जीवन की सार्थकता दूसरों के लिए जीने में है

जीवन की सार्थकता दूसरों के लिए जीने में है

एक बार एक राजा ने राजमार्ग पर एक विशाल पत्थर रखवा दिया। फिर वह छिपकर बैठ गया, यह देखने के लिए कि कोई उसे उठाता है या नहीं। मार्ग में पड़े उस पत्थर उस मार्ग से निकलने वाले, कई धनी सेठों ने, दरबारियों ने भी देखा परन्तु राजमार्ग को बाधारहित करने के लिए, किसी ने भी कुछ नहीं किया, सब उसके आस-पास से रास्ता बना कर निकल गए। तभी एक किसान सब्जियों का बोझ लिए वहाँ पहुँचा। अपना बोझा पत्थर के पास उतार कर उसने उसे हटाने का भरसक प्रयास किया और बड़ी मेहनत के बाद किसान को पत्थर हटाने में सफलता मिल ही गई। जैसे ही पत्थर हटा, उस जगह उसे एक सोने के सिक्कों की थैली मिली और साथ ही मिला राजा का एक पत्रा। पत्रा में लिखा था कि राजा ने यह धन पत्थर हटाने वाले के लिए रखा है।

किसान ने वह काम कर दिया जिसके लिए दूसरे लोग महज राजा की आलोचना करते रहे। इसके उलट किसान ने निष्काम सेवा और कर्म से अपने कर्तव्य का पालन किया और पारितोष भी पा लिया।

स्वार्थहीन कर्म से शुभ प्रयोजन, आनन्द और अमरत्व पाया जा सकता है। स्वार्थहीन सेवा का प्रेम और सौंदर्य हमारे अंदर सदा रहता है, हमें केवल उसे खोज कर उजागर करना होता है। स्वार्थहीन कर्म के बिना आध्यात्मिक आचरण नहीं प्राप्त किया जा सकता। वास्तव में स्वार्थहीन सेवा उपासना का ही दूसरा रूप है। संसार में आकर सेवा भाव के साथ काम करना किसी साधना से कम नहीं है। यदि हम अपने अन्दर के छिपे शत्राुओं से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो संसार में रहकर सेवा करने का बहुत महत्व है।

श्रीमद् भागवतगीता का परम संदेश सेवा ही है। भगवान श्रीकृष्ण परामर्श देते हैं, सदा कर्म करो, परन्तु निःस्वार्थ भाव के साथ। ऐसा कर्म करना ही उच्चतम विशिष्ट गुणों को पाने जैसा है। यदि हम सदा अपने स्वार्थ के बारे में सोचते रहे और दूसरों की तकलीफों के बारे में नहीं सोचें तो इस तरह हम स्वार्थी होकर अपने लिए बाधायें उत्पन्न करते हैं। कर्म केवल कर्म हेतु कीजिए, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अंततः हमारे कर्म ही हमें अंतिम लक्ष्य की ओर ले जाएगें।

कर्मों के फल या पारितोष में त्याग भावना का क्या महत्व हैµइसके बारे में गीता में पर्याप्त व्याख्या मिलती है। ”वे व्यक्ति कर्मयोगी और संन्यासी हैं, जो अपना कर्तव्य बिना किसी पुरस्कार या फल की इच्छा से करते हैं। जिस व्यक्ति की जितनी सामाजिक स्थिति है, जितना दायित्व है, उसे अपना कर्म उसी के अनुसार करना ही शोभा देता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, सदा अपना कर्तव्य बिना किसी प्रीति या बिना किसी स्वार्थ से करो।

यह सारा संसार एक ईश्वर का ही प्रकार है, हर व्यक्ति से यह आशा की जाती है की जाती है कि वह अपनी बुद्वि, मन और शरीर से, यथायोग्य स्वार्थरहित सेवा करे। जब भी किसी व्यक्ति को सेवा करने का अवसर प्राप्त होता है, तो मान लीजिए कि ऐसा ईश्वर के अनुग्रह या अनुभूति से ही होता है। हमारे मनीषियों के अनुसार जब हम किसी दूसरे की सेवा या सहायता करते हैं, तो इस पर गर्व नहीं करना चाहिए कि हम किसी पर अहसान कर रहे हैं और न ही सेवा पाने वाले को छोटा या हीन समझें। हम सभी में एक साधारण प्रवृति यह है कि जब भी कोई काम करते हैं, तो हमारे मन में विचार आता है कि इससे हमें क्या लाभ होगा? गीता में इस प्रवृति को पक्षपाती होना या स्वार्थी होना कहा गया है।

हमारे कर्मों से सर्वस्व मानव समाज का भला हो। लाभ अधिक से अधिक लोगों का हो, लेकिन उसके बदले में कुछ पाने की आशा नहीं रखनी चाहिए। किसी ने सच ही कहा है कि अच्छे विचार रखना बुद्विमता है, अच्छी योजना या कल्पना करना और भी अधिक बुद्विमता है, पर अच्छे कर्म करना अति उत्तम और श्रेष्ठ है।

(संकलित नवभारत टाइम्स)

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