आधुनिक चिकित्सा पद्धति (Allopathy) का विकासक्रम

आधुनिक चिकित्सा पद्धति का विकासक्रम Evolution / History of Modern Medical Practices (Allopathy) in Hindi

पुरातनकालीन भित्तिका-चित्रों और गुफाओं की अनुकृतियों के आधार पर इस बात की पुष्टि होती है कि उस समय मनुष्य को शरीर-रचना और विकृत अंगों का पूरा ज्ञान था। मनुष्यों और पशुओं के प्रजनevolution of allopathyन सम्बन्धी रोगों के चित्र भी इन गुफाओं में मिलते हैं। मिर्जापुर किले के लिखुनिया स्थित प्रपात के भित्ति चित्रों में इस तरह के अनेक चित्र मिलते हैं, जो इसके प्रणाम हैं कि भारत के इस क्षेत्र में मनुष्य संसार के अन्य भाग से अधिक विकसित थे।

पुरानी गुफाओं और भित्ती चित्रों से यह ज्ञात होता है कि ईसा के 9000 वर्ष पूर्व मनुष्य ने कुछ शल्य-क्रिया की विधियों का प्रयोग भी किया था। ऐसी विधियाँ शरीर के अंदर प्रविष्ट हुई दुष्ट आत्माओं को बाहर निकालने के लिए सम्भवतः प्रयोग की जाती थी, जिसमें सिर की हड्डी में छेद करके मस्तिष्ट का तनाव कम कर दिया जाता था। ग्रीक के इतिहास में एक रोगी के ऊपर इस तरह की गई शल्य क्रिया के प्रणाम मिलते हैं। आज भी इस तरह की शल्य क्रिया को मस्तिष्ट के ट्यूमर की जांच के लिए बायोप्सी (biopsy) करने के लिए किया जाता है। इस आपरेशन का एक दूसरा पक्ष भी है और वह यह कि कुछ स्थानों में इस विधि द्वारा निकाली गयी हड्डी गले में बांधकर लटकाई जाती थी, ताकि दुष्ट आत्माओं की छाया उस पर न पड़ सके।

होमियोपैथी चिकित्सा-प्रणाली के तथ्य

भारत History of Allopathy in India

भारत में चिकित्सा इतिहास बहुत ही प्राचीन है। 5000 ई.पू. सिंधु घाटी के मेहरगढ़ में दांतो की केवेटी को ठीक करने के लिए ड्रिल द्वारा भरने की विधि के बारे में पता चलता है। सर्जन सुश्रुत (Sushruta) ने अपनी पुस्तक संहिता में विभिन्न सर्जिकल विधियों का वर्णन किया है, जिसमें कि टूटी हड्डियों को जोड़ना, आंतों की रूकावट को दूर करना, मोतिताबिंद के आपरेशन आदि का विवरण मिलता है। महश्रि चरक (Charaka) द्वारा भी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणालियों के बारे में विवरण मिलता है, जिसमें दवाईयों द्वारा विभिन्न बीमारियों को ठीक करने का उल्लेख है।

मिस्त्र History of Allopathy in Egypt

मिस्त्र में चिकित्सा-शास्त्र का विकास नील नदी की संस्कृति के उत्थान और पतन के साथ-साथ ही हुआ। मिस्त्र की आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में सबसे बड़ी देन है शरीर-रचना का पर्याप्त अध्ययन। मिस्त्र में पिरामिडों के अन्दर मृत शरीर सुरक्षित रखने की कला ईसा के 3500 वर्ष पूर्व ही प्रचलित हो चुकी थी। मिस्त्र की चिकित्सा-पद्धति की विशिष्टता थी उसमें धर्म का समायोजन। इस परम्परा में अनेक देवताओं का आवाहन करके चिकित्सा की जाती थी। मिस्त्र में इमहोतेप (Imhotep) (2600 वर्ष ईसा पूर्व) हुए, जिन्हें चिकित्सा शास्त्र का पूरा ज्ञान था। सर विलियम ओसलर (Sir William Osler) ने उन्हें रियल फादर आॅफ मेडिशन कहा है।

चिकित्सा विज्ञान के विकास में दुष्ट आत्माओं द्वारा रोग फैलाने की धारणा का एक विशेष महत्व है, इन दुष्ट आत्माओं से मुक्ति के लिये रोगी को खाने-पीने के लिए विभिन्न पदार्थ दिये जाते थे जिसे कि लोग दैनिक रूप से उपयोग नहीं करते थे। इस प्रकार रोग, कारण और औषधी के सम्बन्ध की परम्परा का विकास हुआ और भूमि के अंदर पाये जाने वाले खनिज लवण, गंधक, ताम्र और पारे का प्रयोग प्रारम्भ हुआ।

ग्रीस History of Allopathy in Greece

शल्य चिकित्सा का विकास भी सम्भवतः ग्रीक चिकित्सा में खतने की प्रक्रिया से हुआ होगा। घाव को चीरने एवं कटे अंगों को सीने की पद्धति का विकास भी यहीं से हुआ तथापि मस्तिष्ट में छेद करने की कला एवं अंगों को काटने की कला का विकास अब तक यहां नहीं हुआ था। मेसोपोटामिया (Mesopotamia) में सुमेरियन (Sumerian) काल में लेखनकला का विकास हुआ और राजा अषुरबनिपाल (Ashurbanipal) के यहां स्लेटों पर उत्कीर्ण पुस्तकलाय के आधार पर (700 ईसापूर्व) प्रणाम मिलते हैं कि ग्रीक और मेसोपोटामियन-चिकित्सा में काफी समानता थी।

ईसा पूर्व 2000 वर्षों तक राजा हम्मूरबी (Hammurabi) द्वारा निर्धारित नियमों के अन्तर्गत हर चिकित्सक को चिकित्सा करनी होती थी और उसका पालन न करने पर कठोर राजदण्ड भुगतना पड़ता था। बेबिलोनिया (Babylonia) में इस काल तक चिकित्सकों कम से कम 250 पौधे, 120 खनिज-लवणों का ज्ञान हो चुका था। आसीरिया में रहने वालों को गंधक का भी प्रयोग करना आता था, जो कि आज तक औषधि के रूप में प्रयुक्त होता है।

Motivational stories in Hindi 

प्राचीन ग्रीस में चिकित्सा पद्धति के विकास का सारा श्रेय हेप्पीक्रेट्स, अरस्तु और गैलेन को जाता है, जिन्होंने लक्षणों के आधार पर रोग, कारण और औषधी की व्याख्या की। चिकित्साशास्त्र के पितामह माने जाने वाले हिप्पोक्रेट्स (Hippocrates) ने प्रामाणिक तौर पर उस समय की प्रचलित सभी चिकित्सा-पद्धतियों को एक सूत्र में पिरोकर आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र की नींव डाली। यहाँ यह अति महत्वपूर्ण प्रकाश डालना जरूरी है कि कि तब तक भारत में सुश्रुत द्वारा विकसित की गयी चिकित्सा पद्धति अपने चरम उत्कर्ष पर थी और हिप्पोक्रेट्स के लेखों में उसका पूरा प्रभाव है।

ग्रीस चिकित्सा पद्धति मे वैज्ञानिक दृष्टिकोण की उपज का सारा श्रेय आयोनियन और इटैलियन-ग्रीक दार्शनिकों को जाता है, जिनका उद्भव ईसा के पूर्व छठी शताब्दी में हुआ था।

रोग, कारण और निदान के त्रिकोण और चिकित्सा शास्त्र में लक्षण और कारक का विश्लेषण करने की परम्परा के जन्मदाता हिप्पोक्रेट्स ने तार्किक दृष्टि से इनकी अलग व्याख्या की। इन्होने समकालीन मान्यताओं और तथ्यों के आधार पर जो चिकित्सा की परम्परा चलायी, वह आज तक यथावत् बनी हुई है, मात्र उसमें समय-समय पर वैज्ञानिक शोधों के आधार पर थोड़ा-बहुत परिवर्तन हुए हैं।

अरस्तु (Aristotle) (3874-322 ईसापूर्व) मैसोडोनिया (Macedonia) में रहने वाले चिकित्सक के पुत्र थे। 17 वर्ष की आयु में उन्होने प्लेटो से शिक्षा ग्रहण की। प्लेटो की मृत्यु के बाद वे फिलिप के पुत्र सिकंदर के शिक्षक बने और तब तक वहाँ रहे जब तक कि सिकंदर एशिया में युद्ध के लिये चले नहीं गये। अरस्तु वापस एथेन्स में आकर चिकित्सा शास्त्र पढाने लगे। उन्होने जीव के विकासक्रम के आधार पर तुलनात्मक शरीर-रचना के वैज्ञानिक अध्ययन का विकास किया। उनके द्वारा प्रस्तुत अंडे से जीव का विकसित होना और भ्रूण के विकास का क्रम तथा मानव शरीर से उसका तुलनात्मक अध्ययन आगे चल कर जन्मजात रोगों को समझने के लिए एक प्रमुख प्रायोगिक माध्यम बना। इसी काल में अरस्तु ने मन, शरीर और हृदय के दार्शनिक पक्ष को भी जोड़ा।

रोम History of Allopathy in Rome

ईसा की पहली शताब्दी के प्रारम्भकाल में सेल्सस (Aulus Cornelius Celsus (c.25 BC – c.50 AD) नामक वैज्ञानिक ने रोग से विकृत अंगों के अध्ययन की परम्परा डाली। सेल्सस, एस्क्यूलेपियस (Asclepius) की परम्परा के शिष्य थे और उन्होंने आन्तरिक-बाह्य लक्षणों पर सर्वाधिक शोध किये। इस काल मेें रोम के नाविकों ने समुद्री यात्रायें प्रारम्भ कर दी थी, अतः लम्बी यात्रा के कारण होने वाले रोगों के निदान का भी समावेश किया गया। शल्यक्रियाओं मे प्रयुक्त यन्त्रों पर और सुधार हुआ तथा उन कई शल्य क्रियाओं का उल्लेख मिलता है जो कि सुश्रुत द्वारा प्रतिपादित थी। ईसा के 172 वर्षों के बाद ही शल्य क्रिया द्वारा प्रसव की परम्परा डाली गयी। कहते हैं जूलियस (Julius Caesar (October 49 BC – 15 March 44 BC) का जन्म भी इसी तकनीक से हुआ, जिसे उनके नाम पर (Cesarean) कहा गया। सीजर के काल में रोम में चिकित्सा कला का बहुत विकास हुआ। अन्य देशों के विद्वान चिकित्सकों को सीजर ने अपने यहां बुलाया और चिकित्सा-विद्यालयों की स्थापना की थी।

प्रथम शताब्दी के प्रारम्भ में पेरागमोन (Pergamon) नामक स्थान में प्रख्यात चिकित्स वैज्ञानिक गैलन (Galen) का जन्म हुआ। उन्होंने शरीर रचना की शिक्षा प्राप्त की और एशिया में दूर-दूर तक यात्रायें की। अन्ततः एलेक्जोन्ड्रिया (Alexandria) में आकर यन्त्रों का विकास किया। गैलेने मूलतः यथार्थ शरीर रचना के वैज्ञानिक थे, उन्होने स्तनपायी जीवों और मनुष्यों के अंदर तुलनात्मक शरीर-रचनाशास्त्र और क्रिया की व्याख्या की और प्रचलित मान्यताओं को वैज्ञानिक दृष्टि देकर उनका निरूपण किया। इसमें प्रमुख था हृृदय की रचना, मस्तिष्क और लीवर का कार्य एवं श्वसनर-क्रिया। गैलेन ने मात्र औषधियों का अविष्कार किया, वे निदान और रोग की चिकित्सा के बारे में बहुत कम लिख पाये।

मध्यकाल में चिकित्सा का विकास Evolution of Allopthy in Medieval Period

रोमसाम्राज्य के उत्थान और पतन के साथ-साथ आधुनिक चिकित्सा की परम्परा लम्बे समय तक चर्च और पादरियों के अधिकार में चली गयी। निराश्रित पीड़ित लोग भारी संख्या में आकर चर्च में पादरियों के यहाँ आश्रय पाते थे और रोगमुक्ति के लिये विश्राम करते थे। चिकित्सा क्रिया करने वाले संतों में प्रमुख थे-सेंट ल्यूक, सेंट कासमस और डामियन।

Inspirational stories in Hindi

सातवीं शताब्दी में इस्लामिक संस्कृति का उदय हुआ और तत्काल ही पूरे मध्य एशिया में ग्रीक एवं लैटिन चिकित्सा पुस्तकों का अनुवाद अरबी भाषा में होने लगा। इस काल में तेहरान, परसिया का निवासी रहजस (923 ई.) और फराज-बिन-सलीम की लिखी हुई किताब अल-हवाई प्रमुख हैं जो ग्रीक-अरब-चिकित्सा पद्धति का विश्वकोष मानी जाती है।

समूची चिकित्सा पद्धति का अध्ययन पुस्तकों पर आधारित रहा और प्रायोगिक शिक्षा की कोई व्यवस्था न बन पायी। इटली के बोलोना में 1156 ई. तक विश्वविद्यालय स्तर पर चिकित्सा-शिक्षा में वनस्पतिशास्त्र व भौतिक शास्त्र का समावेश नहीं हुआ था। फिर भी शरीर रचना और शरीर-क्रिया के अध्ययन के लिये शवच्छेदन प्रक्रिया आवश्यक थीा। इस प्रकार बोलोना में शल्य-शिक्षा व्यवस्थित ढंग से प्रारम्भ हुई। इस काल में सैलीसीटों के विलियम, सर्बिया के विशप थिओजोरिक और फ्लोरेस के थेडियस थे, जिन्होंने शल्य की तकनीकों का विकास किया जिसके अंतर्गत मवाद को बाहर निकालने का उल्लेख मिलता है। 13वीं शताब्दी के प्रारम्भ में बोलोना में फ्रांस से हेनरी-डी-माॅडे विक्ले का आगमन हुआ, जिसने बोलोना के चिकित्सा-पुस्तकों का अनुवाद फ्रेंच भाषा में किया। इस प्रकार फ्रांसीसी लोग रोम से शल्य चिकित्सा को लाने वाले पहले लोग थे।

14वीं शताब्दी से चिकित्सा-शास्त्र में वैज्ञानिक मूल्यों को पुनःस्थापित करने का सारा श्रेय उन वैज्ञानिकों को जाता है, जो वैज्ञानिक के साथ-साथ चित्रकार, साहित्यकार एवं विचारक थे। इस परम्परा में सबसे पहले लियोनाडौन्दाविचीं ने गैलेन की मान्यताओं को पुनः परखा और भिन्न-भिन्न जीवों पर इसके प्रयोग किये। उन्होंने फेफड़ों और हृदय की रक्तशिराओं और धमनियों का नामकरण किया। चित्रों में प्रदर्शित करके उन्होंने इस क्रिया को समझाया और हृदय के कपाटों की रचना का रहस्य खोला।

ब्रूसल्स के वेसोलियस (1514-1564 ई.) ने चिकित्सा और कला में सृजनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए मांसपेशियों की क्रिया, मस्तिष्क के अंदर की बनावट, तन्त्रिकाओं और रक्तवाहिनियों के अलग-अलग भागों को चित्र द्वारा बनाकर समझाने का प्रयास किया। इसी काल में यूरोप में प्लास्टिक सर्जरी विकसित हुई, जो कि हजार वर्ष पूर्व भारत में पूर्ण विकसित हो चुकी थीा। फिलिप बाम्बस्ट वाल हैनहीन (1493-1541 ई.) का जन्म स्विटजरलैण्ड में हुआ था। वे चिकित्सा शास्त्र के प्रोफेसर थे। उन्होंने ही सर्वप्रथम गंधक और शीरे का प्रयोग औषधि के रूप में किया। इस काल में ग्रीक साहित्य का प्रचुर मात्रा में लैटिन में अनुवाद हुआ और 16वीं सदी के प्रारम्भ (1518 ई.) में थाॅॅमस लिनाकरे द्वारा रायल काॅलेज आॅफ फिजिशियन की स्थापना लन्दन में की गयी।

रोगों के संक्रमण और संक्रमक रोगों का सर्वप्रथम विचार इसी काल में फ्रैकास्टोरो द्वारा प्रतिपादित किया गया। 1546 ई. में उन्होंने इन रोगों के बारे में तार्किक पक्ष प्रस्तुत किये और सूक्ष्म जीवों की सम्भावनाओं की व्याख्या की, जो कि एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के शरीर में स्पर्श या वायु द्वारा फैल सकते हैं। फ्रेंच वैज्ञानिक गिलाम-डी-बैलो (1538-1616 ई.) द्वारा हिप्पोक्रेटिक विचारधारा वाले संक्रामक रोगों की संक्रामकता की चेतना का इसी काल में उदय हुआ और खुजली वाले कीड़ों द्वारा टाइफस रोग के संक्रमण के बारे में भी तथ्य इकट्ठे किये गये। डी-बैलों ने इसी काल में काली खांची, गठिया एवं जोड़ों के दर्द का अन्तर बताया। रोगों के लक्षणें के आधार पर उसके अतिप्रभाव को वैज्ञानिक विवेचन सर्वप्रथम लन्दन में थाॅमस साइडैन हैम (1624-1689 ई.) ने की। अपने परीक्षण और विश्लेषण की कला के कारण ही उन्हें उस काल में ‘अंग्रेजों का हिप्पोक्रट्स’ कहा गया।

भौतिक और रसायनिक विज्ञान के आधार पर रोगों को समझने की प्रक्रिया में जियोरडानो, ब्रूना, कूपरनिकस, गिलबर्ट केपलर और गैलिलियो प्रमुख हैं, जिन्होंने जीवविज्ञान और भौतिकशास्त्र को एक सूत्र में पिरोकर एक सार्वभौमिक शोध की परम्परा का सूत्रपात किया। गैलिलिया के प्रकाश और लेन्स के समायोजन की कला ने माइक्रोस्कोप के अन्वेषण की नींव डाली। 1636 ई. में सैनटोहियों ने रक्तवाहिनियों को नाडी के रूप में परिभाषित करके उन्हें रेखांकित करने के यन्त्र का आविष्कार किया। गैलिलियो द्वारा अध्ययन किये गये पारे के गुण को सैक्टोरियस ने नैदानकीय थर्मामीटर में बदल कर तापक्रम को नापने का कार्य भी प्रारम्भ किया। श्वसन और इसके अन्तर्गत होने वाले ऊर्जा के क्षय का भी अध्ययन सैक्टोरियस ने अपने-आपको एक डिब्बे में बंद करके ऊर्जा के क्षरण और उत्पन्न होने की विधि का अध्ययन किया। इससे आधुनिक मेटाबाॅलिज्म की नींव पड़ी।

वर्तमान काल में चिकित्सा का विकास Evolution of Allopathy in Modern Times

17वीं शताब्दी में ही अंग्रेज वैज्ञानिक विलियम हार्वे (William Harvey) (1578-1647 ई.) ने हृदय पर व्याख्या की। माइक्रोस्कोप का प्रयोग भू्रणविज्ञान और जीवन के विकास में भी किया गया तथा रक्त के लाल और श्वेत रुधिककणिकाओं के बारे में भी ल्यूवेन हाॅक (Antonie van Leeuwenhoek), जिनको कि फाॅदर आॅफ माइक्रोबाइलोजी (Father of Microbiology) भी कहा जाता है, ने माइक्रोस्कोप के आधार पर चित्र बनाकर दर्शाया। प्रत्येक अंगों के सूक्ष्म विवेचन से वैज्ञानिकों की ढेर सारी भ्रान्तियां दूर की।
17वीं शताब्दी के मध्य में स्टीफेन होल्स (1677-1761 ई.) जब रक्त की श्यामता का अध्ययन करते समय घोड़े के गले की रक्तवाहिनी का अध्ययन कर रहे थे, तब रक्त के प्रवाह से चमत्कृत होकर उन्होंने रक्तचाप नापने का यंत्र बनाया।

सन् 1755 ई. में जर्मनी में सैमुअल फ्रेडरिख क्रिस्टियान हैनीमैन (Christian Friedrich Samuel Hahnemann) का जन्म हुआ। वह जब कुनैन के बारे में अध्ययन कर रहे थे तभी उन्हें एक नयी दृष्टि मिली। कुनैन खाने से जाड़ा देकर बुखार आता है और यही जड़ैया बुखार अच्छा भी करता है। उन्होने सिद्धान्त स्थापित किया कि बड़ी मात्रा में रोग जैसे स्थिति पैदा करने वाली औषधि, अल्पमात्रा मे उस रोग को दूर करती है। सन् 1811 ई. में उन्होने ‘आर्गेनन’ लिखा। उन्होंने अपनी पद्धति का नाम दिया ‘होमियोपैथी’। इस पद्धति में उसे यह भी स्थापित किया कि ‘औषधि की मात्रा घोल में ज्यों-ज्यों कम होती है, त्यों-त्यों उसकी रोगहारी शक्ति बढती जाती है।’ हैनिमैन ने अपनी पद्धति से अलग जो पद्धतियाँ थी, उन्हें ‘ऍलोपैथी Allopathy नाम दिया। हैनीमैन ने दो उपकार किये-एक तो उसने औषधि विज्ञान के गहन अध्ययन पर बल दिया, अतः उसे ‘फादर आफ माडर्न फार्मोकोलाॅॅजी’ कहा जाता है, दूसरे उस युग के चिकित्सक बड़ी मात्रा में कई औषधियाँ मिलाकर काढा तथा गोलियां खिलात थे। जो रोगी प्रकृति की सहायता से अच्छे भी हो सकते थे, वे इस बर्बर चिकित्सा के कारण मर जाते थे। सूक्ष्म मात्रा में औषधी देकर हैनीमैन ने इनकी रक्षा की।

Great scientist of India in Hindi

इस काल में पूरे यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति हो रही थी। संक्रामक रोगों को नियन्त्रित करने के नियम बने। 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में सूक्ष्मदर्शी यंत्रों की उपलब्धता ने सूक्ष्मजीवों एवं बैक्टीरिया तथा एक कोशीय जीव (प्रोटोजोआ) को स्थापित कर लिया। रूस के वैज्ञानिक पैवलाॅव (1848-1936 ई.) ने पेट के स्त्राव का सम्बन्ध दृष्टि, घ्राण एवं श्रवण से स्थापित किया, जो बाद में चलकर नोबल पुरस्कार से सम्मानित हुए।

इस समय यद्यपि शल्य-क्रिया की महत्ता चिकित्सा क्षेत्र में पर्याप्त फैल चुकी थी, परंतु अधिकांशतः शल्य-क्रिया पीड़ा एवं चीत्कार में होती थी। 1884 ई. में जेम्स कार्निक स्टुअर्ड हाल्स्टेड ने कोकेन को सुई के द्वारा नसों में लगा कर संज्ञा-शून्यता पैदा किया और 1874 ई. मे क्लोरल हाइड्रेट को नसों में लगाकर सूई द्वारा निश्चेतना पैदा करने की विधि निकाली गयी, जो कि 1903 ई. के बाद बिचुरटेस की खोज के बाद और प्रभावी हो गयी।

जोसेफ लिस्टर श्रवेमची स्पेजमत (1827-1912 ई.) ने यद्यपि अपने जीवन का प्रारम्भ एक शल्य चिकित्सक के रूप में किया, तथापि उनकी प्रसिद्धि एण्टीसेप्टिक की खोज के कारण हुई। उन्होंने विषाणुओं से मुक्ति पाने के लिये कार्बोलिक एसिड से घाव धोने की परम्परा शुरू की तथा चिकित्सा के पूर्व यंत्रों को इससे धोया जाने लगा। कार्बोलिक एसिड से अंगों में कई बार घाव हो जाते थे, अतः हाथों में रबड़ के दस्ताने पहनने की भी कला इसी काल में प्रचलित हुई।

एटिसोप्सिस, अंग को शुन्न करने की कला और विषाणुओं (बैक्टीरिया और वायरस) के ज्ञान ने आधुनिक चिकित्सा Allopathy को सहज बना दिया। इस तरह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान निरन्तर देश काल और समय के सापेक्ष प्रयोगों पर हर बार परखा जाता रहा और तब कहीं जाकर ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’ के उद्देश्य की पूर्ति कर पाया। यह सारे देशों की धरोहर है, समूची मानवता का इसमें बराबर योगदान है और सबने इसको अपने-अपने ज्ञान से सींचकर वैश्वीकरण के इस शीर्ष पर लाकर खड़ा कर दिया।


आपको यह लेख आधुनिक चिकित्सा पद्धति का विकासक्रम Evolution of Modern Medical Practices (Allopathy) in Hindi  कैसा लगा, कृप्या कमेंट बाक्स पर साझा करें। अगर आपके पास विषय से जुडी और कोई जानकारी है तो हमे kadamtaal@gmail.com पर मेल कर सकते है |

आपके पास यदि Hindi में कोई article, story, essay, poem है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Email Id है: kadamtaal@gmail.com. हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ प्रकाशित करेंगे.

Random Posts

  • milk medicine औषधि के रूप में दूध का महत्व

    औषधि के रूप में दूध का महत्व Importance of Milk as a Medicine in Hindi भारतवर्ष में गाय के दूध को औषधीय गुण (Medicine) आति प्राचीनकाल से जाना जाता है। चिकित्सकीय दृृष्टिकोण से दूध बहुत महत्वपूर्ण है। यह शरीर के लिये उच्च श्रेणी का खाद्य आहार है। दूध प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट्स, खनिज, वसा, इन्जाइम तथा आयरन से युक्त होता है। […]

  • हमारे वैज्ञानिकः अनिल कुमार गयेन (Anil Kumar Gain)

    हमारे वैज्ञानिकः अनिल कुमार गयेन Our Scientist Anil Kumar Gain in Hindi अनिल कुमार गयेन (Anil Kumar Gain) का जन्म 1 फरवरी 1919 में हुआ था। उनके माता-पिता लक्खी गांव, पूर्वी मिदनापुर के निवासी थे। उनके पिता जी का नाम जिबनकृष्ण और माताजी का नाम पंचमी देवी था। जब वे काफी छोटे थे तभी उनके पिताजी का निधन हो गया। परिवार […]

  • facts homeopathy treatment hindi होमियोपैथी चिकित्सा-प्रणाली के तथ्य

    होमियोपैथी चिकित्सा-प्रणाली के तथ्य Facts of Homeopathy Treatment in Hindi होमियोपैथी (homeopathy) का अविष्कारक जर्मन निवासी डाॅ. हैनीमैन (1755-1843 ई. ) थे। वे उस समय के प्रचलित ईलाज विधि में एम.डी. उपाधी प्राप्त चिकित्सक थे। उन्होंने अपने दस वर्षों के चिकित्सा अनुभव से महसूस किया कि वर्तमान पद्धति में रोग को तेज दवावों से दबा दिया जाता है, जो कि आगे […]

  • valentine day वेलेंटाइन डे का सच

    वेलेंटाइन डे का सच – True Story of Valentine Day in Hindi प्रेम की अभिव्यक्ति का इस दिवस का इतिहास वास्तव में romantic तो बिल्कुल भी नहीं है। यह कहानी है एक पुजारी की जिन्होंने प्रेम को जिन्दा रखने के लिए अपने प्राणों की आहूति दी। उनके संघर्ष और बलिदान की याद में ही यह दिवस (valentine day) मनाया जाता है। […]

2 thoughts on “आधुनिक चिकित्सा पद्धति (Allopathy) का विकासक्रम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*