पाश्चात्य विद्वानों पर उपनिषदों का प्रभाव (Impact of Upanishads on Western scholars)

Impact of Upanishads on Western scholars in Hindi

उपनिषदों के सिद्धान्त इतने गूढ और सार्वभौम हैं कि उनका विद्वानों पर, चाहे वे किसी भी देश के निवासी और किसी भी धर्म के अनुयायी क्यों न हों, गहरा प्रभाव पड़ता है। विदेशी विद्वान उपनिषदों में बहुत से ऐसे प्रश्नों का समाधान पाकर चकित रह गये हैं, जिनका उत्तर अन्य धर्मों तथा दर्शनों में या तो उन्हें मिला ही न था और यदि मिला भी तो बहुत असंतोषजनक रूप में। उदाहरण के लिए-ब्रह्मा अथवा ईश्वर का स्वkadamtaalरूप क्या है? जिवात्मा किस तत्व से बना है? संसार की रचना किस तत्व से हुई है? जीव की स्वर्ग या नरक में स्थिति कितने काल तक रहती है? उसके बाद क्या होता है? देह रचना के पूर्व भी देह का अस्तित्व था क्या? कुछ लोग जन्म से सुखी और कुछ लोग जन्म से दुःखी क्यों होते हैं? उपनिषदों में इनका इतना पूर्ण वैज्ञानिक एवं संतोषप्रद उत्तर हैं कि जिसका प्रत्येक जिज्ञासु के मन पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता।

वेदान्त दर्शन की महिमा से मुग्ध होने वाले विदेशी विद्वानों में सबसे पहले थे-अरब के विद्वान अलबेरूनी। ये ग्यारहवीं शताब्दी में भारत आये थे। यहां आकर इन्होंने संस्कृत भाषा का अध्ययन किया और उपनिषदों की सार-स्वरूपा गीता से वह बहुत प्रभावित हुए। यह ज्ञात नहीं कि इन्होंने उपनिषदों का अध्ययन किया था या नहीं पर गीता की जो प्रशंसा इन्होंने की है, उसे उपनिषदों की ही तो प्रशंसा समझनी चाहिए।

सम्राट शाहजहाँ का बड़ा बेटा दाराशिकोह अपनी धर्मसम्बन्धी उदारता के लिए भारत के इतिहास में प्रसिद्ध है। उन्होंने हिंदु तथा मुसलमान धर्म के समन्वय के लिए विशेष चेष्ठा की थी और इसलिये उन्होंने फारसी में ‘मज़मा-उल-बहरैन’ नामक एक ग्रन्थ का निर्माण किया था। सन् 1640 ई. में, जब दारा कश्मीर में थे तब उन्हें सर्वप्रथम उपनिषदों की महिमा का पता लगा। उन्होनें काशी से कुछ पण्डितों को बुलाया और उनकी सहायता से पचास उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया। 1657 ई. में यह अनुवाद पूरा हुआ। इसके प्रायः तीन वर्ष के बाद सन् 1649 ई. में औरंगजेब के द्वारा दाराशिकोह मारे गये।

इसकी फ्रांसीसी अनुवाद की एक प्रति जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान शोपेनहर के हाथ लगी। समस्त विदेशी विद्वानों में इन्होंने इन ग्रन्थों की सबसे अधिक प्रशंसा की है। वे कहते हैं-

‘सम्पूर्ण विश्व में उपनिषदों के समान जीवन को ऊँचा उठाने वाला कोई दूसरा अध्ययन का विषय नहीं है। उनसे मेरे जीवन में शान्ति मिलती है। उन्हीं से मुझे मृत्यु में भी शान्ति मिलेगी।’ “In the whole world, there is no study so elevating as that of the Upanisads. It has been the solace of my life. It will be the solace of my death.”

शोपेनहर के इन शब्दों पर मैक्समूलर ने कहा है-

‘शोपेनहर के इन शब्दों के लिए यदि किसी समर्थन की आवश्यकता हो तो अपने जीवन भर के अध्ययन के आधार पर मैं उनका प्रसन्नतापूर्वक समर्थन करूंगा।’ “If these word of Schopenhauer required any confirmation I would willingly give it as a result of my life-long study.”

उपनिषदों में पाये जाने वाले अदभुत सिद्धान्तों का उल्लेख करते हुए शोपेनहर ने फिर कहा-

‘वे सिद्वान्त ऐसे हैं जो एक प्रकार से सुपरह्यूमन ही हैं। ये जिनके मस्तिष्कक की उपज हैं, उन्हें निरा मनुष्य कहना कठिन है।’ “Almost superhuman conceptions whose originators can hardly be said to be mere men.”

पाल डायसन (Paul Deussen) नामक जर्मनी के एक अन्य विद्वान ने उपनिषदों का मूल संस्कृत में अध्ययन करके उपनिषद्-दर्शन (Philosophy of the Upanishads) नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक का निर्माण किया। उन्होंने लिखा है कि

उपनिषदों के भीतर, जो दार्शनिक कल्पना है, वह भारत में तो अद्वितीय है ही, सम्भवतः सम्पूर्ण विश्व में अतुलनीय है। “Philosophical conceptions unequalled in India, or perhaps anywhere else in the world.”

डायसन ने यह भी कहा कि

कांट और शोपेनहर के विचारों की उपनिषदों ने बहुत पहले ही कल्पना कर ली थी तथा सनातन दार्शनिक सत्य की अभिव्यंजना मुक्तिदायिनी आत्मविद्या के सिद्धान्तों से बढ़कर निश्चित और प्रभावपूर्ण रूप से कदाचित ही कही हुई हो। “Eternal Philosophical truth has seldom found more decisive and striking expression than in the doctrine of the emancipating knowledge of the Atma.” (Philosophy of Upanisads)

मैक्डानेल ने लिखा है-

‘मानवीय चिन्तन के इतिहास में पहले-पहल बृहदारण्यक उपनिषद् में ही ब्रह्मा अथवा पूर्ण तत्व को ग्रहण करके उसकी यथार्थ व्यंजना हुई है।’ “Brahman or Absolute is grasped and definitely expressed for the first time in the history of human though in the Brhadaranyaka Upanisad.”

फ्रांसीसी दार्शनिक विक्टर कजिन्स् लिखते हैं-

जब हम पूर्व की और उनमे भी भारतीय साहित्यिक एवं दार्शनिक महान कृतियों का अवलोकन करते हैं, तब हमें ऐसे अनेक गम्भीर सत्यों का पता चलता है, जिनकी उन निर्ष्कषों से तुलना करने पर, जहाँ पहुंचकर यूरोपीय प्रतिभा कभी-कभी रूक गयी है, हमें पूर्व के तत्व ज्ञान के आगे घुटना टेक देना पड़ता है। “When we read the poetical and philosophical monuments of the East, above all those of India, we discover there many truths so profound and which make such a contrast with the results at which the European genius has sometimes stopped that we are constrained to bend the knee before the Philosophy of the East.”

जर्मनी के एक दूसरे लेखक और विद्वान फ्रेडरिक श्लेगेल लिखते हैं-

‘पूर्वीय आदर्शवाद के प्रचुर प्रकाशपुज की तुलना में यूरोपवासियों का उच्चतम तत्वज्ञान ऐसा ही लगता है, जैसे दोपहर के सूर्य के तेज प्रताप की पूर्ण प्रखरता में टिमटिमाती हुई अनलशिखा की कोई आदि किरण, जिसकी अस्थिर और निस्तेज ज्योति ऐसी हो रही हो मानो अब बुझी कि तब। “Even the loftiest philosophy of the Europeans appears in comparison with the abundant light of oriental idealism like a feeble Promethean spark in the full flood of the heavenly glory of the noonday sun-faltering and feeble and even ready to be extinguished.”

पाश्चत्य विद्वानों द्वारा उपनिषदों की प्रशंसा के विषय में इस एक बात को समझ लेना अति आवश्यक है कि य़द्यपि उन्होंने आत्मा की सार्वभौम सत्ता आदि सत्य-सिद्धान्तों की सरहाना की है पर कुछ विद्वानों ने उपनिषदों के कई अंशों को समझ नहीं पाया है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि वेदों के ज्ञान के लिए केवल बुद्धि और विद्ववत्ता की ही आवश्यकता नहीं है, वरन आध्यात्मिक साधना एवं वेदाध्ययन की परम्परा भी उतनी ही अपेक्षा है।


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