॅजी पुरस्कार (International Meteorological Prize) प्रदान किया गया।

महत्वपूर्ण योगदानः

उनके द्वारा किये गये शोध में यह पाया गया कि भारतीय ग्रीष्म मानूसन की देरी की मुख्य वजह सर्दियों से पहले उत्तरी गोलार्द्ध से धुर्वों की तरफ अपर्याप्त गर्म हवाओं का परिवहन है।

उन्होंने भारत को रिमोट सेंसिंग तकनीक (Remote sensing technology) से परिचय कराया तथा रिमोट सेंसिंग तकनीक से पहली बार कामयाबी से कोकोनेट विल्ट रूट डिसिस (coconut-wilt root disease)  की खोज की।

1972-73 में प्रोफेसर पिशोरती (P R Pisharoty) इसरोे (ISRO) के अधिकारियों को इनसैट श्रृंखला के उपग्रहों में मौसम संबंधी पेलोड को शामिल करने के महत्व को समझाने में कामयाब हुए कि किस तरह कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी और देश की अर्थव्यस्था को लाभ पहुंचाने के लिए इनका शामिल करना कितना आवश्यक है।

24 सितम्बर 2002 को भारत में रिमोट सेंसिंग के जनक (Father of remote sensing) और अविस्मरणीय प्रतिभा के धनी प्रोफेसर पिशोरती 93 वर्ष की आयु में पूना (महाराष्ट्र) में पंचतत्व में विलीन हो गये।

प्रोफेसर पिशोरती के अनमोल वचनः

  1. अधिक पैसा अथवा उच्च प्रशासनिक पदों से अधिक मूल्यवान वैज्ञानिक उपलब्धि है।
  2. जब आप छात्र रहते हैं तब तक आपकी टेक्स्ट-बुक में जो लिखा होता उसी पर आपको विश्वास करना होता है। परन्तु एक शोधार्थि के रूप में आपने जो पढ़ा है उस पर आपको सवाल करने से नहीं हिचकना चाहिए
  3. नये विचारों पर कार्य करें; नये विचारों का परिक्षण करें।
  4. जितना अधिक आप लिखते हैं उतनी ही आपकी लेखनी बेहतर होती जायेगी इसी तरह जितना आप सोचते हैं, उतनी ही तेज आपकी बुद्धि होगी।

Also Read : हमारे वैज्ञानिकः अमल कुमार रायचौधरी (Amal Kumar Raychaudhuri)


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