खुशियाँ सिर्फ पैसों से नहीं मिलती | Nek Chand

खुशियाँ सिर्फ पैसों से नहीं मिलती | Nek Chand

यह प्रेरणादायक कहानी है नेकचंद जी (Nek Chand Saini) की, जो हमें यह शिक्षा देती है कि हमारा हर काम हमेशा पैसों अथवा लाभ को ध्यान में रखकर ही नहीं होना चाहिए। यदि आप अपनी रूचि के प्रति जुनूनी  हैं तो इसके लिए आपको रिवार्ड या एवार्ड की प्रवाह नहीं होनी चाहिए, बस आप अपने उस काम में खुशियाँ तलाशते रहें। देखिये नेकचंद अपनी interest और hobbies के प्रति किस तरह motivated थे कि एक-दो नहीं बल्कि 18 साल तक लगातार इधर-उधर से टूटा फूटा सामान ढूंढते, उसे एक जगह इकट्ठा करते और सुन्दर आकार देते जाते यह जानते हुए भी कि उनकी नौकरी जा सकती है तथा वर्षाें की मेहनत एक ही दिन में मिट्टी में मिलायी जा सकती है।

नेक चन्द (Nek Chand Saini) का जन्म 15 दिसम्बर 1924 को पाकिस्तान के बेरियन कलां गांव, शकरगढ़ में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। बंटवारे के बाद वह और उनका परिवार चंडीगढ़ में आकर बस गए थे।

भारत में पहला योजनाबद्ध तरीके से एक नये शहर (planned city) का निर्माण कार्य चंड़ीगढ मे हो रहा था। नेकचंद ने वहां 1951 में रोड़ इंस्पेक्टर के पद पर P.W.D. ज्वाईन कर लिया।

Nek Chand

शहर विस्तार योजना में बहुत सारे गांव खाली करा दिये गये थे। गांव वाले पीछे छोड़ गये थे टूटा-फूटा सामान और कूड़ा-कचरा। नेक चन्द ड्यूटी के बाद अपनी साइकिल से आस-पास के खाली कराये गांवों में जाते तथा वहां से वह कबाड़ा, जो उनको काम का लगता था, लाद कर लाते। सारा सामान उन्होंने जंगल में एक जगह इक्टठा करना शुरू कर दिया।

फिर उन्होंने एक सपनों की दुनिया बसाने के लिए छोटा सा क्षेत्र साफ किया और धीरे-धीरे अपनी imagination के अनुसार इन बेकार की वस्तुओं को आकार देना शुरू किया और इसका विस्तार करते गए तथा उसे बगीचे का रूप देते गये।

Nek Chand चीनी मिट्टी के टूटे बर्तनों, बिजली के सामान, कांच और चूड़ियाँ, बाथरूम की टाइलों, वाश बेसिन और साइकल के फ्रेमों जैसे बेकार सामान का इस्तेमाल करके मानव आकृतियाँ, जानवर, पक्षी, लतायें तथा भगवान की मूर्तियाँ बनाते। इस तरह वह तमाम उन चीजें जिन्हें हम useless समझ कूड़े के ढेर का हिस्सा बना देते हैं, आश्चर्यचकित करने वाला नया रूप देते जाते। यह भी विदित रहे कि उन्होंने इस अद्भुत कलाकारी की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी।

जंगल में इस तरह से किया गया छेड़छाड़ एक तरह से अवैध कब्जा ही था, जिससे कि उनकी नौकरी जाने तथा पूरा निर्माण ध्वस्त किये जाने का खतरा हमेशा ही बना रहता था। इसलिए वह यह सब काम ड्यूटी के बाद चुपके से किया करते थे।

Rock Garden

इस तरह वे करीब 18 सालों तक गुपचुप तरीके से रात के अंधेरे यह कार्य करते रहे तथा साथ-ही-साथ ड्यूटी भी honesty से किया करते थे और अपना शौक (hobby) भी पूरा करते। उन्होने 12 एकड़ जमीन को कलाकृतियों से पाट दी थी।

आखिर वे अपने इस निर्माण कार्य को कब तक छुपा सकते थे। एक दिन 1972 में जंग साफ कराते समय उनके इस निर्माण स्थल पर उच्च अधिकारियों की निगाह पड़ ही गयी मगर वे नेक चंद (Nek Chand) के इस अद्भुत कार्य को देख कर दंग रह गये। यह कार्य सरकार के मास्टर प्लान का हिस्सा न होने के कारण तोड़ना पड़ रहा था। अधिकारियों का कहना था कि यह उन कड़े कानूनों का उल्लंघन है जो शहरी सौदर्यीकरण की रक्षा के लिए बनाए गए थे, जहाँ यह अनिवार्य था कि हर चीज मास्टर प्लान के हिसाब से ही होनी चाहिए।

नेक चंद (Nek Chand) को अपनी इस रचना को बचाने के लिए difficulties का सामना करना पड़ रहा था, लेकिन अब तक उनके इस कार्य की ख्याति आग की तरह चारों तरफ फैल चुकी थी तथा आम जनता उनके निर्माण की रक्षा के लिए आगे आ गयी तथा अधिकारियों को झुकना पड़ा।

अब सरकार ने अब इस कार्य को अपने अंतर्गत ले लिया और एक नाम दिया राॅक गार्डन (Rock Garden)। नेक चंद को उनके वर्तमान कार्यभार से मुक्त कर दिया गया तथा पूर्णकालीन सब-डिवीजन मैनेजर बना कर पार्क का विस्तार, रिसाइकिल मटेरियल इकट्ठा करने और सौन्दर्यीकरण के लिए उन्हें 50 मजदूर भी दिए गए।

इस पार्क को 1976 में जनता को समर्पित कर दिया गया। यह अब 40 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है और भारत एवं विदेशों से प्रतिवर्ष लाखों लोग इसे देखने आते हैं, जिससे टिकटों की बिक्री से करीब 2 करोड़ रुपये की वार्षिक आय होती है। कहा जाता है कि यह पार्क भारत में ताजमहल को देखने के बाद सबसे ज्यादा देखे जाने वाला स्थान है।

यहाँ इस गार्डन में सभी कलाकृतियाँ, मूर्तियाँ आदि बैकार सामान के इस्तेमाल से बनाई गयी हैं और उनका ऐसा सुरूचिपूर्ण इस्तेमाल देखकर कोई भी आश्चर्यचकित रह सकता है। उनके इस अद्भुत कार्य से न सिर्फ चंडीगढ़ का मान बढ़ा बल्कि पर्यटन क्षेत्र के रूप में विश्व भर में पहचान बढ़ी। यह उनकी चंडीगढ़ को दी गयी एक अनमोल धरोहर है।

कचरे के ढेर से नायाब राक गार्डन बनाने के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1984 में पद्मश्री से नवाजा। 1984 में उनकी इस कृति को भारतीय डाक टिकट पर स्थान मिला।

उनकी यह रचना पूरे भारत के लिए नायाब तरीके से समाज की सेवा और सृजनात्मकता, सौंदर्य, कठिन मेहनत और उत्साह का प्रेरणादायक उदाहरण है। यह लोगों को किसी काम में न आ सकने वाली बेकार सामग्री की Recycle की सीख भी देती है जिससे कि पर्यावरण की रक्षा हो सके।

महान प्रेरणा के स्रोत श्री नेकचंद जी (Nek Chand Saini) का देहान्त 12 जून 2015 को 90 वर्ष की आयु में हो गया लेकिन जब तक राॅक गार्डन है तब तक वे सदैव याद किये जाते रहेंगे।

पूरी लिस्टः Inspirational story in Hindi


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