दूसरों की अमंगल-कामना न करें

भगवान भोलेनाथ द्वारा महर्षि दधिचि पुत्र पिप्लाद को सीख :

महर्षि दधिचि (Dadhichi) ने देवताओं की रक्षा के उद्देश्य ने अपना शरीर बलिदान कर दिया था। उनकी हड्डियों को लेकर विश्वकर्मा ने वज्र बनाया जिसकी सहायता से इंद्र ने अजेय वृत्रासुर को मारा और स्वर्ग पर पुनः अपना अधिकार प्राप्त किया।

दधिचि (Dadhichi) के पुत्र का नाम पिप्लाद था। वे भी अपने पिता की तरह तेजवान और तपस्वी थे। वे अपने पिता के साथ हुए कृत्य के लिए देवताओं को दोषी मानते थे। इन देवताओं को अपने स्वार्थ के लिए पिता जी से उनकी हड्डियाँ मांगते हुए बिल्कुल भी लज्जा नहीं आयी। अतः उन्होंने देवताओं को नष्ट करने का संकल्प लेकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या प्रारम्भ कर दी।

पिप्लाद (Piplad) की कठोर तप से भगवान ने प्रसन्न होकर उसको वर मांगने के लिए कहा। पिप्लाद ने वर मांगा- ‘प्रभु! आप अपना तीसरा नेत्र खोलें और इन स्वार्थी देवताओं को भस्म कर दें।’

भगवान भोलेनाथ ने पिप्लाद को समझाया-‘पुत्र! मेरे रुद्ररूप का तेज तुम सहन नहीं कर सकते, इसलिए मैं तुम्हारे सम्मुख सौम्य रूप में प्रकट हुआ हूँ। तुम्हारे इस आहावन से तो सम्पूर्ण जगत ही नष्ट हो जायेगा। अतः कुछ और वर मांग लो।’

पिप्लाद के मन में देवताओं को प्रति कटुता गहराई से भरी पड़ी थी। उन्होंने कहा-‘प्रभु! मुझे देवताओं द्वारा संचालित इस ब्रह्मांड से तनिक भी मोह नहीं है। आप देवताओं को भस्म कर दें, भले ही उनके साथ अन्य कुछ भी भस्म क्यों न हो जाये।’

भगवान भोलेनाथ पिप्लाद के बालहठ पर मंद-मंद मुस्करा रहे थे। उन्होंने कहा-‘पुत्र! मैं तुम्हें विचार करने का एक औेर अवसर दे रहा हूँ। तुम अपने अन्तःकरण में मेरे रुद्ररूप का दर्शन कर लो।’

पिप्लाद ने हृदय में भगवन के तेज रूप के दर्शन किये। उस ज्वालामय प्रचण्ड स्वरूप से उन्हें लगा कि जैसे उनका रोम-रोम ही भस्म हुए जा रहा है। उनसे रहा नहीं गया और फिर से भगवान भोलेनाथ को पुकारा। भगवान मुस्कुराते हुए उनके सामने खड़े थे।

‘हे प्रभु! मैंने तो देवताओं को भस्म करने की प्रार्थना की थी, आपने तो मुझे ही भस्म करना प्रारम्भ कर दिया।’ पिप्लाद ने भयभीत होकर कहा।

भगवान ने उसे स्नेहपूर्ण समझाया- ‘पुत्र! विनाश किसी एक स्थान से प्रारम्भ होकर व्यापक बनता है। और सदा वहीं से प्रारम्भ होता है जहां से उसका आह्वन किया जाता है। बेटा! इसे समझो कि दूसरों का अमंगल चाहने पर पहले अपना ही अमंगल होता है। गुस्से में आकर लिया गया हर निर्णय भविष्य में गलत ही साबित होता है। तुम्हारे पिताजी ने दूसरों के कल्याण के लिए अपना बलिदान तक दे दिया। तुम उनके पुत्र हो, तुम्हें अपने पिता के गौरव के अनुरूप सबके मंगल की कामना करनी चाहिए।’ भगवान के इन मृदु वचनों से पिप्पलाद का क्रोध शांत हो गया और उन्होंने भगवान के चरणों में अपना मस्तक झुका लिया और अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी।

सीखः 
1.  दूसरों की बुराई चाहने वालों का पहले अपना नुकसान होता है।
2.  क्रोध में कोई निर्णय न लें।

Also Read : महर्षि दधीचि का त्याग


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One thought on “दूसरों की अमंगल-कामना न करें

  1. बिलकुल सत्य वचन – दूसरे के लिए गड्डा खोदने वाले पहले वह गड्डे में गिरते है। बहुत अच्छी कहानी के साथ प्रस्तुति

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