डर (Fear)

डर (fear) एक ऐसी प्रक्रिया है जो कि मनुष्य के मस्तिष्क में बचपन से हावी रहती है। बचपन में शिशुकाल से ही, किसी आहट से, शोर से बच्चे डर जाते हैं। किसी अनजान व्यक्ति को देखने पर भी डर (afraid) जाते हैं। जैसे-जैसे बच्चा स्कूल जाने लगता है तो वहाँ भी डर उसका पीछा नहीं छोड़ता। वहां टीचर का डर, घर में माँ व पिता का, बड़े भाई की मार का डर (fear) बना ही रहता है। शादी लायक होने पर, लड़की हो तो पति एवं ससुराल का डर (fear) और लड़का हो तो उसे पत्नी का डर (fear)।

क्या ऐसा सम्भव है कि किसी को किसी से भी डर (fear) न लगता हो तो क्या मौत से भी डर नहीं लगता है?

डर (fear) को समझने में कोई बुराई नहीं है। डर (fear) हमारे जीवन में प्रारम्भ से अन्त तक साथ-साथ चलता है। पत्नी को पति का साथ और पति को पत्नी का साथ पसन्द है परन्तु देर तक सोते रहे तो बहु को सास का डर (fear) एवं सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन का डर (fear)। साथ-साथ मकान है, परन्तु न चाहते हुए भी, पड़ोसी से सम्बन्ध बना के रखने पड़ते हैं क्योंकि कहीं पड़ोसी बुरा न मान जाए इस बात का डर (fear)।

भारत में बच्चों के मन में शिशु काल से ही डर भर दिया जाता है। “ऐसे मत करना बोबी” माँ ने शरारत से रोकने के लिए दो साल के बच्चे को डराना चाहा “नहीं तो भूत आ जाएगा।” “बन्दर आ जाएगा” या “शेर आ जाएगा।” ऐसे न जाने कितने वाक्य हैं जो हम अपने परिवार में बच्चे को गलत काम से रोकने के लिए और बच्चे को डराने में प्रयोग मे लाते हैं।

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अस्वस्थ होने पर डाक्टर साहब के पास गए, उन्होंने टेस्ट करवाये। अरे यह क्या आपको तो कैंसर है, टीबी है, शुगर है और न जाने कितनी बीमारियों के नाम आपको बताये गए और आप डर गए, अब क्या होगा? फिर डर आ गया। यदि आपको पैसों की दिक्कत रहती है तो अच्छा इलाज भी सम्भव नहीं है। आपकी परेशानी है पैसा और नहीं है तो मर जाने का डर। परिवार कौन सम्भालेगा इस बात का डर।

आधुनिकीकरण, शिक्षा का विकास, लडकियां बाहर जाती हैं जब तक घर वापिस न आ जायें, उनके सुरक्षित घर पहुंचने का डर। विवाह योग्य हो गई है तो विवाह सही घर में होगा या नहीं इस बात का डर और अगर हो गया है दहेज के लालची लोगां का डर। लड़की अपनी जिन्दगी ठीक-ठाक जी पायेगी या नहीं इस बात का डर।

डर के बदलते रूप The changing face of fear

हम देखते हैं कि अब डर के रूप बदलने लगे हैं। कम नम्बर आने पर बच्चे, समाज एवं माता-पिता के डर से आत्महत्या करने लगे हैं। अधिक पढ़ाई के कारण लड़कियों को माता-पिता की कोई चिन्ता नहीं है उन्हें बस अपने हिसाब से शादी करनी है, अब माता-पिता का डर नहीं रहा है।

मैं समझता हूँ जैसे-जैसे डर कम होता जा रहा है समाज में, मानव के बनाये हुए कानून, माप-दण्ड भी फेल होते जा रहे हैं। डर के कम होने से ईश्वर का खौफ भी नहीं रहा है और समाज में बुराईयों की मात्रा बढ़ती जा रही है। क्या आपको नहीं लगता कि डर है तो समाज नियन्त्रिात है। डर अगर खत्म हो जाये तो मानव अपने सभी नियन्त्राण खो सकता है।

बढ़ता हुआ आंतकवाद और डरता हुआ कानून उन चन्द लोगों के अधीन होता जा रहा है जो किसी से डरते नहीं है। उन्हें ऐसे ही ढाला जा रहा है। अच्छी सोच के लोग कम होते जा रहे हैं। आज जो तस्वीर समाज के सामने आ रही है वो है एक डरावना माहौल।

वो डर जिसने हमें जोड़ रखा है ईश्वर की आस्था से, समाज से, रिश्तों से, कानून के बन्धनों से, जैसे-जैसे वो डर कम होता जा रहा है, समाज में द्वेष रूपी विषैला धुआं फैलता जा रहा है। इसके साथ ईश्वर का दिया हुआ प्यार रूपी अमृत हमारे जीवन से लुप्त होने लगा है। हमारी वाणी की मधुरता कम होने लगी है। माथे पर तनाव की रेखायें बनने लगी हैं।

मैं समझता हूँ यदि आप मेरी बातों से सहमत हो तो इस बात से भी सहमत होंगे कि हमारी जरूरतों में बढ़ती हुई विलासिता ने हमारे संस्कारों को मृत कर दिया है। मनुष्य की जरूरतें उसके जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है परन्तु जरूरतों में बढ़ती विलासिता इतनी अधिक हो गई है कि हमंे अपने रोज़-मर्रा की जिन्दगी के दैनिक कार्यों के समय में इतनी भाग-दौड़ करनी पड़ रही है जो कि हमारी शारीरिक क्षमता से भी ज्यादा है जिससे हमारे दिमाग को उतना सोचने का, मनन करने का वक्त ही नहीं मिलता। एक ऐसी मशनी जिन्दगी, जिसमें सुबह से रात तक मात्रा अपनी जरूरतें ही दिखाई देती हैं। शहरों में इसका असर ज्यादा हुआ है, गांवों की अपेक्षा। पर जैसे-जैसे गांव शहरीकृत होते जा रहे हैं यह बीमारी वहां भी फैल रही है।

अपने अन्दर के डर को संजोयें Cherish your inner fear

आपके पास अभी भी समय है। आप सचेत हो जायें और अपने अन्दर एक डर को संजोये जो आपको मन की शान्ति देता है। वह वो डर है जो हमें नैतिकता से, कानून के दायरे में, समाज की मर्यादाओं में रहकर जीना सिखाता है। इस डर को अपना कर हम समाज एवं राष्ट्र की रक्षा कर सकते हैं और शकून से जी सकते हैं।

अपनी जरूरतों के विकराल रूप पर अंकुश लगायें और एक आस्था के डर (fear of faith) को मन में बिठायें जो सही रास्ता दिखाये। वो डर (fear) जो आस्था रूपी है उसके बल को हमारे अन्दर की सोयी हुई नैतिकता जागेगी। अत्याचार के खिलाफ बोलने की आपकी आवाज जो पुनः गुंजेगी। अपराध जगत का नाश होने लगेगा। आप अपने दायरे में रहकर भी विस्तृत हो जायेंगे। आपकी नैतिकता आपकी शक्ति को प्रबल कर देगी औरे ऐसे ही वो डर (fear) उस अनैतिक, अत्याचारी लोगों में भी जागेगा और वे भी अपना रास्ता बदनले पर मजबूर होंगे। यह सब तब ही होगा जब हमारा आस्था रूपी डर (fear of faith) पुनः जागृत होगा।

कब आयेगा वह समय जब हम लालबत्ती के चैराहे पर निडर निश्चिंत वाहन में बैठे या चैराहे पर खड़े अपनी हरी बत्ती होने का इन्तजार कर रहे होंगे? जब कानून रूपी डर (fear of law) हमारी अन्तःकरण की आत्मा बन चुका होगा तब भारत में स्वर्णीम युग पुनः प्रारम्भ होगा।

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    मैं कोई लेखक नहीं हूँ, बस अपने मन के भावों को व्यक्त करने का प्रयास करता हूँ। सेवानिवृत एक वरिष्ठ नागरिक हूँ। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. की है। सामाजिक कार्यों में बचपन से मेरी रूचि है। मुझे हिन्दी में लेख एवं कवितायें लिखने में आनन्द आता है। मैंने जो कुछ पिछले 35 वर्षों में लिखा वह केवल अपने आस-पास के वातावरण के ऊपर ही लिखा है।

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