अन्ना मणि | Mahan Mahila Scientist in Hindi

अन्ना मणि | Mahan Mahila Scientist in Hindi

महान भारतीय वैज्ञानिक अन्ना मणि (ANNA MANI) की सफलता की कहानी पुरुषों और महिलाओं (ladies) को बराबर प्रेरित करती है। उनके समय लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव का उन्होने सफलतापूर्वक सामना किया। एक इंटरव्यू में उन्होने बताया था कि कैसे छोटी-छोटी गलतियों पर भी महिलाओं को असक्षम सिद्ध करने का पुरूष साथियों द्वारा प्रयास किया जाता था। उन्होने बताया था कि कैसे महान वैज्ञानिक सी.वी. रमण (C.V. Raman) भी पुरुष वैज्ञानिकों से विचार-विमर्श के समय महिला प्रशिक्षार्थीयों को दूर ही रखा करते थे। अतः कहा जा सकता है कि उनके समय महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में अपने पैर जमाने में कितनी ऐड़ी-चोटी का संघर्ष करना पड़ा होगा।

अन्ना मोडियाल मणि (Anna Mani) का जन्म 23 अगस्त 1918 को पीरमेडू, केरल, भारत में एक ईसाई परिवार में हुआ था। वे धनी माँ-बाप की सातवीं संतान थी। वे पांच भाई और तीन बहनों में थी। उनके पिता सिविल इंजीनियर थे जिनके इलायची बड़े बागान थे।

अन्ना (Anna Mani) को पुस्तक पढ़ने का जबरदस्त शोक था और बारह वर्ष की अल्पआयु में वो स्थानीय पुस्तकालय में रखी गयी अंग्रेजी और मलयालम भाषा की सभी पुस्तकों को पढ़ चुकी थीं। अपने आठवें जन्मदिन पर पारिवारिक रिवाज के अनुसार दिये जाने वाले हीरे के कुंडलों के गिफ्ट को नकार कर उन्होंने इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटाॅनिका खरीदी। यह उनके पुस्तकों के प्रति जुनून को दर्शाता है।

1925 में गांधी जी अन्ना के शहर में आए वहां उन्होने आत्मनिर्भरता और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार की बात की थी। गांधी जी का अन्ना पर गहरा प्रभाव पड़ा। हालांकि वे उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल नहीं हुई थी, परन्तु उन्होने खादी पहनना शुरू कर दिया और आजीवन खादी ही पहनी। व्यक्तिगत आजादी के प्रति भी उनके मन मे अलख जगी और अपनी बहनों की तरह जल्दी शादी न करके आगे शिक्षा ग्रहण करने का निर्णय लिया। वे आजीवन अविवाहित रहीं।

उनकी उच्च शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा पर परिवार ने विरोध तो नहीं किया था, परन्तु कम रूचि दिखाई थी। उस समय लड़को को उच्च शिक्षा दी जाती थी पर लड़कियों को सिर्फ इतना पढ़ाया जाता था कि वे शादी के बाद गृहस्थी अच्छी तरह संभाल सकें।

उन्होंनें 1940 ई. में मद्रास के पे्रसीडेन्सी काॅलेज से फिजिक्स आनर्स की डिग्री प्राप्त की। उन्हें बैंगलोर स्थित इंडियन इंस्ट्टियूट आॅफ साइन्स द्वारा आगे रिसर्च के लिए छात्रावृत्ति मिली। उन्हे सी.वी. रमण की लेबोरेटरी में ग्रेजुएट स्कोलर के रूप में दाखिला लिया। सर सी.वी. रमन के मार्गदर्शन में उन्होने हीरों और मानिक (रूबी) के वर्णक्रम (स्पेक्ट्राॅस्कोपी) पर शोध किया। इसके लिए उन्हें फोटोग्राफिक प्लेट्स को लम्बे समय तक प्रकाश में रखना पड़ता था, इसलिए वो अक्सर प्रयोगशाला में ही सो जाती थीं।

सर सी.वी. रमण (Sir C V Raman) की पत्नी अन्ना मणि (Anna Mani) को अपनी बेटी की तरह मानती थी। एक बार वे अन्ना को मद्रास के प्रसिद्ध हिन्दु मंदिर में अपने साथ ले गयी। उस समय आंतरिक गर्भगृह गैर.ब्राह्मण और विधवाओं के लिए प्रवेश पर मनाही थी। पुजारी अन्ना के माथे सिंदूर न देखकर अचंभित हुआ। उन्होंने उसे विधवा समझा और उन्हें गृभगृह से बाहर जाने का आदेश दिया। श्रीमती रमन ने तुरन्त प्रतिक्रिया की और उसके माथे में कुमकुम लगाया और उसे डांट कर कहा-‘सरस्वती, तुम इतनी लापरवाह क्यों हो! अपने पहनाव का ध्यान रखा करो’। अन्ना इस बात से बहुत खुशी हुई थी कि श्रीमति रमण ने उनका नाम धन की देवी लक्ष्मी की जगह ज्ञान की देवी सरस्वती के रूप में पुकारा था।

लंबी और श्रमसाध्य प्रयोगों के आधार पर उन्होने 1942 से 1945 के बीच पांच शोध-पत्र तैयार किए और मद्रास यूनिवर्सिटी को अपनी पीएचडी की थीसिस सौंपी। अन्ना के द्वारा अभी तक एम.एस.सी. न किये जाने के कारण, यूनिवर्सिटी ने उन्हें पीएचडी की डिग्री प्रदान नहीं की। सौभाग्य से इस कागजी डिग्री का अन्ना मणि के विज्ञान के प्रति रूझान और उनके भविष्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। आज तक उनके रिसर्स पेपर्स रमन रिसर्स इंस्टीयूट लाइब्रेरी में ससम्मान सुरक्षित रखे गये हैं।

कुछ समय बाद अन्ना मणि (Anna Mani) को इंग्लैंड में उच्च शिक्षा के लिए सरकार द्वारा छात्रावृित्त प्रदान की गई। उन्होने इंपीरियल काॅलेज, लंदन से मौसम-विज्ञान सम्बन्धी उपकरणों में विशेषज्ञता प्राप्त की।

अन्ना मणि 1948 में भारत वापिस आ गयी और पुणे स्थित भारतीय मौसम विभाग को ज्वाईन किया और वहां उन्हे रेडिएशन उपकरण के निर्माण कार्य का इंचार्ज बनाया गया। उस समय मौसम मापने के छोटे से छोटे से उपकरण भी विदेश से आयात होते थे। अन्ना ने कम-से-कम समय में देश में मौसम-विज्ञान के उपकरणों के उत्पादन की चुनौती को स्वीकारा। यह काम इतना भी आसान नहीं था क्योंकि देश में परिष्कृत मशीनों को चलाने वाले कुशल कारीगरों की बेहद कमी थी। परन्तु अन्ना ने जो भी संसाधन उपलब्ध था उससे ही काम को आगे बढा़ने की ठानी।

जल्द ही अन्ना मणि (Anna Mani) ने भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियर्स का एक कर्मठ समूह तैयार किया। अन्ना मणि ने 100 से अधिक मौसम सम्बन्धी उपकरणों का मानकीकरण किया और उनका उत्पादन शुरु किया। मणि की सौर-उर्जा में गहरी रुचि थी जिसे वो भारत जैसे गर्म देश के लिए बहुत अनुकूल मानती थीं। उस समय देश में सूर्य उर्जा सम्बन्धी भौगोलिक और मौसमी जानकारी की बहुत कमी थी।

1957-58 के इंटरनेशनल ज्योफिजिकल वर्ष में अन्ना मणि ने देश में सौर-उर्जा मापने का जाल बिछाया। इसके लिए शुरु में विदेशी उपकरणों का उपयोग किया गया परन्तु अन्ना मणि ने जल्द ही उन्हें देश में बनाने की व्यवस्था की। अन्ना मणि का मानना था कि गलत माप से तो माप न लेना ही बेहतर है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हर एक उपकरण का डिजाइन बढिय़ा और उच्च मापदण्ड वाला हो।

1960 में जब उन्होंनें ओजोन का अध्ययन शुरु किया, यह विषय उस समय लोकप्रिय नहीं थी। आजेान पृथ्वी की जीव सम्पदा को घातक किरणों से कैसे सुरक्षित रखती है यह बात दो दशकों बाद ही पता चली। मणि ने ओजोन मापने का एक उपकरण – ओजोनसोन्डे विकसित करने के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसके कारण भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल हुआ जिसके पास इस प्रकार का अपना स्वदेशी यंत्र है। मणि के इस महत्वपूर्ण योगदान के कारण उन्हें वल्र्ड मेट्रोलोजिकल एसोशिएसन ने उन्हें इंटरनेशनल ओजोन कमीशन का सदस्य मनोनीत किया गया।

1975 में वह मिस्र के वल्ड मेटरोलोकन आॅग्रनाइजेशन के विकिरण अनुसंधान की माननीय सलाहकार के रूप में कार्य किया। 1976 में अन्ना मणि भारतीय मौसम विभाग में डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुई और अपने पुराने अनुसंधान काल के रमण रिसर्च इंस्टिट्यूट में विजिटिंग प्रोफसर के रूप में जुड़ी और नई वैज्ञानिक पीढ़ी को अपना ज्ञान और अनुभव बांटने लगी।

उनके द्वारा लिखी दो पुस्तकें – हैन्डबुक आॅफ सोलर रेडियेशन डैटा फाॅर इंडिया (1980) और सोलर रेडियेशन ओवर इंडिया (1981) सौर-उर्जा पर काम कर रहे इंजिनियरों के लिए मानक पुस्तकें बन गयीं हैं। एक दूरदर्शी वैज्ञानिक की हैसियत से उन्होने भारत में पवन उर्जा की सम्भावनाओं को पहचाना और विभिन्न स्थानों से पवन गति सम्बन्धी आंकड़े एकत्रित और उसे प्रकाशित किया (1983)। अगर आज भारत पवन-उर्जा के क्षेत्र में छलांग लगा रहा है तो इसका काफी श्रेय अन्ना मणि को जाता है। वे देश के उन गिने चुने वैज्ञानिकों में शामिल थी जिन्होने शिक्षा और उद्योग के बीच की खाई को भरने का प्रयास किया। कई सालों तक वे एक सौर-उर्जा और हवा नापने के उपकरण बनाने वाली छोटी सी कम्पनी की प्रमुख रहीं।

अन्ना मणि प्रकृति प्रेमी थी। पहाड़ों पर घूमना और पक्षियों की गतिविधियों को ध्यान से देखना उनके शौक थे। वो कई संस्थानों जैसे कि – इंडियन नैशनल साइन्स एकैडमी, अमेरिकन मीटीरयोलाॅजिकल सोसाइटी, और इंटरनैशनल सोलर इनर्जी सोसाइटी की सदस्य थीं। 1987 में उन्हें इंडियन नैशनल साइन्स एकैडमी द्वारा के.आर.. रामनाथन पदक से सम्मानित किया गया।

1994 में उन्हें स्ट्रोक आया जिसके बाद वो पलंग से उठ नहीं पायीं। 16 अगस्त 2001 में तिरुवनन्तपुरम में उनका देहान्त हो गया।

पूरी लिस्टः Indian Scientist – भारत के महान वैज्ञानिक


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