रबिया बसरी: मुस्लिम महिलाओं की रोल माॅडल

रबिया बसरी: मुस्लिम महिलाओं की रोल माॅडल
Rabia Basri : A Role Model For Muslim Women in Hindi

रबिया अधिकतर मुस्लिम महिलाओं के लिए एक रोल माॅडल हैं। वह दुनिया के लाखों-करोड़ों लोगों के दिलों में रहती हैं। रबिया का जन्म 95 हिजरी में तुर्किस्तान के बसरा शहर में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता की चोथी संतान थी।

rabia basri in hindi

उनका जन्म काली अंधेरी रात को हुआ था। परिवार इतना गरीब था कि उनके पास दीये में डालने के लिए तेल तक नहीं था। उसकी बहनों ने पिता से कहा कि वे पड़ोंसियों से कुछ तेल उधार ले लें, परन्तु स्वाभीमानी पिता ने यह कह कर इंकार कर दिया कि वे अल्लाह के सिवाय किसी के आगे मदद के लिये नहीं हाथ नहीं पसारेंगे।

रबिया के माँ-बाप उन्हें बहुत छोटी उम्र में अनाथ छोड़कर चल बसे। कुछ समय बाद ही बसरा में जबरदस्त अकाल पड़ा। जब उनका कारवां कही जा रहा था, उस समय लुटेरों ने उस पर हमला कर दिया, इसमें रबिया अपनी बहनों से बिछड़ कर अकेली रह गयी। लुटेरों ने रबिया को बंधक बना दिया और उसे एक धनी आदमी को बेच दिया। वहाँ गुलाम रबिया पर तरह-तरह के अत्याचार होने लगे। रबिया कष्ट से पीड़ित होकर अकेले में चुपचाप अल्लाह Allah के सामने रो-रोकर अपना दुखड़ा सुनाया करती। इस संसार में एकमात्र अल्लाह के सिवाय उसे सान्त्वना देने वाला और कोई न था। गरीब, अनाथ का और कोई होता ही कौन है!

धनी मालिक के जुल्मों से पिण्ड छुड़ाने के उदे्श्य से एक दिन रबिया छिपकर भाग निकली, पर थोड़ी दूर जाने पर वह ठोकर खाकर गिर पड़ी। उसका दाहिना हाथ टूट गया। पहले ही दुःख कम नहीं था, अब यह नयी परेशानी आ गयी थी। रबिया उस नयी विपत्ति से विचलित हो कर रो पड़ी और अल्लाह Allah से उसने प्रार्थना की ‘ऐ मिहरबाँ मालिक! मैं बिना माँ-बाप की यतीम, गुलाम पैदाइश के वक्त से ही परेशानी में पड़ी हुई हूँ। दिन-रात यहाँ कैदी की तरह मरती-पचती किसी तरह जिंदगी बसर करती थी, पर अब हाथ भी टूट गया। क्या आप मुझ पर मेहरबान न होंगे? दीन-अनाथों के मालिक! आप मुझसे क्यों नाराज हैं?’

पुकार के बाद रबिया को अनुभूति हुई कि जैसे अल्लाह स्वयं कह रहे हैं-‘बेटी! तू चिन्ता मत कर। तेरे सारे संकट शीघ्र ही दूर हो जायेंगे।’ रबिया का आत्मविश्वास बढ़ गया। उसे अब आशा और हिम्मत हो गयी। वह प्रसन्नचित्त होकर मालिक के घर लौट आयी। पर अब उसका जीवन पूरी तरह जीवन पलट गया था। कामकाज करते समय भी उसका ध्यान अल्लाह Allah की तरफ ही रहने लगा। आये दिन वह वर्त रखने लगी। वह रातों जाग कर प्रार्थना किया किया करती।

एक दिन आधी रात को रबिया अपनी कोठरी में घुटने टेके बैठी करुणा स्वर में प्रार्थना कर रही थी। संयोग से उस समय उसका मालिक जाग गया। रबिया की फुसफाहट सुनकर वह कोठरी के दरवाजे पर आया। पर्दे की ओट से उसने देखा कि रबिया बैठी हुई भीगी आँखों से प्रार्थना कर रही है। उसने रबिया के स्वर सुने-‘मेरे मालिक! अब मैं सिर्फ, आपका ही हुक्म उठाना चाहती हूँ। लेकिन क्या करूँ, जितना चाहती हूँ उतना हो नहीं पाता। मैं खरीदी हुई गुलाम हूँ। मुझे मेरी गुलामी से फुरसत मिलती ही कहाँ है?’

जब दीन-दुनिया के सच्चे मालिक ने रबिया की प्रार्थना सुन ली तो उसके उस मालिक का भी मन, जिसकी वह गुलाम थी, उसी क्षण पलट गया। उसने सोचा किया ऐसी पवित्र महिला को गुलामी में रखकर मैंने बड़ा पाप किया है। इसकी सेवा तो मुझे ही करनी चाहिए। उसने रबिया से प्रार्थना करते हुए कहा-‘मैं तुम्हें अब तब पहचान नहीं पाया था। अब तुम्हें मेरी सेवा नहीं करनी पड़ेगी। तुम सुख पूर्वक मेरे घर में रहें। मैं ही अब तुम्हारी सेवा करूंगा।’

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रबिया ने कहा-‘मालिक! मैं आपके द्वारा सेवा कराना नहीं चाहती। आपने इतने दिनों तक मुझे घर में रखकर खाने को दिया, यही मुझ पर आपका बहुत बड़ा उपकार है। अब आप दया करके मुझे आजाद कर दें।’ मालिक ने रबिया की बात मान ली।

रबिया रेगिस्तान की तरफ चली गयी। रबिया ने गुलामी से छूटकर अपना सारा समय अल्लाह के चिन्तन में समर्पित कर दिया। संसारिकता की तरफ तो उसका मन बिल्कुल भी नहीं रह गया था। रबिया के गुरू हुसैन बसरी थे। कुछ समय बाद रबिया ने हज यात्रा की। वहां उनकी मुलाकात सूफी संत इब्राहिम अधम (Ibrahim Adham) से हुई थी जो कि हज यात्रा पर ही थे।

रबिया ने अपने जीवन पर कुछ भी लिखित में नहीं छोड़ा। उनके सुरूआती जीवनकाल के बारे में फरीद-अल-दीन अतर (Farid Al-Din Attar) ने विवरण दिया है। अब रबिया की प्रसिद्ध दूर-दूर तक फैल चुकी थी। उनके पास विवाह के बहुत सारे प्रस्ताव आने लगे थे, यहां तक कि बसरा के अमीर ने भी उन्हें प्रस्ताव दिया। रबिया ने सभी अनुरोध ठुकरा दिया क्योंकि अब उनके पास अल्लाह के सिवाय किसी के लिए कोई समय नहीं था।

एक बार रबिया उदास बैठी हुई थी। उनसे मिलने आने वाले लोगों में से किसी ने उनकी उदासी का कारण पूछा। रबिया ने जवाब दिया-‘आज सबेरे मेरा मन स्वर्ग की ओर चला गया था, इसके लिए मेरी आत्मा ने मुझे बहुत धिक्कारा है। मैं इसी कारण उदास हूँ कि मेरा मन अल्लाह को छोड़ कर दूसरी तरह क्यों गया।’

एक समय रबिया बहुत बीमार थी। सूफियान नामक एक फकीर उनसे मिलने गया। रबिया की बीमारी की हालत देखकर सूफियान को बड़ा दुःख हुआ, परन्तु वह संकोच के कारण कुछ भी नहीं कह सका। रबिया उसकी मनोस्थिति समझ गयी, उसने कहा-‘भाई! तुम कुछ कहना चाहते हो तो कहो।’

सूफियान ने कहा-‘आप अल्लाह से प्रार्थना क्यों नहीं करती, वे आपकी बीमारी को जरूर मिटा देंगे।’
रबिया ने मुस्कुराते हुए कहा-‘सूफियान! क्या तुम नहीं जानते हो, कोई भी कार्य उसकी इच्छा और इशारे से ही होता है। क्या इस बीमारी में मेरे अल्लाह का हाथ नहीं है। यह भी तो उन्हीं का आदेश है, ऐसा क्यों नहीं समझते?’

सूफियान ने कहा-‘हाँ, उसकी इच्छा बिना तो क्या होता है?’

‘फिर भी तुम मुझसे मेरी बीमारी के लिए प्रार्थना करने के लिए कह रहे हो! क्या उनकी इच्छा के बिना कार्य करना मेरे लिए उचित रहेगा।’ ऐसा पूर्ण निर्भरता और समर्पण का भाव था रबिया की बातों में।

एक बार हुसैन बसरी ने रबिया से पूछा-‘आपने ऐसी ऊँची स्थिति किस प्रकार प्राप्त की?’

रबिया ने जवाब दिया-‘जो कुछ मिला था, वह सब खोकर ही उसे पाया है।’

रबिया सबसे प्रेम करती थी। सबके प्रति उनके मन में दया का बर्ताव था। एक दिन किसी ने पूछा कि वे पापी लोगों को तो शत्रु समझती हैं न?

रबिया का जवाब था-‘अल्लाह के प्रेम के कारण मुझे न किसी से शत्रुता करनी पड़ती है और न किसी से लड़ना पडता है। अब मेरा कोई शत्रु रहा ही नहीं।’

एक दिन कुछ लोग रबिया के पास गये। रबिया ने उनमें से एक से पूछा-‘भाई! तुम ईश्वर की प्रार्थना किसलिए करते हो।’ उस व्यक्ति ने कहा-‘स्वर्ग अत्यन्त ही रमणीय स्थान है, वहाँ भोग और असीम सुख है, उसी सुख को पाने के लिए मैं प्रार्थना करता हूँ।’

रबिया ने कहा-‘बेसमझ लोग ही भय या लोभ के कारण प्रार्थना करते हैं। न करने से तो यह अच्छा ही है। परन्तु मान लो स्वर्ग या नरक दोनों ही न होते तो क्या तुम लोग प्रार्थना नहीं करते? सच्ची प्रार्थना परलोक की चाहत या प्राप्ति के लिए नहीं होती, यह तो स्वार्थ होता है।’ निष्काम भक्ति का ऐसा आदर्श रूप थी रबिया।

एक बार एक धनी व्यक्ति ने रबिया को बहुत फटे-पुराने चिथड़े पहने हुए देखकर कहा-‘यदि आपका इशारा हो तो आपकी इस दरिद्रता को दूर करने के लिए यह सेवक तैयार है।’

रबिया ने कहा-‘संसारिक गरीबी के लिए किसी से कुछ भी मांगने पर मुझे बड़ी लज्जा होती है। जब यह सारे जगत में अल्लाह का ही राज्य है, तब उसे छोड़ कर अन्य किसी से क्यों मांगूं? मुझे जरूरत होगी तो मालिक के हाथ से आज ही ले लूंगी।’

रबिया का मन सदा-सर्वदा अल्लाह Allah की उपासना में लगा रहता था। वह दिन-रात उनके चिन्तन में अपना समय व्यतित करती थी। एक बार रबिया ने अल्लाह से प्रार्थना की-‘स्वामी! तू ही मेरा सब कुछ है, मैं आपके सिवाय और कुछ नहीं चाहती। यदि मैं नरक के डर से आपकी प्रार्थना करती हूँ तो मुझे नरक की आग में भस्म कर दें। यदि मैं स्वर्ग के लोभ सेवा करती हूँ तो स्वर्ग के द्वार मेरे लिए सदा के लिए बंद कर दें।’

रबिया का शेष जीवन बहुत ही ऊँची अवस्था में बीता। हिजरी 135 में रबिया ने अंतिम सांस ली। उन्होनें ने निष्काम भक्ति की एक अलग ही छाप दुनिया पर छोड़ी।

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