रेड क्रॉस सोसायटी के जनक – हेनरी डूनेंट

Red Cross Society के जनक – हेनरी डूनेंट in Hindi

red cross society

Henry Dunant (Father of Red Cross Society) का जन्म 8 मई 1828 को जिनेवा, स्वीटजरलेंड में हुआ। उनके माता-पिता बहुत परोपकारी स्वभाव के थे। उनके पिताजी बैंकर थे लेकिन वे हमेशा अनाथ बच्चों को आश्रय प्रदान करने का प्रयास करते थे। हेनरी के घर में अनाथालयों और जेल तथा अस्पतालों की स्थिति और उनके सुधार के लिए चर्चा होती रहती थी। उनकी माता जी भी अक्सर गरीब, बीमार और अनाथ लोगों के पास जाती और उनको भोजन और कपड़े दान देती थी।

कुछ बड़े होने पर वे भी अपनी माँ के साथ जाने लगे। यह सब यादें उनके मन में गहराई तक बैठ गयी और उन्हें लगने लगा कि असहाय लोगों की मदद करना ही उनके देश के हर जिम्मेदार नागरिक का प्रथम कृतव्य है।

बड़े होने पर Henry Dunant सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे। वे गरीब और बीमार लोगों की देखभाल करने वाली एक सामाजिक संगठन के सदस्य बन गये। वे नियमित रूप से भोजन और उपहार लेकर अपने नगर के जेल में जाते और कैदियों को अच्छा नागरिक बनने के लिए प्रोत्साहित करते।

सन् 1849 में वे जिनेवा के एक बैंक में नौकरी करने लगे। चार साल बाद ही उन्हें जनरल मैनेजर के पद पर नियुक्ति मिल गयी और उनका स्थानान्तर अल्जीरिया हो गया। कुछ साल बाद उन्होने कम्पनी की नौकरी छोड़ स्वयं का व्यवसाय शुरू कर दिया।

सोलफेरिनो का युद्ध – The Battle of Solferino

डूनेंट को अपने काम के सिलसिले में दूर देशों तक यात्रा करनी पड़ती थी। ऐसा ही एक यात्रा में जून 1859 में इटली के शहर लोम्बार्डी पहुंचे। वहां अचानक एक दिन फ्रांस और आस्ट्रीया के बीच लड़ाई छिड़ गयी। इस 15 घंटे की लड़ाई में हजारों लोग मारे गये तथा घायलों की संख्या अनगिनत थी जो कि पल-पल मौत की तरफ बढ रहे थे।

Henry Dunant यह बस बेचारगी से देख रहे थे। वे किसी को मरते-तड़पते हुए नहीं देखना चाहते थे। तुरन्त एक स्वयंसेवकों का एक दल बनाना जरूरी था। वे जानते थे कि आसपास के सारे अस्पताल घायलों से भर चुके हैं, वहां से कुछ भी सहायता की आशा नहीं करनी चाहिए। उन्होंने अपने प्रयत्न से स्वयंसेवकों और डाक्टरों की एक टीम तैयार की और हताहतों को नजदीकी चर्च में ले गये।

अधिकतर स्वयंसेवी फ्रेंच और सरडीनियन सैनिकों की तो दिल-जान से देखरेख कर रहे थे क्योंकि वे उनको अपना साथी समझते थे। आस्ट्रीयन सैनिकों को अपने हाल पर ही छोड़ दिया जा रहा था। Henry Dunant से यह सब कुछ नहीं देखा गया। उन्होने सबको समझाया और सब घायल सैनिकों की बिना भेदभाव से सहायता के लिए राजी किया।

Dunant ने नेपोलियन से पकड़े गये आस्ट्रीया के डाक्टरों को छोडने की अपील की। नेपोलियन तैयार हो गये। छोड़े गये डाक्टर भी घायलों के उपचार पर जी-जान से जुट गये।

युद्ध की यह सब स्थिति देखने के बाद Dunant के मन बहुत बिचलित हो गया था। युद्ध कि विभित्सा उनके मन मे बार-बार घूम रही थी। वे अपने देश वापिस लौट गये। अब उनका मन काम में बिल्कुल नहीं लग रहा था।

उन्होने देखा था कि लोगों का उत्साह और सहायता भी किस प्रकार बेकार जा रही थी। जो खाना और कपड़ा सहायतार्थ दी गयी थी वे तो बहुत से रोगियों के किसी काम की थी ही नहीं। यदि यह सब उनको पहले से ही पता होता तो उनकी सहायता और सद्इच्छा का बेहतर इस्तेमाल हो सकता था। इसी प्रकार यदि डाक्टरों को बंदी नहीं बनाया जाता तथा अस्पतालों पर आक्रमण नहीं किया जाता तो शायद इलाज बहुत आसानी ने उपलब्ध हो सकता था।

डूनेंट की पुस्तक – A Souvenir of Solferino

अब Dunant दिन-रात इस स्थिति के उपाय के लिए सोचने लगे। उन्होने निश्चित किया कि अपने विचारों और उपायों को एक किताब की शक्ल दी जाए और उसे यूरोप में प्रभावशाली समाज के बीच वितरित किया जाए।

उनकी किताब फ्रेंच भाषा में लिखी गयी। इसे पूरा करने में उन्हे 12 माह का समय लगा। 1862 में इसका प्रकाशन हुआ। A Souvenir of Solferino में उन्होने प्रत्येक देश में स्वयंसेवी संघटन बनाने का सुझाव दिया जिसको युद्ध काल में बिना किसी भेदभाव के हताहतों की सहायता के लिए भेजा जा सके। उन्होने एक अंतर्राष्ट्रीय संधि की आवश्यकता पर बल दिया जिसमें घायलों को सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान हो। इन सब कार्यों के कारण वे अपने व्यवसाय पर ध्यान नहीं दे पा रहे थे जिससे उनका पूरा व्यवसाय चैपट हो गया। अब उनके सामने एक मकसद था, जिसके लिये उन्होने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था।

डूनेंट के सुझाव को बहुत अनुकूल प्रतिक्रिया मिल रही थी। जिस किसी ने भी डूनेंट की किताब को पढा वे युद्ध कि विभित्सा से अवगत हुए तथा घायलों की सहायता के लिए उनके मन में दया का संचार हुआ।
उन्हीं में से एक गुस्टेव मोयनीर, जो कि जानेमाने वकील और परोपकारी व्यक्ति थे, डूनेंट की पुस्तक से बहुत प्रभावित हुए। मोयनीर जिनेवा पब्लिक वेलफेयर सोसाईटी के अध्यक्ष थे।

रेड क्रॉस सोसायटी का जन्म (Origin of Red Cross Society)

1863 में पब्लिक वेलफेयर सोसाईटी की मीटिंग में Dunant के विचारों की विस्तृत चर्चा हुई। तत्काल पांच लोगों की एक कमेटी बनाई गयी जिसका काम रिलीफ सोसाइटीज् को संगठित करना था। इस कमेटी में डूनेंट को सचिव का पद दिया गया।

यह एक छोटे से देश के पांच लोगों का एक साहसिक कदम था। कमेटी ने पूरे यूरोपीय सरकारों को कान्फ्रेंस में अपना प्रतिनिधि भेजने का प्रस्ताव दिया। डूनेंट ने पूरे यूरोप में भ्रमण करके सरकारों को इस कांफ्रेस को समर्थन देने के लिए राजी किया। 26 अक्टूबर 1863 में हुए सम्मेलन में 14 देशों के 36 प्रतिनिधि शामिल हुए।

दूसरा सम्मेलन 8 अगस्त 1864 में हुआ जिसे कि स्विस फेडरल सरकार ने बुलाया जिसमें कि वकायदा Red Cross Society बनाने का प्रस्ताव रखा गया और घोषणा पत्र पर दस्खत किये गये, जो कि पूरे विश्व के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। अब उम्मीद की जाने लगी कि युद्ध मे घायल को तत्काल सहायता मिलेगी और बंदी मौत की सजा से बच जायेंगे।

पहला नोबल शान्ति  पुरस्कार (First Nobel Peace Prize)

Dunant को मानवता के हित के लिए किये गये असाधारण कार्य के सम्मान में 1901 में शान्ति का प्रथम नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। 30 अक्टॅूबर 1910 में 82 वर्ष की उम्र में महान मानवतावादी हेनरी डूनेट का निधन हो गया।

आज रेड क्राॅस सोसाइटी (Red Cross Society) पूरे विश्व में फैला हुआ है। इसका मुख्य कार्यालय जिनेवा, स्विटजरलेंड में है। इसके लगभग 10 करोड़ स्वयंसेवी सदस्य हैं जो कि मानव जीवन, स्वास्थ्य चिकित्सा को सुनिश्चित करने के लिए दिन रात मिलकर काम करते हैं।

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