संस्कार

संस्कार Our Traditional Ethics in Hindi

हमारे जीवन में हजारों पुराने व नये संस्कार (Traditional Ethics) होते हैं। जो बनते और समाप्त होते हैं। हर व्यक्ति के अपने-अपने संस्कार होते हैं। कुछ संस्कार अन्तिम समय तक हमारे साथ ही चलते हैं और कुछ अगले जन्म तक साथ आत्मा के साथ जाते हैं।

संस्कारों की जीवन में भूमिका

संस्कारों (Traditional ethics) की जीवन में बहुत बड़ी भूमिका है। संस्कारों के बिना इस श्रृष्टि का अस्तित्व ही नहीं है। हम कह सकते हैं कि इस ब्रह्मांड का आधार भी संस्कार ही हैं। हालांकि संस्कार कोई जड़ वस्तु नहीं हैं एक आभास मात्रा है। इसका सीधे-सीधे हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से संबन्ध है। यह एक सोच है। एक न दिखाई देने वाली ऊर्जा है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। संस्कार/आदत एक प्रेरणा स्त्रोत है। अतः हम कह सकते हैं पाप और पुण्य के लिए पूरी तरह हमारे संस्कार ही जिम्मेदार हैं। इस पूरे ब्रह्यमांड के संचालन में संस्कारों की मुख्य भूमिका है।

माता-पिता जब बच्चा, शिशुु अवस्था में होता है तब से लेकर बच्चे के बड़े होने तक, उसको सीखाते ही रहते हैं। बार-बार बोलने से क्रिया करवाने से बच्चा वैसा ही करने लगता है। इस प्रकार बच्चे के पहले गुरू माता-पिता ही होते हैं। जो उसे जीवन जीने के अमूल्य संस्कार देते हैं। बड़े होने पर स्कूल काॅलेज के अध्यापक उसके गुरू होते हैं। स्कूल-काॅलेज से बच्चा अनुशासन में समय पर स्कूल पहुंचना सीखता है। पढ़ाई एवं खेल इत्यादि सीखता है। इस प्रकार अच्छे संस्कारों की नींव गुरू द्वारा डाली जाती है। धार्मिक प्रवृत्ति के माता-पिता बच्चे को अपने साथ मन्दिर या गुरूद्वारा या मस्जिद या चर्च ले जाते हैं। नियमित रूप से ले जाने से बच्चे में धार्मिक प्रवृत्ति का विकास होता है। अतः अच्छे संस्कार उसके बनते हैं। अच्छी या बुरी आदतें बच्चा किसी न किसी से सीखता है। चाहे किसी को देखकर या सुनकर भी आदतों का निर्माण हो जाता है।

संस्कार (traditional ethics) का बनना एक ऐसी प्रक्रिया है जो किसी के सीखने, किसी के द्वारा सीखाने या किसी को देखकर ग्रहण करने से बनते हैं। बार-बार एक क्रिया का होना एक नये संस्कार को जन्म देता है। किसी परिवार या समुदाय में प्रचलित किसी विचारधारा या मान्यता के अन्र्तगत कोई पद्वति अपनायी जा रही हो चाहे वह सही हो या नहीं लोग उसका अंधानुकरण करते हैं। कभी-कभी उस पद्वति/आदत/संस्कार का विरोध करना, समाज को स्वीकार नहीं होता है।

वातावरण में मधुरता

जहाँ अच्छे संस्कार वातावरण में मधुरता लाते हैं, जीवन को सुगम बनाते हैं वहीं बुरे संस्कार वातावरण में ज़हर घोलते हैं और संसार को प्रदूषित करते हैं एवं जीवन को नरक बना देते हैं। संस्कार हमारे जीवन का मूल आधार बिन्दु हैं। हमारे पिछले जन्म, वर्तमान तथा आने वाले कई जन्मों तक संस्कारों का असर रहता है। हमारे पिछले जन्म के अच्छे बुरे कर्मों का लेखा-जोखा अर्थात भाग्य या भाग्य कहलाता है। अच्छे संस्कार होंगे तो हम अच्छे ही कार्य करेंगे। अच्छे कार्य का फल भी अच्छा होगा। अगर बुरे संस्कार होंगे तो बुरे कार्य का फल भी बुरा ही मिलेगा।

संस्कारों की उत्पत्ति एवं उनका जीवन में महत्व

  1. पैदा होने के साथ माता-पिता के द्वारा दिए गए संस्कार बनने लगते हैं।
  2. थोड़ा बड़ा होने पर, रिश्तेदारों के, मित्रों के,आस-पास के वातावरण से मिले तथा स्कूल काॅलेज जाने पर अघ्यापक या गुरू के द्वारा दी गई शिक्षा से भी संस्कार बनते हैं।
  3. माता-पिता यदि धार्मिक हैं तो वे बच्चे को अपने साथ मन्दिर, गुरूद्वारा, चर्च इत्यादि धार्मिक स्थानों पर भी ले जाते हैं जहाँ धर्म गुरूओं या पंडितों के प्रवचनों के द्वारा भी संस्कार बनते हैं।
  4. युवा होने पर अपने कार्य क्षेत्र के साथियों से भी बहुत से अच्छे या बुरे संस्कार बनते हैं।
  5. शादी के बाद पति या पत्नी के अन्य जुड़े सम्बन्धों के द्वारा भी कई रस्मों-रिवाजों के साथ नये संस्कारों की प्राप्ति होती है।
  6. कभी-कभी भाग्य के कारण घटित किसी घटना के कारण, हमारी पुरानी सोच खंडित हो जाती है और उसके स्थान पर जीवन की वास्तविकता का नया आभास भी एक नई सोच या नये संस्कार को जन्म देता है।
  7. कभी-कभी विपरीत परिस्थिति में भी नये संस्कारों का जन्म होता है।
  8. स्थान परिवर्तन पर उस जगह या हर या उस देश की व्यवस्था के अनुसार भी संस्कार बदलने पर बाध्य होना पड़ता है।
  9. संस्कार किसी के सीखाने से, आत्ममिक प्रेरणा से, वातावरण से, कानून या नियम की बाध्यता से, अचानक घटित किसी घटना से, पारिवारिक परिवेश से, संग/सत्संग इत्यादि से मिलते हैं। साथ में पहले से मिले संस्कार भी अपना प्रभाव रखते हैं। जो संस्कार अधिक प्रबल होता है उसका प्रभाव जीवन में ज्यादा दिखाई देता है। जरूरत होने पर विचार आया, क्रियान्वयन करने में संस्कार सहायता करते हैं। हमारे हर अच्छे या बुरे कार्य के पीछे हमारी सोच या आदत या संस्कार ही जिम्मेदार है।
  10. अपने अनुभवों को जिस दिशा में मोड़ना चाहे, हम मोड़ सकते हैं अथवा हमारे अनुभव हमारे वश में हैं अथवा हमारे अनुभवों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं।

ध्यान रखें

  1. किसी से उम्मीद न रखें।
  2. बाहर के क्षेत्रा में हर व्यक्ति को प्रतिद्वन्दी न समझें,सभी से अपनापन बनायें।
  3. हम समाज को नहीं बदल सकते बल्कि, समाज को समझ कर,खुद को बदलें।
  4. जो मेरे साथ हो रहा है वह मेरे द्वारा ही किया गया था।
  5. मुझे प्रतियोगिता नहीं करनी है, मुझे समझना है, वे पहले से हैं और मुझे उन्हें सहयोग देना है।
  6. दूसरों को उनकी गलती पर क्षमा करें।
  7. अपनी बात के लिए जिद न करें।
  8. आज के मूल्यों के लिए समझौता करना सीखें और अपने आत्म विष्वास को बढ़ाना है।
  9. जब हम पर कोई क्रोध करता है तब हम उसका प्रतिकार करते हैं इस प्रकार हम अपने एक बुरे संस्कार को जन्म/ स्थान देते हैं।
  10. स्वीकार करें कि कोई भी कुछ कर रहा है वह अपनी क्षमता के अनुसार करेगा।
  11. हम जिन बातों से ज्यादा जुड़े हैं उनकी सूची बना कर, धीरे-धीरे उनसे दूर होने का प्रयास करें।
  12. जब भी समय मिले उसे अपने पर लगायें।
  13. सब के साथ रहो, बिना किसी से लगाव रखे।
  14. हम दूसरो के बारे में ज्यादा सोचते हैं अपितु अपने बारे में सोचने के।
  15. मैं इस संसार का निंयन्त्राक नहीं हूँ।
  16. मेरे पास विश्व को नियंत्रित करने की कोई शक्ति नहीं है।
  17. मैं अपनी समस्याओं को हल करने की शक्ति रखता हूँ।
  18. कोई दूसरा मेरी समस्याओं को हल नहीं कर सकता।
  19. जब हम दूसरो के बारे में सोचते हैं तब हम अपनी ऊर्जा को बेकार करते हैं।
  20. दूसरों की स्क्रीप्ट लिखने की कोशिश मत करो।
  21. अपने आप से संबन्ध बनाओ।
  22. हमेशा अच्छा सोचो।

Also Read : गलत मान्यतायों का तिरस्कार हो


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