बाघ और खरगोश

बाघ और खरगोश – Moral Story in Hindi
Tiger and Rabbit 

यह मोरल स्टोरी (moral story) बाघ (tiger) और खरगोश (rabbit) की है जिसमें यह बताया गया है कि शांतचित्त मन से विकट से विकट परिस्थिति का भी सफलतापूर्वक सामना किया जा सकता है। मोरल स्टोरी इस प्रकार है कि एक समय की बात है जंगल में एक खरगोश रहता था। वह काफी समझदार और चालाक था। बहुत छोटा होने के बावजूद वह किसी जानवर से नहीं डरता था।

एक दिन बाघ भोजन की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। उसने कई दिनों से कुछ नहीं खाया था। उसकी नजर खरगोश पर पड़ गयी। वह बहुत धीरे-धीरे छुपता-छुपाता खरगोश के पास गया और उसे झपट लिया। खरगोश के पास बचने को कोई अवसर नहीं था।

बाघ ने कहा-“मैंने कई दिनों से कुछ नहीं खाया है। आज तुम मेरा भोजन हो।”

खरगोश(Rabbit) बाघ का शिकार नहीं बनना चाहता था। उसने शांत बने रहने का प्रयास किया और इधर-उधर नज़र दौड़ाई। वहीं पास ही भैंस का ताजा गोबर पड़ा हुआ था। खरगोश के दिमाग में बचने का एक आइडिया आया।

“मुझे दुःख है कि मैं आपका भोजन नहीं बन सकता। राजा शेर ने मुझे अपने केक की रक्षा करने का आदेश दिया हुआ है।”

“राजा का केक”- बाघ ने उत्सुकतावश कहा।

“हाँ, यही है।” खरगोश ने गोबर की तरफ इशारा किया। “यह बहुत ही स्वादिष्ट है। राजा नहीं चाहते कि इसको कोई खाये इसलिए उन्होंने केक की सुरक्षा के लिए मुझे तैनात किया है।”

“क्या मैं चख सकता हूँ!” बाघ से पूछा।

“मुझे खेद है। आप नहीं चख सकते। राजा बहुत नाराज हो जायेंगे।” खरगोश ने कहा।

“बस थोड़ा सा, प्यारे खरगोश! राजा को कभी पता नहीं चलेगा।” बाघ ने चापलूसी की।

“चलो, ठीक है। परन्तु पहले मुझे दूर जाने दें जिससे की राजा मुझ पर आरोप न लगा सकें।” खरगोश ने कहा।

“ठीक है! तुम जा सकते हो।” बाघ राजी हो गया।

खरगोश सिर में पांव रखकर बड़ी तेजी से भागा।

बाघ ने मुट्ठीभर कर केक उठाया और मुहं में डाला।

छी…छी…छी! वह थूकता जा रहा था। “यह तो केक नहीं भैंस का गोबर है।”

इस मोरल स्टोरी (moral story in hindi) से हमें यह सीख मिलती है कि विकट से विकट परिस्थिति (difficult situation) में भी अपना हौसला नहीं खोना चाहिए। शांतचित्त से विचार करने से बचाव का रास्ता निकल ही जाता है।

यह मोरल स्टोरी भी पढ़ें: कछुआ और बंदर


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