सूने पहाड़-मेरा संस्मरण

सूने पहाड़-मेरा संस्मरण

अभी कुछ दिनों पहले ही मैं अपने ननिहाल गया। लगभग 14 साल बाद। नानी की मृत्यु के बाद बस जाना ही नहीं हुआ। मेरी माताजी सिर्फ दो बहने हैं। मामा न होने के कारण किसके यहां ठहरने की उधेड़बुन में बस समय बीतता ही चला गया।

बचपन की यादों का दौर जैसे चलचित्र की भांति आंखों के सामने बदलता जा रहा था। हम हर साल स्कूल की सालाना छुट्यिों में अपने गांव और ननिहाल बराबर समय के लिए जाते थे। यह सिलसिला अनवरत जारी रहा जब तक कि हम अपने रोजगार के चक्कर में व्यस्त नहीं हो गये।

ननिहाल के प्रति हमारा लगाव कुछ ज्यादा था। शायद इसका कारण नानी का अकेला होना हो सकता है क्योंकि नाना जी की मृत्यु बहुत पहले ही हो गयी थी।

sune pahad

हमारे परिवार की तरह और भी बहुत से परिवार छुट्यिों में अपने घर की तरफ रुख करते थे। गांव में बहुत चहल-पहल हो जाती था। खेलना-कूदना तथा मस्ती भरी यादों ने मन में प्रसन्ता भर दी थी।

घर के सामने ही हमारा एक नासपाती का पेड़ था। जब भी हम छुट्यिों में जाते थे वह फलों से लदा हुआ ही मिलता था जैसे कि हमारा ही इंतजार कर रहा हो। दिन के समय उसकी छाया में खेला और लेटा करते थे। वहां पर बहुत ही मंद और सुगंधित हवा बहती थी।

गांव में उस समय पानी की सरकारी सप्लाई नहीं थी। पानी के दो स्रोत थे एक तो बिल्कुल गांव में ही था तथा दूसरा दूर झरने से गांव वाले पानी भरा करते थे। वहां पानी कुछ तेजी से आता था। हर घर में पशु-धन था। अधिकतर ग्रामीण गाय बच्छियां चराने के लिए दूर झरने के आसपास ही ले जाया करते थे। मैं भी उनके साथ ही सुबह नहाने के लिए मित्रमंडली के साथ चला जाया करता था। वापिस आने पर नानी द्वारा बनाई गयी वह मोटी-मोटी रोटियां और चटनी का स्वाद, क्या कहने। याद करते ही आज भी मुंह में पानी आ जाता है। हर घर में रौनक थी। कभी किसी के घर चले गये औेर कभी किसी के घर।

पहाड़ों में बाजार बहुत दूर होते हैं। हम साथियों के साथ बाजार जाते थे तो लगता था जैसे पिकनिक जा रहे हों। वहां दुकान में बैठ कर चाय पीना व नमकीन बिस्कुट खाना तथा सब्जी और सामान सिर पर लाद कर पहाड़ी पगडंडियों में गिरते-पड़ते आने में जो मजा था क्या कहने। ऐसे ही एक बार बाजार से आते समय एक पेड़ की खोल से तोते का बच्चा निकाल कर घर ले आया। वह उड़ नहीं पाता था। हम लगे उसे उडने की ट्रेनिंग देने। पहले उसे एक निचली सीड़ी से उड़ाया । वह कुछ दूरी में जा कर गिर गया। ऐसे करते-करते वह उड़ पाने लगा। एक दिन वह ऐसा उड़ा कि उड़ता ही चला गया। हम बस उसे देखते ही जा रहे थे। पालने का सपना चकनाचूर हो गया था।

एक दिन में मैंने हद ही कर दी । नदी नहाने के चक्कर में अकेले ही कच्छा-बनियान थैले में डाला और नानी को बिना बताये ही चल पड़ा। सतपुली नाम का एक बाजार है। नानी के गांव से बस में जाने पर लगभग एक घंटा लग जाता है। मैं वहां पहुंचा नदी में खूब मस्ती की। शाम को वापिस घर पहुंचा। नानी का चिंता के मारे बहुत बुरा हाल था। उनको पता चल गया था कि मैं सतपुली नदी में नहाने गया हूँ। वह बहुत परेशान और गुस्से में थी। उनकी जवानी के काल में वहां पर बहुत बड़ा दरिया आ गया था। कई बसे नदी के साथ बह गयी थी। बहुत जान-माल का नुकसान हुआ था। जिस प्रकार केदारनाथ घाटी में आपदा आयी थी उसी प्रकार की दुर्घटना का वह छोटा रूप था। नानी ने मुझे मारा तो नहीं पर कुछ दिनों तक बहुत गुस्से में रही।

इसी प्रकार न जाने कितनी हरकतों से भरा पड़ा है वह बचपन। बस अब तो उसकी सुनहरी यादें ही रह गयी हैं।

अभी स्कूलों को गर्मियों की छुट्यिां पड़ी हैं। मैं अपने बच्चों को कोटद्वार माता-पिता के यहां छोड़ने गया था। उस समय एक शादी में शामिल होकर मेरे चचेरे मामा-मामी हमारे घर आये थे। मामी की तबियत बीपी लो होने के कारण खराब थी। वैसे तो वे अपने बेटे के साथ हरिद्वार रहते हैं लेकिन पिछले एक महिने से वह गांव में ही रह रहे थे। मैं और मेरा छोटा भाई उनको छोडने अपनी गाड़ी से गांव ले गये। सच कहूं तो मन में बहुत उत्साह था इतने सालों बाद जो ननिहाल जाने का मौका मिल रहा था।

आज गांव तक कच्ची सड़क पहुंच गयी है। हर चार घर के सामने पानी का एक प्वांइट है। दूर पानी भरने नहीं जाना पड़ता। बिजली तो खैर पहले से ही थी।

खेतों से सामने से गुजरते हुए मन को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। एक भी खेत में मुझे फसल लहलहाती हुई नहीं दिखी ग्रामीणों का जैसे खेती से मोहभंग हो गया हो। न गाय बच्छियां ही दिख रही थी। गलियां बिल्कुल सुनसान जैसे कि यहां कोई भयंकर आपदा आ गयी हो और सब रात ही रात गांव छोड़कर भाग गये हों। इतने वर्षों में इसी समय तो हम गांव आया करते थे। गजब की रौनक हुआ करती थी। मैंने पूरे गांव में भ्रमण तो नहीं किया लेकिन जहां तक गया वहा सिर्फ बुर्जुग महिलायें ही मुझे मिली । आंखें में अकेलेपन की उदासी थी।

मैंने गांव में एक सकारात्मक पहलू भी देखा। एक तथाकथित एस.सी. परिवार अपनी सीआरपीएफ की नौकरी पूर्ण करने के बाद वापिस गांव आया था। उन्होनें एक छोटी सी दुकान भी खोल दी है जो कि इन बुर्जुग गांववासियों के लिए बहुत बड़ी राहत की बात है तथा साथ ही साथ मैं इसे एक घर वापिसी की शुरूआत के रूप में भी देखता हूँ। मेरा सिर उनके सम्मान में झुक गया और उम्मीद करता हूँ कि उनकी इस दिखाई गयी राह से बहुत से लोग प्रेरणा लेंगे।

मैेंने दुकान से कुछ पेकेट बिस्कुट, ब्रेड और नमकीन ली और उन सभी माताओं को देकर भरे मन से भाई के साथ वापिस घर की तरफ चल पड़ा मन में यह संकल्प लेकर कि मैं अब लगातार गांव जाया करता रहूंगा। मैं यह भी उम्मीद करता हूँ घर वापिसी का दौर अवश्य चलेगा और प्रकृति का सुन्दर उपहार चहचहायेगा। सूने पहाड़ (sune pahad) नहीं रहेगें।

Also Read : सच्चाई हर जगह चलती है


आपके पास यदि Hindi में कोई story, essay है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ kadamtaal@gmail.com पर E-mail करें. हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित करेंगे|

Random Posts

  • फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल | सेवा की प्रतिमूर्ति

    फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल | सेवा की प्रतिमूर्ति फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल (Florence Nightingale) का जन्म 12 मई सन् 1820 ई. में इटली के शहर फ्लाॅरेन्स में एक ब्रिटिश परिवार में हुआ था। वह उच्च घराने की लड़की थी। परिवार में पैसों की कोई कमी नहीं थी पर फ्लाॅरेन्स का जन्म ही दीन दुखियों की सेवा के लिए ही हुआ था। अतः उनका मन […]

  • nain singh rawat नैन सिंह रावत – जिन्होंने तिब्बत को अपने कदमों ने नापा

    नैन सिंह रावत – जिन्होंने तिब्बत को अपने कदमों ने नापा नैन सिंह रावत (Nain Singh Rawat) का जन्म 21 अक्टूबर 1830 में पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी तहसील स्थित उत्तराखंड के सुदूरवर्ती मिलम गांव में हुआ था। उनके पिताजी का नाम अमर सिंह था जिन्हें कि लोग लाटा बुढ्ढा के नाम से भी पुकारते थे। पहाड में लाटा अत्यधिक सीधे […]

  • swan and owl बहुमत का बोलबाला | Owl and Swan short story in Hindi

    बहुमत का बोलबाला | Hindi Story Owl and Swan यह हिंदी कहानी उल्लू और हंस की है। उल्लू (owl) एक पेड़ पर बैठा था। अचानक एक हंस (swan) भी आकर पर बैठ गया। हंस (swan) ने कहा, “उफ! कैसी गर्मी है। सूरज आज बड़े प्रचंड से चमक रहा है।” उल्लू बोला, “सूरज! यह सूरज क्या चीज है? इस वक्त गर्मी […]

  • savitri सती सावित्री (Sati Savitri)

    सती सावित्री Story Sati Savitri and Satyavan in Hindi मद्रदेश के राजा अश्वपति धर्मात्मा एवं प्रजापालक थे। उनकी पुत्री का नाम सावित्री था। सावित्री जब सयानी और विवाह योग्य हो गयी तब राजा ने उससे कहा-पुत्री! तू अपने योग्य व स्वयं ढूंढ ले। तेरी सहायता के लिए मेरे वृद्ध मंत्री साथ जायेंगे। सवित्री ने संकोच के साथ पिता की बात […]

One thought on “सूने पहाड़-मेरा संस्मरण

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*