हार के बाद जीत है Failure to Success

हार के बाद जीत है Failure to Success Motivational Stories in Hindi

failure success

Motivational stories of Great Personalities: जीवन में सफलता मिलती है सकारात्मक सोच और लगातार प्रयास से। जब भी हम-आपको निराशा घेरती है, भविष्य अनिश्चित-सा लगता है, उस समय अपने कार्यक्षेत्र में उन लोगों का जीवन अनुभव, जिन्होंने कड़े संघर्ष के बाद सफलता का स्वाद चखा, हमारे सामने उस प्रकाश-पुंज की तरह होता है जो हमें मंजिल की तरफ बढ़ते रहने का साहस और राह दिखाता है। आइये पढ़ते हैं कुछ उन लोगों की विफलता (failure) और उसके बाद मिली सफलता (success) की कहानी (stories) जो हमारे लिए प्रेरणा (motivation) के स्रोत हैं।

अब्राहम लिंकन Abraham Lincoln

असफलता (failure) से सफलता (success) की सबसे बड़ी दास्तान तो अब्राहिम लिंकन का स्वयं का जीवन है। जिस भी काम में वे हाथ डालते थे सिर्फ-और-सिर्फ असफलता (failure) ही हाथ लगती थी। सबसे पहले उन्होने व्यवसाय किया असफल (unsuccessful) रहे। चुनाव लड़ा, हारे । फिर व्यवसाय करने की ठानी, फिर असफल हुए। 1833 में मंगेतर की मौत से मानसिक सदमा लगा जिससे उबरने में कई वर्ष लगे। फिर चुनाव लड़ा, हारे। हार ही दस्तान जारी रही। वे सिर्फ एक चीज नहीं हार रहे थे वह था उनका संकल्प तथा दृढ इच्छाशक्ति। आखिरी बारी उन्होने राष्ट्रपति के पद के लिए चुनाव लड़ा और जीते और अमेरिकी इतिहास के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति बने।

अमिताभ बच्चन Amitabh Bachchan

उन्होने एक्टिंग को अपना केरियर बनाने का निर्णय लिया तो उनकी लगातार कई फिल्में फ्लाप हुई। फिल्मी दुनिया में कहा जाने लगा था कि यह लम्बा आदमी तो हीरो बनने लायक ही नहीं है। कई विफलताओं (failure) के बाद ही उन्हें आश्चर्यजनक सफलता (success) प्राप्त हुई। अमिताभ बच्चन ने अपने शानदार एक्टिंग केरियर के बीच अमिताभ बच्चन कोरपोरेशन नाम की कम्पनी खोली। कम्पनी दिवालिया हो गयी और वे कर्ज में डूबते चले गये। बैंक द्वारा कर्ज वसूली के लिए उनके घर-नीलामी की भी नौबत आ गयी थी। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लगातार संघर्ष करते रहे तथा काम मांगने डायरेक्टरों के पास जाने लगे। संघर्ष ने उन्हें काफी मजबूत बना दिया था। टीवी सीरियल कौन बनेगा करोड़पति ने उनकी किस्मत का दरवाजा दुबारा खोला और धीरे-धीरे उन्होंने अपनी पुरानी सफलता (success) से भी बड़ी सफलता प्राप्त की। उनके इन संघर्षों ने यह साबित कर दिया कि सफलता और सम्मान तो आपकी काबिलियत और नजरिए से ही प्राप्त होती है।

थामस अल्वा एडिशन Thomas Alva Edison

यदि थामस एडिशन असफल (fail) नहीं होते तो शायद वे दुनिया के सबसे महान अविष्कारक न बनते। अधिकांश अविष्कारकर्ताओं के भांति जब उन्होंने अपना कैरियर शुरू किया था तो वे बहुत उत्साहित थे उन्हें लगा कि वे एक महत्वपूर्ण मौलिक समस्या का समाधान कर सकते हैं। उस समय जब अमेरिकन कांग्रेस में वोटिंग होती तो हर सिनेटर को बारी-बारी से खड़े होकर अपना पक्ष बताना होता था। एडिसन को विश्वास था कि वे ऐसी प्रणाली को बना सकते हैं जिससे कि वोटों की अपने-आप गिनती और उसका जोड़ हो जाए जिससे कि काफी महत्वपूर्ण समय बच सकता है।

एडिसन अपना प्रोडक्ट सीनेटरों को दिखाने के लिए बहुत इच्छुक थे तथा उन्हें विश्वास था कि उनके इस माॅडल को सराहना मिलेगी। लेकिन जब उन्होंने सिनेटरों के सामने डेमो दिया तो उनके इस अविष्कार को सिरे से खारिज कर दिया गया क्योंकि सिनेटर अपना वर्तमान वोटिंग पद्धति को छोड़ना ही नहीं चाहते थे। इस घटना से निराश न होकर उन्होंने यह सीखा कि भविष्य में ऐेसी कोई चीज नहीं बनायेंगे जिसे कि कोई खरीदना ही नहीं चाहे।

अपने सबसे महत्वपूर्ण अविष्कार बिजली के बल्ब को बनाने में उनके लगभग 10,000 प्रयास विफल रहे थे लेकिन अपनी हर विफलता (failure) से कुछ न कुछ सीखा और अंत में अपने मकसद में वे कामयाब हुए।

कर्नल सैंडर्स  Colonel Sanders – KFC

कर्नल सैंडर्स का जन्म 1890 में हुआ था। जब वे सिर्फ 5 वर्ष के थे तो उनके पिता का निधन हो गया था। परिवार चलाने के लिए अब उनकी माता जी को नौकरी करनी पडी। अतः घर में उन्हें अपने भाई-बहनों का ख्याल रखते हुए खाना भी पकाना पड़ता था। इस तरह 7 साल की उम्र तक वे अच्छे खानसामा बन चुके थे।

कर्नल सैंडर्स के संघर्षशील जीवन को तब सफलता मिली जब उनकी आयु 65 वर्ष की हो चुकी थी और उनके पास खोने के अब कुछ भी नहीं बचा था।

उनको एक काम बहुत अच्छे से आता था वह था चिकन बनाना। उन्होने केन्टूची के घर को छोड़ा और चिकन रैसिपी को बेचने के लिए अमेरिका भर के अलग-अलग राज्यों में जाने लगे। वे बस इतना चाहते थे कि जितना भी वे चिकन बेचें उस पर उनको कुछ प्रतिशत कमीशन मिल जाये। उनके इस आइडिया को पसंद नहीं किया गया। लेकिन कर्नल सैंडर्स भी जिद्दी थे, उन्होने परिस्थिति से समझौता नहीं किया और अपनी धुन में लगे रहे। उनके आइडिया को पहली कामयाबी 1009 बार नहीं सुनने के बाद मिली।

विचार कीजिए 65 वर्ष की वह आयु जिसमें कि अधिकतर लोग रिटायरमेंट ले लेते हैं तथा जैसा चल रहा है उसी परिस्थिति में समझौता करने लगते हैं उन्होंने हार नहीं मानी और ऐसा व्यवसाय खड़ा किया जो आज 120 से भी ज्यादा देशों में फैल चुका है। उन्होंने अपने संघर्ष से यह साबित कि कामयाबी के लिए न उम्र की कोई सीमा होती है न हीं पूंजी कोई बाधा, बस आवश्यकता होती है इच्छाशक्ति और बेहतर प्लानिंग की।

जेन कूम Jan Koum – Whatsapp Co-founder

जेन कूम का जन्म 1976 में यूक्रेन के पास एक छोटे से गांव में हुआ था। कॉम की मां एक गृहणी थीं और उनके पिता कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते थे। वे अक्सर घर से बाहर रहा करते थे। घर के हालात ठीक नहीं थे। रोजमर्रा की चीजें जुटा पाना भी एक कठिन होता था।

16 वर्ष की उम्र में वे अपनी माँ के साथ अमेरिका आए थे। कूम की माँ अपने साथ पैंसिल का डिब्बा और नोटबुकस् भी लेकर आयी थी ताकि स्कूल का खर्चा कुछ कम हो सके। वे सरकार द्वारा मिले हुए रिफूजी भत्तों से गुजारा करते थे तथा अपनी माँ के साथ मुफ्त भोजन के लिए कतार में लगते थे। कूम को पहला काम एक ग्रोसरी स्टोर में साफ-सफाई का मिला।

घर की स्थिति और भी विकट हो गयी जब उनकी मां कैंसर की बीमारी की चपेट में आ गयी। अब उन्हें सरकार द्वारा दी जाने वाली अक्षमता पैंशन पर गुजारा करना पड़ रहा था। कूम नेे छोटा-मोटा काम करते हुए कंप्यूटर नेटवर्किंग का ज्ञान हासिल किया। पढाई के लिए उन्होंने पुरानी पुस्तकें खरीदी और बाद में उन्हीं को फिर बाजार में बेच कर कुछ पैसे बचाये।

सन् 2009 में जेम कूम ने अपने साथी ब्रायन एक्टन के साथ मिलकर वट्सएप बनाया। उनका यह एप बहुत जल्द ही लोकप्रियता की शिखर पर था। फेसबुक ने कुम के साथ 19 बिलियन डाॅलर का अधिग्रहण समझौता किया था यह वही फेसबुक थी जिसने कभी उन्हें अपने यहां नौकरी के लायक नहीं समझा था। यह भी विदित हो कि कूम ने फेसबुक के साथ अधिग्रहण समझौते पर उस भवन में हस्ताक्षर किये जहां वह और उनकी माँ मुफ्त भोजन के लिए कभी कतार में लगा करते थे।

मंसूर अली खाँ पटौदी Mansoor Ali Khan Pataudi

एक क्रिकेटर जितनी अपनी बाजुओं की ताकत मे विश्वास करता है उतनी अधिक चपल उसकी आंखे भी होती हैं जो कि गेंद को दूर से ही भांप सके।

1 जुलाई 1961 में जब वे सिर्फ 21 वर्ष के थे तो एक सड़क दुर्घटना में उनकी एक आँख चली गयी। किसी ओर के लिए यह उसके लिए क्रिकेट जीवन का अंत होता। इस निराशाजनक परिस्थिति में भी उन्होने हार नहीं मानी और एक आँख के साथ ही 6 माह बाद भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल हो गये। पटोदी ने 46 टेस्ट मैच खेले जिसमें उन्होने 34.91 की एवरेज से 2793 रन बनाये जिसमें कि 6 टेस्ट शतक भी शामिल हैं। वे दुनिया के दूसरे तथा भारत के सबसे युवा कप्तान रहे हैं तथा आज की तारीख में उनकी गिनती देश के सर्वश्रेष्ठ कप्तानों में होती है। सन् 1967 में उन्हीं की कप्तानी में भारत ने विदेशी धरती न्यूजीलैंड में पर अपना पहला टेस्ट सीरीज जीता थी।

स्टीफन किंग Stephen King

एक समय वे छोटी-छोटी कहानियाँ लिखने वाले अंग्रेजी के अध्यापक थे। उनको शराब पीने की लत भी लग गई जिसे छोड़ने में उन्हें एक दशक लग गया। उनकी पहली नाॅबल “Carrie” को 30 प्रकाशकों ने अस्वीकार कर दिया। निराश होकर उन्होंने इसे कचड़े के ढेर में फेंक दिया था। पत्नी की बात मानते हुए उन्होंने एक प्रयास और करने का निश्चय किया और कहानी को प्रकाशक के पास भेज दिया। उनको इसके बाद मिली सफलता तो अब इतिहास में दर्ज है। उनकी यह किताब बेस्ट सेलिंग बुक में शामिल है तथा इस पर दो फिल्में भी बन चुकी हैं। इनकी और भी कई पुस्तकें बेेस्ट सैलिंग रही हैं। उनके लेख के विषय अलौकिक कल्पना और डरावनी कहानियाँ होती हैं।

शिव खेरा Shiv Khera

शिव खेरा को मोटिवेशनल लेखक (motivational writer) और स्पीकर (speaker) के रूप में काफी ख्याति प्राप्त है। यह सफलता (success) उनको आसानी से नहीं मिल गयी। वे पढाई में अच्छे नहीं थे। वे दसवीं में पहले प्रयास में फेल हो गये थे लेकिन 12वीं में फस्ट डिवीजन से पास की। उन्होंने कार वासिंग का कार्य किया तथा इन्सोरेन्स एजेन्ट के रूप में भी कुछ समय बिताया।

एक बार तो उनपर लेख चोरी का आरोप लगा था। यह केस कोर्ट में चला गया था बाद में यह मामला कोर्ट के बाहर सेटिल किया गया। इस तोड़ देने वाली स्थिति में भी उन्होने हार नहीं मानी और लगातार लिखते रहे। आगे चल कर उनकी किताबें दुनिया में सबसे अधिक बिकने वाली मोटिवेशनल पुस्तकों को फेरिस्त में शामिल हुई।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी Nawazuddin Siddiqui

नवाजुद्दीन सिद्दीकी का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के छोटे-से कस्बे बुढ़ाना में एक किसान परिवार हुआ था। उन्होने हरिद्वार की गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से विज्ञान में ग्रेजुएशन पास किया। रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गये। वहां कुछ समय चोकीदारी का काम किया। उनके मन के कलाकार ने उन्हें बैचेन कर रखा था। अतः उन्होंने दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला ले लिया। कोर्स के बाद अपनी किस्मत अजमाने के लिए वे मुम्बई चले गये। लम्बे समय तक उनका संघर्ष का दौर जारी रहा। हताशा के इन दिनों में उनको अपनी माँ की यह बात हमेशा याद रही कि -“12 साल में तो घूरे के दिन भी बदल जाते हैं, बेटा तू तो फिर भी इन्सान है”।

सन् 2010 मे आमिर खान की फिल्म पीपली लाइव ने उनकी अदाकारी को दुनिया की नजरों में ला दिया। सन् 2012 में गैंग्स ऑफ वासेपुर, तलाश और पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों ने बॉलीवुड में एकदम अलग किस्म के कलाकार के रूप में उनकी पहचान बना दी। उन्होने रिजेक्शन और परेशानियों का एक लंबा दौर देखा था, लेकिन कभी धीरज नहीं खोया सिर्फ और सिर्फ अपना ध्यान काम करने में लगाये रखा। आज वे मुम्बई फिल्म उद्योग के सफल और सम्मानित कलाकारों में शामिल हैं।

कदमताल पर व्यक्तित्व विकास से सम्बन्धित लेख


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12 thoughts on “हार के बाद जीत है Failure to Success

  1. बहुत बढिया प्रमोद जी , आपने कई विश्व विख्यात लोगो की success story में ही सबकुछ लिख दिया है | धन्यवाद |

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