राजकुमार सुधन्वा और अर्जुन (Sudhanva and Arjun War)

राजकुमार सुधन्वा और अर्जुन Story of war between Rajkumar Sudhanva and Arjun in Hindi

राजकुमार सुधन्वा (Sudhanva) चम्पकपुर के नरेश हंसध्वज का छोटा पुत्र था। वह जितना महान शूरवीर था, उतना ही महान ईश्वर भक्त भी था।

महाभारत युद्ध के पश्चात धर्मराज युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ किया। घोड़े के पीछे अर्जुन के नेतृत्व में सेना विजय-यात्रा कर रही थी। किसी भी राजा का घोड़ा पकड़ने का साहस नहीं था। विचरण करता हुआ घोड़ा चम्पकपुर की सीमा में प्रविष्ठ हुआ। राजा की आज्ञा से सैनिकों ने घोड़े को पकड़ लिया। अतः युद्ध छिड़ गया।

युद्ध में सुधन्वा ने पाण्डव-सेना का संहार करना शुरू कर दिया। बहुत दिनों के बाद पाण्डव सेना को किसी वीर सेना से युद्ध का अवसर मिला था। पर सुधन्वा की मार से सब बेहाल थे। सेना में अफरातफरी मच गयी। अब महाभारत युद्ध के विजेता अर्जुन (Arjun) की बारी आयी। सुधन्वा के वाणों की मार से अर्जुन के भी छक्के छूट गये।

एक बालक के हाथों से अपनी पराजय होते देख उन्हें अपने सारथी कृष्ण की याद हो आयी। सुधन्वा ने भी कृृष्णदर्शन की अभिलाषा से अर्जुन से कहा-‘यदि आप सुरक्षित जाना चाहते हैं तो अपने रक्षक सारथी ‘श्रीकृष्ण’ को बुलाइये।

अर्जुन को श्रीकृष्ण का स्मरण करना पड़ा। दो भक्तों की इच्छापूर्ति के लिए श्रीकृष्ण चाबुक लिये प्रकट हो गये। अब अर्जुन के रथ की रस्सी उनके हाथों में थी। इधन विपक्षी भक्त सुधन्वा शस्त्र त्याग कर दौड़ पड़ा और भगवान के चरणों में लिपट गया। उसे इसी दिन की तो प्रतिक्षा थी। उसे अश्रु से प्रभु के चरण धुल गये। उसके युद्ध का उद्देश्य सफल हो गया था।

अब अर्जुन (Arjun) को अपने-आप पर कुछ भरोसा हुआ। उसे सुधन्वा से कहा-क्षत्रिय होकर रण से मुख क्यों मोड़ता है। आ मुझसे युद्ध कर। यदि तीन बाणों से तेरा सिर धड़ से अलग न करूं तो अपने पितरों सहित नरक में पड़ा रहूं।

सुधन्वा बोला-अर्जुन! आप क्यों बढ़-चढ़ कर बातें कर रहे हैं। मैं भी प्रतिज्ञा करता हूँ यदि मैं आपके तीनों बाणों को कटकर खण्ड-खण्ड न कर दूं तो मुझे वीरगति न प्राप्त हो।

अर्जुन ने एक-एक कर दो बाण छोड़े, जिन्हें सुधन्वा (Sudhanva) ने काट दिया। किंतु जब अर्जुन के तीसरे बाण को भी सुधन्वा ने काटा तो उसके शोक का कोई छोर ही न रहा।

दोनों ही भगवान के भक्त थे। भगवान की लीला भी अपरम्पार है। कटे बाण की नोक स्वंय उठी जो सुधन्वा के सिर को धड़ से अलग करती भूमि पर जा गिरी। सुधन्वा का सिर भूमि में न गिर कर श्रीकृष्ण के चरणों में आकर गिरा। जैसे बालक पिता के चरणों में शरण ले रहा हो। श्रीकृष्ण ने मस्तष्क को बड़े सम्मान के साथ उठाया और ऊपर की तरफ फेंका। भगवान शिव ने मुण्ड को पकड़ लिया और अपने मुण्डमाला में उसको स्थान दिया।

इस तरह श्रीकृष्ण ने दोनों भक्तों की प्रतिज्ञा पूर्ण की। वस्तुतः सुधन्वा का आर्दश भक्तचरित्र ही अद्वितीय रहा।

पूरी लिस्ट: पौराणिक कहानियाँ – Mythological stories


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