सच्चे लोग किसी को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करते

सच्चे लोग किसी को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करते 
Stop Trying to Impress Others

धरती एक छोटा गांव होती चली जा रही है। आज प्रगति आसान है, बसर्ते सही दिशा में प्रयास हो। हर व्यक्ति आत्मविश्लेषण और आत्मनिरीक्षण करे।

भविष्य के बारे में जीव-जन्तु भी हमारी तरह ही व्यवहार करते हैं। उदाहरणार्थ-कुत्ते को यदि अतिरिक्त मिल जाता है तो वह जमीन में गड्डा खोदकर कल के लिए छुपा लेता है। मधुमक्खियां शहद को इसी आशा में जमा करती हैं कि भविष्य में कम आयेगा। अतः आप भी अपने भविष्य के प्रति जागरूक रहें।

आजकल लोग शंका करते हैं कि वर्तमान सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों में निडर रहकर अपनी बात कहना क्या आसान है? किंतु यदि हमारी समझ में यह बात आती है कि हमारी चापलूसी या गलत राय हमारे संगठन के हित में नहीं है तो हमें दूसरों की ओर न देखकर स्वयं ही साहस करके सत्य के मार्ग पर आगे बढना चाहिए।

गीता श्रीकृष्ण के जीवन की पौथी है, यह उनके अनुभव की डायरी है। यह बताती है कि कुछ व्यक्तियों के कारण हम अपना कर्तव्य न छोड़ दें, कुछ विपरीत परिस्थितियों के कारण हम अपना कर्तव्य न छोड़ दें तथा किसी दबाव में आकर अपना कर्तव्य-पालन न छोड़ दें।

धीरज रखें, जो मिलेगा भीतर से मिलेगा। बाहर से मिलना तभी सम्भव है, जब हम पात्रता का निर्माण कर लें, वह स्वयं के लक्ष्य के प्रति जागरूकता, मेहनत और ईमानदारी से ही सम्पादित होगा। इसलिए चापलूसी-चमचागिरी द्वारा किसी को प्रभावित करने का प्रयास कदाचित न करें। इस तरह से दूरगामी कोई लाभ मिलने वाला नही होता।

महार्षि जाजली और तुलाधर बनिये की कथा Story of Maharishi Jajli and Tuladhar : महातपस्वी ब्राह्मण जाजलि (Maharishi Jajali) ने लम्बे समय से वन में जीवन बिता रहे थे। अब वे भूखे-प्यासे खड़े होकर कठोर तपस्या करने लगे। उनकी लम्बी-लम्बी जटायें हो गयी तथा धूल-मिट्टी सारा शरीर में फैल गयी। उन्हें एक ही स्थान पर गतिहीन देखकर पक्षियों ने उनको एक वृृक्ष समझा। उनकी जटाओं में पक्षियों ने घौसले बना कर वहीं अंडे दे दिये। दयालु जाजलि (Jajli) चुपचाप खड़े रहे। पक्षियों के अंडे फूटे, उनमें से बच्चे निकले। वे बच्चे भी बड़े हुए और उड़ने लगे। जब बच्चे एक बार उडने के बाद पूरे माह तक वापिस नहीं आये, तब जाकर जाजलि हिले। वे स्वयं अपनी तपस्या पर आश्चर्य करने लगे। उन्होंने अपने आप को सिद्ध समझ लिया।

उसी समय आकाशवाणी हुई-‘जाजलि! तुम गर्व मत करो। काशी में रहने वाले तुलाधार व्यापारी के समान तुम योगी नहीं हो।’

जाजलि Jajli को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तुलाधार से मिलने उसी समय काशी को चल पड़े।

काशी पहुंचकर उन्होंने देखा कि तुलाधार तो एक साधारण व्यापारी है जो कि अपनी दुकान पर बैठकर ग्राहकों को तौल-तौलकर सौदा दे रहा है। उनकी आश्चर्य की सीमा न रही जब तुलाधार ने बिना कुछ पूछे उन्हे उठकर प्रणाम किया, उनकी तपस्या का वर्णन करके उनके अभिमान और आकाशवाणी की बात भी बता दी।

जाजलि ने पूछा-‘तुम तो एक साधारण व्यापारी हो, तुम्हे इस प्रकार का ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?’

तुलाधार ने नम्रता पूर्वक उत्तर दिया-‘ब्राह्मण! मैं अपने कर्तव्य का पालन बहुत सावधानी पूर्वक करता हूँ। मैं अपने ग्राहकों को कभी तौल से कम नहीं देता। ग्राहक भले ही अज्ञानी हो, मैं उसे उचित भाव में उचित वस्तु ही देता हूँ। मैं न हेराफेरी करता हूँ और न ही सामान में दूषित पदार्थ मिलता हूँ। ग्राहक की सेवा करना मेरा कर्तव्य है, यह बात मैं हमेशा स्मरण रखता हूँ।’

जाजलि (Maharishi Jajli) को अभी भी संदेह था कि तुलाधार इस तरह मुझसे बडा योगी कैसे है। अब जो पक्षी जाजलि के केश में उत्पन्न हुए थे, वे बुलाने पर उनके पास आये। उन्होंने तुलाधार के द्वारा बताये गये धर्म का ही अनुमोदन किया।

जाजलि (Maharishi Jajli) का अभिमान चुर-चूर हो गया। उन्होंनेतुलाधार से कर्म, मेहनत तथा ईमानदारी की उपयोगिया का ज्ञान प्राप्त किया।

मननशील होने के कारण ही हम मानव कहलाते हैं। प्रकृति ने मात्र हमें ही यह छूट दी है कि सही-गलत का निर्णय मनन-चिंतन और विवेक द्वारा ठीक से कर सकें। हम निर्णय लेने की क्षमता में जितना अधिक वृद्धि करेंगे, उसी अनुपात में हम प्रगति करते जायेंगे।

अतः जब भी जागो, तभी सवेरा। अब विलम्ब न करें। हम प्रतिदिन कुछ मिनट अपने पिछले चौबीस घंटों में किये गये कामों के विषय में अवश्य विचार करें। आवश्यकता इस बात की है कि हम पहले केवल घटनाक्रम को याद करें, फिर उसके साथ जो विचार चल रहे थे उनको याद करें और अंत में इसका विश्लेषण करें। इस तरह हमारी मूल्यवान प्राथमिकतायें स्पष्ट होती जायेंगीै बाहर-भीतर क्या है, क्या होना चाहिए था, क्या हो सकता था, क्या किया जा सकता था, यह सब क्रमशः हमें मालूम होता जायेगा।

सीख:

  1. चापलूसी-चमचागिरी से कुछ होने वाला नहीं। सच्चे और अपने कार्य के प्रति ईमानदारी रखने वाले लोगों का जीवन ही आदरणीय होता है।
  2. कर्मयोग ही सबसे बडा योग है। इसलिए कभी भी मेहनत से जी न चुरायें।

    Also Read: क्या नकारात्मक लोगों से दूर रहना चाहिए


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