भारतीय चरित्र – Mera Bharat Mahan

भारतीय चरित्र – Mera Bharat Mahan

प्राचीन भारतीय और विदेशी इतिहासकारों और लेखकों ने भारत की महानता (Bharat ki Mahanta) और भारतीय चरित्र (Indian Character) के विषय में कंठ खोलकर प्रशंसा की है। वे कहते हैं कि भारतीयों में ईमानदारी, नैतिक चरित्रा, मिलनसारिता और दयालुता अतुलनीय है। भारतीय चरित्र के गौरव तथा महत्व के विषय में असंख्य उदाहरणों में से बहुत ही थोड़े का नीचे उल्लेख किया है जिसे विदेशियों ने विस्मयपूर्ण एवं प्रशंसक नेत्रों से प्रत्यक्ष किया है।

लगभग 2500 वर्ष पहले ग्रीक का इतिहासकार मेगस्थनीज (Megasthenes) भारत आया था। उसने भारतीयों की सत्यता के बारे में आश्चर्यचकित करने वाली बातें लिखी हैं। वह लिखता है कि

‘यहाँ के लोग ताला-कुंजी से अपरिचित थे (अर्थात लोग अपने घरों में ताला नहीं लगाते थे), यद्यपि उनके ज्ञान, वैभव अद्भुत गौरवशाली थे। भारतीय-समाज के छोटे वर्ग में भी सर्वत्र ईमानदारी भरी पड़ी थी।’

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सातवीं शताब्दी के प्रसिद्ध चीनी यात्री हेव्नसांग (Xuanzang) का भी कथन है कि

‘यदि किसी व्यक्ति के दुःख की जानकारी हिन्दुओं को होती है तो वे अपने-आपको भूलकर उसकी सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं।’

लगभग 500 वर्ष पहले पुर्तगाली भारत आये थे। वे क्रूरता तथा अमानवीय दुष्कर्मो के लिए कुख्यात थे। उन्होंने यद्यपि अपने इतिहास में तप के विरुद्ध अनेक बातें लिखी हैं, फिर भी यह लिखा है कि

‘हिन्दू धर्म का शिष्ट प्रभाव केवल उच्च वर्गों में ही नहीं था, बल्कि शास्त्रों में प्रतिपादित युद्ध-परम्परा को छोटी जातियाँ भी मानती थी। रात्रि में अथवा छिपकर युद्ध करने की प्रथा से वे अनभिज्ञ थे। बिना पूर्व सूचना के युद्ध नहीं होता था। हिंदुओं में अपने शत्रुओं के प्रति तनिक भी ईष्र्या नहीं थी।’

पुर्तगाली लेखकों ने सबसे निम्न दर्जे के सैनिकों की भी प्रतिज्ञा की प्रशंसा करते हुए लिखा है-

‘वे अपनी बातों का दिल से पालन करते थे। आश्चर्य की बात थी कि जब युद्ध-कैदियों को उनके वचन पर छः माह के लिये मुक्त किया जाता था तो वे स्वेच्छापूर्वक कुछ पूर्व ही लौट आते थे। अनादर को मृत्यु से बढ़कर बुरा समझा जाता था।’

अकबर के दरबार का प्रसिद्ध इतिहासकार अब्दुल फजल (Abu’l al-Fazl, 1551-1602) का कथन है कि

‘हिंदू सुशील तथा मिलनसार एवं सभी के प्रति दयालु होते हैं। संसार के किसी व्यक्ति से उनका वैर नहीं होता है।’

दुर्गादास राठौड (1638-1718) मुगलसम्राट औरंगजेब का कट्टर शत्रु था। परन्तु जब औरंगजेब की पौत्री दुर्गादास के हाथों पड़ी तो उसने बड़े श्रम से अजमेर से एक मुस्लिम अध्यापिका को बुलाया और औरंगजेब की पौत्री को उसी के संरक्षण में रखा, जिससे कि उसका ठीक से मुस्लिम संस्कारों के साथ पालन-पोषण हो सके।

कैफी खान (Khafi Khan, 1663-1731) नामक इतिहासकार ने लिखा है कि

‘शिवाजी ने कभी मस्जिद और कुरान को हानि नहीं पहुँचायी। उन्हें यदि कुरान की प्रति मिलती थी तो वे तुरंत आदरपूर्वक किसी मुसलमान को दे देते थे।’

सर चाल्र्स फौरबिस एम.बी. (Sir Charles Forbes, 1774–1849) ने दो दशक भारत में निवास करने के बाद भारतीयों के चरित्र के बारे में निम्न पंक्तियों में अंकित किया है-

‘भारत में 22 वर्षों तक ठहरने के तथा यहां इंग्लैंड में 17 वर्षों तक रहने के बाद अपने देशवासियों को मैं जितना ही देखता हूँ उतना ही भारतवासियों को अधिक पसंद करता हूँ।’

सर जार्ज बर्डऊड (Sir George Birdwood, 1832-1917) लिखते हैं-

‘भारतवर्ष और इसके पवित्र लोग अपने बाह्या एवं आन्तरिक पवित्र चरित्रों से अपने स्वाभावित गुणों को सरलतया से प्रतिबिम्बित करते हैं-विशेषकर महाराष्ट्र राज्य की पवित्र-चरित्र नारियाँ, शुद्ध-चरित्र पुत्रियाँ, पतिव्रता पत्नियाँ तथा सच्ची माताएँ। शिवाजी के सभी सैनिक तथा शिविर स्त्री-सम्बन्धी सभी दोषों से मुक्त थे। जीते हुए प्रदेशों की स्त्रियों को वे छूते तक न थे।’

विख्यात लेखक जार्ज बर्नार्ड शा (George Bernard Shaw, 1856-1950) ने भी सन् 1933 में भारत-दर्शन करने के बाद भारतीय चरित्र तथा परम्परा की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करते हुए लिखा है-

‘भारतीयों का चरित्र उनकी मुखाकृति से प्रकट होता है, परन्तु हम लोगों के चेहरे पर नकाब है। हिन्दुत्व तथा हिन्दू की सत्यनिष्ठा उनके चेहरों से झलकती है और अंग्रेजों के सतत मिथ्याचरण से भगवान की रेखाएं इसके चेहरे से मिट गयी हैं तथा नकाब चढ गया है।’

सुप्रसिद्ध अंगे्रज उपन्यासकार जेफरी फरनौल (Jeffery Farnol, 1878-1952) का कथन है कि

‘भारत ने मुझे विस्मित कर दिया है। मेरी कल्पना से भी यह अधिक सुन्दर है। मैं इस देश के निवासियों के-विशेषकर ग्रामीणों के जीवन पर मुग्ध हूँ। यहाँ कोई विदेशी थोड़े समय रहकर इन्हें ठीक से नहीं समझ सकता।’

कलिगंपोंग के विख्यात डाॅ. ग्राहम (Dr. Graham, 1861-1942) ने विशेषकर फिजी के भारतीय प्रवास के प्रभाव का उल्लेख किया है। वे कहते हैं-

‘भारतीयों ने उस द्वीप के निवासियों की अशिष्टता-जंगलीपन को दूर करने में खूब हाथ बँटाया है और उन्हें अधिक सुन्दर जीवन का नियम सिखलाया है। अतः सबसे अधिक पक्षपाती व्यक्ति भी हिन्दुत्व की प्रशंसा करने से अपने को नहीं रोक सकता है।’

भारत के वायसराय लार्ड विलिंगटन (Lord Willingdon) को भी सन् 1938 ई. में विवश होकर कहना पड़ा था-

‘भारतीय जाति विश्व में सबसे सुसभ्य है, जो कभी भी दया और सहानुभूति को नहीं भूलती। वह पृथ्वी पर सबसे अधिक कृतज्ञ जाति है।’

20 सितम्बर 1948 को भागलपुर के एक मुस्लिम सभा को सम्बोधित करते हुए बिहार के विकासमंत्री डाॅ. सैयद मोहम्मद ने कहा था-

‘पृथ्वी पर हिन्दू सबसे अधिक स्नेह तथा प्रेम करने वाले होते हैं। वे उसे भी प्यार करते हैं जो उन्हें प्यार नहीं करता है। ऐसा कोई दूसरा मानव-समुदाय नहीं कर सका है।

सच्चरित्रता की धारा अनादिकाल से भारतीयों की नस-नस में पीढ़ी-दर-पीढ़ी से बहती रही है। यह चरित्र सत्य की चट्टान पर स्थिर है। यही सबसे बडा गुण रहा है, जिसने इस दुनिया में भारतीयों को सर्वोत्तम बनाया है। चरित्र निर्माण की चुनौती अब हमारे समक्ष है। इसके अभाव में व्यक्ति और समाज दोनों ही कष्ट में हैं।

हम लोग सत्यता से दूर होंगे यदि यह न कहें कि हिंदू सत्यरूपी वृक्ष पर विदेशियों के संसर्ग ने कुल्हाड़ी -प्रहार का कार्य किया है एवं जिसने भारतीय चरित्र की पवित्रता को दूषित तथा धूमिल किया है।

आजकल हम क्या कर रहें हैं। क्या हम अब अपनी संस्कृति और स्वभाव को भूलने नहीं लगे हैं? क्रोध हमारे स्वभाव का हिस्सा बनने लगा है। चोरी, डकेती, बलात्कार आदि घटनायें आये दिन सुनने को मिलती हैं।

आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विकास की गति निःसंदेह काफी तेज है; किंतु चारित्रिक दृष्टि से अब हमारा समाज निर्बल होता जा रहा है। यह चिन्ता की बात है। हमें अपना पुराना गौरव वापिस पाने के लिए तन-मन से प्रयासरत होना पड़ेगा। एक प्रसिद्ध कहावत है कि बुद्धि से विचार, विचार से क्रिया, क्रिया से प्रवृत्ति (आदतें) एवं प्रवत्ति से गुण एवं गुण से चरित्र का निर्माण होता है तथा चरित्र से ही भाग्य का निर्माण होता है। हम सब अपने चरित्र के निर्माता हैं इसलिए अपने भाग्य के भी निर्माता हैं।

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